मिट्टी की पुकार- भाग 1 : सूखी धरती
मिट्टी की पुकार
भाग 1 : सूखी धरती
अध्याय 1 : बुढ़वा कुआं और पीली डायरी
जेठ की दुपहरी का सन्नाटा बेलौना गाँव के सीने पर किसी भारी पत्थर की तरह ठहरा हुआ था। हवा इतनी गर्म थी कि आँखों के सामने का दृश्य भी तैरता हुआ (Mirage) महसूस हो रहा था। गाँव के दक्षिण छोर पर, जहाँ कभी बंजारों के डेरे डला करते थे, वहाँ आज सिर्फ 'बुढ़वा कुआं' अपनी मुंडेर ढहाए खड़ा था। कुएं का इतिहास गाँव की बसावट जितना ही पुराना था। उसकी सूखी, मटमैली तलहटी में चौड़ी-चौड़ी दरारें पड़ चुकी थीं, जो किसी भूखे जानवर के खुले जबड़े जैसी दिखती थीं। कुएं के ठीक बगल में खड़ा नीम का बूढ़ा पेड़, जिसकी छांव में कभी तीन पीढ़ियां जवान हुई थीं, इस साल अपनी आख़िरी हरी पत्तियां भी खो रहा था। पीली पड़ चुकी पत्तियां एक-एक कर सूखी मुंडेर पर गिरतीं और लू के झोंके के साथ धूल में मिल जातीं।
अर्जुन मिश्रा उसी मुंडेर पर बैठा था। उसके घुटनों पर फटी हुई जींस थी और पैरों में चमड़े की चप्पल, जो धूप में तपकर कड़क हो चुकी थी। उसने मुंडेर की एक ढीली ईंट से थोड़ा सा चूना खुरचा और अपनी उंगलियों के बीच मसलने लगा। अर्जुन के दिमाग में इस वक़्त कोई विचार नहीं था, बस एक अजीब सा शून्य था। वह स्नातक की डिग्री लेकर पिछले चौदह महीनों से इस गाँव की धूल छान रहा था।
"जब धरती का पानी पाताल में चला जाता है अर्जुन, तो इंसान के भीतर का धीरज भी सूखने लगता है।"
एक जानी-पहचानी, थोड़ी हांफती हुई आवाज़ सन्नाटे को चीरकर आई। अर्जुन ने मुड़कर देखा। उसके पिता, रामस्वरूप मिश्रा खड़े थे। उनकी रीढ़ की हड्डी काम के बोझ और उम्र के तकाज़े से थोड़ी झुक गई थी। उन्होंने हमेशा की तरह खादी का एक पुराना कुर्ता पहन रखा था, जिसके बटन टूट चुके थे और उन्हें एक सेफ्टी-पिन के सहारे रोका गया था। उनके दाहिने हाथ में वह पुरानी, कपड़े की जिल्द वाली पीली डायरी थी।
रामस्वरूप ने आकर मुंडेर पर अपनी जगह बनाई। उन्होंने बड़े सलीके से उस डायरी को अपने घुटनों पर रखा और उसके पन्नों को पलटकर देखने लगे। अर्जुन चुपचाप देखता रहा। उसने बचपन से इस डायरी को देखा था, लेकिन कभी इसे छूने की हिम्मत नहीं हुई थी।
डायरी के पहले पन्ने पर सन 1986 अंकित था। स्याही नीली थी, जो अब समय के साथ धुंधली होकर हरी पड़ने लगी थी। पन्ने पर सधे हुए अक्षरों में त्रिकोणमिति और बीजगणित के जटिल सूत्र लिखे हुए थे। उन्हीं सूत्रों के बीच दबा हुआ था एक मुड़ा-तुड़ा, भूरा पड़ चुका कागज़—'इलाहाबाद विश्वविद्यालय का स्कॉलरशिप आमंत्रण पत्र'। पत्र के नीचे तत्कालीन कुलपति के हस्ताक्षर थे।
रामस्वरूप की उंगलियां उस पत्र पर ठहर गईं। उनकी आँखें अचानक चौड़ी हुईं, जैसे वे 1986 के उस कमरे में वापस लौट गए हों जहाँ लालटेन की रोशनी में उन्होंने जिले में पहला स्थान प्राप्त किया था।
"आरती के दाखिले की आख़िरी तारीख इसी हफ्ते है ना?" रामस्वरूप ने डायरी से नज़रें हटाए बिना पूछा। उनकी आवाज़ में एक अजीब सी खामोशी थी।
"हाँ। अठारह तारीख आख़िरी है," अर्जुन ने कहा, उसकी नज़रें पिता के कांपते हाथों पर थीं। "शहर के वीएसएस कॉलेज में उसका नाम आ गया है। फीस साढ़े चार हज़ार है। और हॉस्टल का अलग।"
रामस्वरूप ने एक लंबी, ठंडी सांस ली। उन्होंने उस भूरे पड़ चुके पत्र को दोबारा डायरी के अंदर वैसे ही सहेज दिया, जैसे कोई अपनी सबसे कीमती और दर्दनाक याद को छुपाता है। "साढ़े चार हज़ार... और हरिलाल का ब्याज अलग खड़ा है।"
"पिताजी, आप इस डायरी को रोज़ क्यों देखते हैं?" अर्जुन से रहा नहीं गया। "यह अतीत तो बीत चुका। अब इन सूत्रों से न तो खेत में पानी आएगा और न ही आरती की फीस भरी जाएगी।"
रामस्वरूप ने धीरे से डायरी बंद की। उनकी आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि एक गहरा, पुराना दर्द था। "यह डायरी मुझे याद दिलाती है अर्जुन कि मैंने इस मिट्टी के लिए क्या कुर्बान किया है। जब मेरे बाबूजी गुज़र गए थे, तो सिर पर सात बहनों की शादी और इस तीन बीघे की ज़मीन का बोझ था। मैं यूनिवर्सिटी नहीं जा सका, पर मैंने इस ज़मीन को अपनी मां माना। आज जब यह मां सूखी पड़ी है, तो मुझे अपनी वो कुर्बानी फिजूल लगने लगती है।"
वह उठे, डायरी को अपने सीने से लगाया और बिना अर्जुन की तरफ देखे, अपने कांपते कदमों से घर की तरफ बढ़ गए। अर्जुन वहीं बैठा रहा, और पहली बार उसे महसूस हुआ कि उसके पिता का गुस्सा दरअसल उनकी अपनी ही नियति से एक अधूरा युद्ध था।
अध्याय 2 : सुखदेव की दुकान और ठाकुर का इंसाफ
बेलौना चौराहे पर स्थित सुखदेव की चाय की दुकान गाँव का धड़कता हुआ दिल थी। यहाँ की हवा में हमेशा तीन चीज़ों की गंध घुली रहती थी—जलती हुई लकड़ी का धुआं, उबलती हुई इलायची वाली चाय, और 'सस्ते हुक्के' का कड़वा तंबाकू। दुकान के सामने नीम के पेड़ के नीचे तीन लकड़ी के बेंच पड़े थे, जिनकी रंगत सालों पहले उड़ चुकी थी।
"अरे रामस्वरूप भाई! आओ, आओ। आज बड़ी देर कर दी कुएं की तरफ?"
आवाज़ हरिलाल की थी। हरिलाल गाँव का साहूकार था, जिसकी सफ़ेद धोती और सोने की अंगूठियां उसकी संपन्नता का ढिंढोरा पीटती थीं। वह बेंच पर पसरा हुआ था और उसके सामने सुखदेव की बनाई कड़क चाय का कुल्हड़ रखा था। उसकी बगल में ग्राम प्रधान विक्रम सिंह बैठे थे।
विक्रम सिंह (45) का व्यक्तित्व बेलौना के अन्य लोगों से बिल्कुल अलग था। कड़क सफ़ेद कुर्ता-पायजामा, हाथ में मोंट ब्लांक की फर्स्ट कॉपी वाली पेन और चेहरे पर हमेशा एक ठहरी हुई, आश्वस्त करने वाली मुस्कान। पिछले साल जब सुखदेव की मां बीमार हुई थी, तो विक्रम सिंह ने अपनी स्कॉर्पियो गाड़ी देकर उन्हें रात के दो बजे जिला अस्पताल भिजवाया था और डॉक्टर की फीस भी खुद भरी थी। वे गाँव के मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए हर साल पचास हज़ार की गुप्त दान राशि देते थे।
"नमस्ते प्रधान जी, नमस्ते हरिलाल भाई," रामस्वरूप ने बेंच के सुदूर कोने पर बैठते हुए कहा।
"मिश्रा जी, चाय लो," विक्रम सिंह ने सुखदेव की तरफ इशारा किया। "और बताओ, आरती बिटिया के कॉलेज का क्या हुआ? हम सुन रहे थे कि शहर में दाखिला मिल गया है उसे?"
"हाँ प्रधान जी, नाम तो आ गया है। बस थोड़ा हाथ तंग है इस बार," रामस्वरूप ने नजरें झुका लीं।
हरिलाल ने तुरंत अपनी बही खोली। "हाथ तो तंग रहेगा ही मिश्रा जी। पिछला कल्टीवेटर लोन का कागज़ बैंक से आ चुका है। अस्सी हज़ार की देनदारी है। इस सूखे में बैंक वाले रियायत नहीं देंगे।"
तभी अर्जुन वहाँ पहुंच गया। वह अपनी मां के लिए डॉक्टर की सुझाई हुई कमजोरी की सिरप लेने आया था। हरिलाल की बात सुनकर उसके कदम रुक गए।
"पैसे मिल जाएंगे हरिलाल काका," अर्जुन ने आगे बढ़कर कड़े लहजे में कहा। "अगले महीने मैं शहर जा रहा हूँ नौकरी के लिए। पहली तनख्वाह आते ही आपका ब्याज चुकता करूँगा।"
हरिलाल हंसने ही वाला था कि विक्रम सिंह ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया। विक्रम सिंह ने अर्जुन को देखा, उनकी आँखों में सहानुभूति थी। "अर्जुन बाबू, गुस्सा मत करो। युवा खून है, समझ सकते हैं। लेकिन शहर जाना ही हर बात का इलाज नहीं है। और रामस्वरूप भाई, तुम आरती की फीस की चिंता मत करो। सुखदेव! ज़रा अंदर से वो लिफाफा लाना तो।"
सुखदेव ने दुकान के अंदर से एक सफ़ेद लिफाफा लाकर विक्रम सिंह को दिया। विक्रम सिंह ने वह लिफाफा रामस्वरूप की तरफ बढ़ा दिया। "इसमें पांच हज़ार रुपये हैं। आरती हमारी भी बेटी है। उसकी पढ़ाई नहीं रुकनी चाहिए।"
रामस्वरूप की आँखों में आंसू आ गए। उन्होंने लिफाफे को देखा, फिर विक्रम सिंह के चेहरे को। उनके लिए यह इस वक़्त भगवान के प्रसाद जैसा था।
लेकिन अर्जुन ने बीच में आकर रामस्वरूप का हाथ पकड़ लिया। "हम यह पैसे नहीं ले सकते पिताजी।"
"अर्जुन!" रामस्वरूप की आवाज़ में झिड़की थी।
"क्यों नहीं ले सकते प्रधान जी?" अर्जुन ने सीधे विक्रम सिंह की आँखों में देखा। "पूरा गाँव जानता है कि पिछले तीन सालों से सरकार ने हमारे गाँव की नहर के नवीनीकरण और सफ़ाई के लिए पंद्रह लाख रुपये जारी किए हैं। लेकिन वो पैसे कभी कागज़ों से बाहर नहीं आए। हमारी नहर सूखी है क्योंकि उसका पानी आपके कोल्ड स्टोरेज की तरफ मोड़ दिया गया है। आप हमें पांच हज़ार की खैरात देकर हमारे लाखों का हक मार रहे हैं।"
दुकान पर सन्नाटा छा गया। सुखदेव का चाय छानने वाला हाथ हवा में रुक गया।
विक्रम सिंह की मुस्कान तनिक भी कम नहीं हुई। उन्होंने लिफाफा वापस अपनी जेब में रखा, चाय का एक घूंट लिया और बेहद शांत आवाज़ में बोले, "अर्जुन बाबू, पढ़ाई का घमंड अच्छी बात है, पर व्यावहारिक होना उससे भी बेहतर है। नहर में पानी ऊपर के बांध से ही नहीं आ रहा है, इसमें विक्रम सिंह क्या करेगा? और रही बात कोल्ड स्टोरेज की, तो वहाँ इस गाँव के बीस लड़कों को रोजगार मिला हुआ है। जब मुसीबत आती है, तो यह सरकारी कागज़ काम नहीं आते, यह विक्रम सिंह ही काम आता है। अपने बाप से पूछो।"
रामस्वरूप ने अर्जुन को ज़ोर से झटका दिया। "चुप रहो अर्जुन! बड़ों से बात करने की तमीज भूल गए हो? प्रधान जी, इसकी बातों का बुरा मत मानिए, लड़का है अभी।"
रामस्वरूप ने विक्रम सिंह के सामने हाथ जोड़े और अर्जुन को लगभग घसीटते हुए वहाँ से ले गए। पीछे दुकान पर हरिलाल ने ताश के पत्ते फेंटते हुए कहा, "पढ़ा-लिखा गँवार है।"
अध्याय 3 : राहुल का सच और रात का सन्नाटा
शाम के धुंधलके में जब शहर वाली आख़िरी बस बेलौना के तिराहे पर रुकी, तो उसमें से राहुल उतरा। उसका ठाठ-बाट हमेशा की तरह शहरी था—पॉलिश किए हुए जूते, हाथ में टाइटन की घड़ी और चेहरे पर एक मूंछों वाली ट्रिम दाढ़ी। गाँव के कुछ लड़के जो वहाँ मटरगश्ती कर रहे थे, तुरंत उसके पास आ गए।
"अरे राहुल भाई! इस बार तो सूट-बूट में आए हो। कंपनी में तरक्की हो गई क्या?"
"बस भाई, भगवान की दया है। मैनेजर साहब खुश रहते हैं हमसे," राहुल ने अपनी कॉलर ठीक करते हुए कहा। लेकिन जैसे ही वह उन लड़कों की नजरों से दूर हुआ और अर्जुन के साथ पुराने महुआ के पेड़ की तरफ बढ़ा, उसकी चाल ढीली पड़ गई। उसने अपनी जेब से सिगरेट निकाली, लेकिन उसके हाथ कांप रहे थे।
दोनों महुआ के पेड़ की जड़ों पर बैठ गए। रात धीरे-धीरे गाँव को अपनी आगोश में ले रही थी। दूर कहीं सियार के रोने की आवाज़ आ रही थी।
"यह ले भाई," राहुल ने अपनी जेब से दो हज़ार रुपये निकालकर अर्जुन की तरफ बढ़ाए।
"यह क्या है?" अर्जुन ने अचरज से पूछा।
"आरती के फॉर्म के लिए रख ले। मुझे चाची ने फोन किया था," राहुल ने कहा और सिगरेट का लंबा कश खींचा।
अर्जुन ने रुपयों को देखा, फिर राहुल के चेहरे को, जो लालटेन की मद्धम रोशनी में बहुत थका हुआ और पीला दिख रहा था। "राहुल, तेरी नौकरी कैसी चल रही है सच बता? तूने जो घड़ी पहनी है, उसका फीता अंदर से टूटा हुआ है और तूने उसे फेविक्विक से जोड़ा है। मुझसे मत छुपा।"
राहुल ने सिगरेट को जमीन पर फेंका और उसे अपने जूते से कुचल दिया। उसकी आँखों में अचानक एक अजीब सी हताशा उभर आई। "सच जानना चाहता है? सच यह है कि मेरी नौकरी छूट चुकी है अर्जुन।"
अर्जुन स्तब्ध रह गया। "क्या?"
"तीन महीने से मंदी चल रही है कंपनी में। उन्होंने एक झटके में चालीस लड़कों को निकाल दिया, जिनमें मैं भी था। यह जो पैसे मैं तुझे दे रहा हूँ, यह मैंने अपने एक दोस्त से उधार लिए हैं ताकि गाँव में अपनी इज्जत बचा सकूं। शहर एक ऐसी भट्टी है अर्जुन, जो दूर से बहुत चमकदार दिखती है, पर पास जाओ तो रीढ़ की हड्डी तक पिघला देती है। वहाँ कोई किसी का नहीं है। अगर मकान मालिक को एक तारीख को किराया नहीं मिला, तो वह सामान सड़क पर फेंक देता है।"
"तो फिर वापस क्यों नहीं आ जाता?" अर्जुन ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"वापस आकर क्या करूँगा?" राहुल कड़वाहट से हंसा, उसकी आवाज़ भारी हो गई थी। "गाँव में लोग मुझे 'सफल बाबू' समझते हैं। अगर मैं यहाँ आकर दोबारा हल पकड़ूँगा, तो लोग ताने मार-मार कर मेरे बूढ़े मां-बाप को मार डालेंगे। शहर की गुलामी इस गाँव के ताने से बेहतर है भाई। कम से कम वहाँ कोई मुझे जानता तो नहीं है।"
उस रात अर्जुन को समझ आया कि पलायन सिर्फ एक मजबूरी नहीं है, बल्कि एक ऐसा दलदल है जिससे निकलने का रास्ता शहर की चकाचौंध खुद ही बंद कर देती है।
अध्याय 4 : चौके की आग और बिखरे सूत्र
मिश्रा जी के घर के रसोईघर में मिट्टी के चूल्हे से गाढ़ा, सफ़ेद धुआं निकल रहा था। लकड़ियां गीली थीं और सावित्री देवी लगातार फूंकनी से फूंक मार रही थीं, जिससे उनकी आँखों से पानी बह रहा था। रसोई के कोने में एक टूटी हुई स्टूल पर आरती बैठी थी। उसकी गोद में वही सरकारी कॉलेज का प्रॉस्पेक्टस था।
"अम्मा, अगर इस बार दाखिला नहीं हुआ, तो फिर कभी नहीं होगा," आरती की आवाज़ में रोना था। "गाँव की बाकी लड़कियों की तरह मेरी भी शादी किसी अधेड़ किसान से कर दी जाएगी क्या?"
सावित्री ने फूंकनी रखी और अपने मैले आंचल से आरती के आंसू पोंछे। "ऐसा नहीं बोलते लाडो। तेरे बाबूजी कुछ न कुछ जुगाड़ कर रहे हैं।"
तभी बाहर ओसारे में अर्जुन और रामस्वरूप के बीच बहस की आवाज़ें तेज़ हो गईं।
"तुमने प्रधान जी के सामने मेरा सिर नीचा कर दिया अर्जुन!" रामस्वरूप चिल्लाए। वे अपनी खाट पर बैठे थे और उनके हाथ में वही पीली डायरी थी। "वह पांच हज़ार रुपये हमारी मदद के लिए दे रहे थे, कोई भीख नहीं थी!"
"वो भीख ही थी पिताजी!" अर्जुन कमरे के अंदर आते हुए बोला। "आप उस इंसान के सामने हाथ जोड़ रहे हैं जिसने इस पूरे गाँव का पानी चुराया है? क्या आप भूल गए कि बीस साल पहले तक इस गाँव की नहर में बारह महीने पानी रहता था? फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि पानी सिर्फ विक्रम सिंह के खेतों तक ही सीमित रह गया? बड़े-बूढ़े कहते हैं कि विक्रम सिंह ने नहर विभाग के बड़े अफसरों को रिश्वत देकर मुख्य धारा का रुख ही मोड़ दिया था।"
"ये सब अफवाहें हैं!" रामस्वरूप ने मेज पर हाथ मारा। "और अगर सच भी है, तो तुम क्या बदल लोगे? तुम एक अदने से बेरोजगार लड़के हो। तुम्हारी डिग्री तुम्हें दो वक्त की रोटी नहीं दे सकती। मुझे मेरी ज़मीन बचानी है और अपनी बेटी का भविष्य देखना है।"
"भविष्य ऐसे नहीं बनता पिताजी!" अर्जुन का भी सब्र टूट गया। "आप अपनी इस पीली डायरी को सीने से लगाकर बैठिए। इसके अंदर जो स्कॉलरशिप का लेटर है ना... पिताजी, यह पत्र मुझे आपकी अधूरी लड़ाई की याद दिलाता है, हार की नहीं। आपने परिस्थितियों के सामने घुटने टेके थे, और आज आप चाहते हैं कि मैं भी विक्रम सिंह के सामने घुटने टेक दूँ। मैं ऐसा नहीं होने दूँगा!"
तड़ाक!
रामस्वरूप का हाथ अर्जुन के गाल पर पड़ा। कमरे में एक सन्नाटा पसर गया, सिर्फ चूल्हे में जलती हुई लकड़ी के चटकने की आवाज़ आ रही थी। रामस्वरूप का हाथ कांप रहा था, और उनकी आँखों में एक गहरा, असहनीय दर्द था। उनके हाथ से वह पीली डायरी छूटकर जमीन पर गिर गई। उसके पन्ने खुल गए, और वह 1986 का स्कॉलरशिप लेटर फर्श की धूल में जा गिरा।
रामस्वरूप बिना कुछ कहे अपने कमरे में चले गए और अंदर से दरवाज़ा बंद कर लिया। अर्जुन वहीं खड़ा रहा, उसका गाल लाल था लेकिन उसकी आँखों में अब आंसू नहीं, एक ठोस संकल्प था।
रात के तीसरे पहर, जब सब सो रहे थे, आरती दबे पांव ओसारे में आई। उसने जमीन पर बिखरी उस पीली डायरी को उठाया। उसने धूल झाड़ी और जब पन्ने पलटे, तो उसे गणित के सूत्रों के बीच अपने पिता की एक पुरानी धुंधली तस्वीर मिली, जिसमें वे युवा थे और उनकी आँखों में वही चमक थी जो आज अर्जुन की आँखों में है। आरती ने उस डायरी को अपने सीने से लगा लिया। उसे समझ आ गया था कि यह सिर्फ एक डायरी नहीं, उसके परिवार के स्वाभिमान की आखिरी ढाल है।
अध्याय 5 : धूल, झाड़ू और एक नाकामी का सच
अगली सुबह की धूप हमेशा की तरह तीखी और बेरहम थी। बेलौना का प्राथमिक विद्यालय, जो सालों से गाँव के आवारा पशुओं का तबेला और प्रधान के गुर्गों का अड्डा बना हुआ था, आज एक अलग ही गवाह बनने जा रहा था। स्कूल के अहाते में बंधी भैंसें जोर-जोर से रंभा रही थीं और बरामदे में विक्रम सिंह के दो आदमी, घसीटा और सुखदेव का भाई, ताश खेल रहे थे।
तभी धूल उड़ाता हुआ एक पीला ऑटो स्कूल के फाटक के सामने रुका। फाटक का एक हिस्सा कब्जों से उखड़कर जमीन पर झुका हुआ था।
ऑटो से मीरा उतरी। साधारण सूती साड़ी, करीने से बंधे बाल, और चेहरे पर एक अजीब सा ठहराव। उसके हाथ में एक बड़ा सा कैनवास का झोला था जिसमें उसकी नई जॉइनिंग के कागज़ात थे। जैसे ही उसने स्कूल की जर्जर इमारत को देखा—जिसके कमरों की खिड़कियों के शीशे गायब थे और दीवारों पर उपले थपे हुए थे—उसके कदम एक पल के लिए ठिठके।
"अरे! मैडम जी आ गईं। राम-राम मैडम जी!" घसीटा ने ताश के पत्ते फेंकते हुए तंज कसा। "यहाँ कहाँ आ गईं आप? यहाँ कोई बच्चा नहीं आता पढ़ने। सब खेतों में काम करते हैं या बकरियां चराते हैं। आप भी प्रधान जी के यहाँ जाइए, अपनी हाजिरी लगाइए और शहर से ही बैठ-बैठकर तनख्वाह उठाइए। यहाँ धूप में काला होने की क्या जरूरत है?"
मीरा ने उनकी तरफ देखा। उसकी आँखों के पीछे एक गहरा अतीत तैर गया। वह कोई आदर्शवादी शिक्षिका बनने के शौक में यहाँ नहीं आई थी। वह दिल्ली में रहकर लगातार तीन बार 'राज्य प्रशासनिक सेवा' (PCS) की मुख्य परीक्षा में असफल हो चुकी थी। आख़िरी बार जब परिणाम आया और उसका नाम लिस्ट में नहीं था, तो उसके पिता ने साफ़ कह दिया था—'अब तुम्हारी उम्र शादी की हो गई है, कब तक समाज के ताने सुनवाओगी? यह आखिरी फॉर्म भर रहे हैं, इसमें जो मिले जॉइन कर लो, नहीं तो अगले साल हाथ पीले कर देंगे।' वह अपनी उस नाकामी, उस गहरे अवसाद और अपनों की नजरों में 'रिजेक्टेड' होने के बोझ से भागकर इस गुमनाम गाँव में आई थी।
'मैं यहाँ भी नहीं हारूंगी,' उसने खुद से कहा।
वह सीधे मुख्य द्वार की तरफ बढ़ी, जहाँ एक बड़ा सा भारी जंग लगा ताला लटका हुआ था। उसने अपने झोले से चाबी निकाली और ताले में घुमाई, लेकिन चाबी अंदर ही अटक गई। ताला टस से मस नहीं हुआ।
पीछे बैठे गुर्गे जोर से हंस पड़े। "कहा ना मैडम, यह ताला प्रधान जी की मर्जी के बिना नहीं खुलता।"
मीरा का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उसने चारों तरफ देखा। जमीन पर एक बड़ा, नुकीला पत्थर पड़ा था। उसने अपनी साड़ी के पल्लू को कसकर कमर में बांधा, आगे बढ़ी और दोनों हाथों से उस भारी पत्थर को उठाया।
धाड़!
मीरा ने पूरी ताकत से पत्थर ताले पर दे मारा। लोहे की तीखी गूंज पूरे सन्नाटे में गूंज उठी। ताला नहीं टूटा। उसने दोबारा पत्थर उठाया और पूरी नफरत और अपनी तीन साल की नाकामी की भड़ास उस ताले पर निकाल दी। धाड़! इस बार ताला टूटकर जमीन पर गिर गया। दरवाज़ा खुला तो बरसों से बंद पड़े कमरे के अंदर से सड़ी हुई उमस और धूल का एक भयानक गुबार निकला।
मीरा को तेज खांसी आई, उसकी आँखों में धूल चली गई, लेकिन वह पीछे नहीं हटी। उसने बरामदे के कोने में पड़ी एक पुरानी, आधी टूटी हुई सींक वाली झाड़ू उठाई और खुद ही फर्श की गंदगी साफ करने लगी। गोबर के सूखे कंडे को उसने अपने हाथ से उठाकर बाहर फेंका।
उसी समय अर्जुन अपना झोला कंधे पर टांगे बस स्टैंड की तरफ जा रहा था। वह घर छोड़ रहा था, शहर जाने के लिए। स्कूल के पास से गुज़रते हुए जब उसने एक शहर की पढ़ी-लिखी लड़की को इस तरह धूल और गोबर से जूझते देखा, तो उसके कदम ठिठक गए।
वह अहाते के अंदर आया। "मैडम, आप यह क्या पागलपन कर रही हैं? इस गाँव में कोई अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजेगा। यहाँ लोगों के पास खाने को दाने नहीं हैं, वे किताबों का बोझ नहीं उठा सकते।"
मीरा ने झाड़ू रोकी। उसका चेहरा पसीने से तर था, चश्मे पर धूल जमी थी। उसने अर्जुन की आँखों में देखा। उसकी आँखें रो नहीं रही थीं, वे जल रही थीं। "अगर आज मैंने यह धूल साफ़ नहीं की अर्जुन जी, तो यह गाँव जिंदगी भर इसी धूल में पड़ा रहेगा। बच्चे नहीं आएंगे, तो मैं उनके घरों के सामने धरना दूँगी। लेकिन यह स्कूल आज खुलेगा।"
उसने दोबारा झाड़ू पकड़ ली और पूरी ताकत से जमीन रगड़ने लगी।
अर्जुन वहीं खड़ा रहा। उसने अपने हाथ में पकड़े उस झोले को देखा जिसमें उसकी डिग्रियां और शहर जाने का टिकट था। फिर उसने स्कूल के उस काले बोर्ड को देखा जिस पर कभी कुछ लिखा गया था। उसके भीतर कुछ टूट गया—या शायद कुछ जुड़ गया।
उसने अपना झोला एक टूटी हुई बेंच पर पटका। पास ही एक सरकारी हैंडपंप था, जो खारा और पीला पानी उगल रहा था। उसने कुएं के पास रखी लोहे की एक पुरानी बाल्टी उठाई, हैंडपंप की तरफ बढ़ा और मीरा की तरफ देखकर बोला, "रुकिए। सूखी झाड़ू से सिर्फ धूल उड़ेगी, फर्श साफ़ नहीं होगा। मैं इस हैंडपंप से पानी लाता हूँ। देखते हैं इस स्कूल की धूल कितनी मजबूत है।"
नीम के बूढ़े पेड़ की छांव में, बेलौना गाँव की सोई हुई चेतना ने पहली बार करवट ली थी।
[भाग 1 पूर्णतः शुद्ध, परिमार्जित एवं समाप्त]