शरीर साम्राज्य का महायुद्ध - अध्याय 10 : जब भूख ने बहस जीत ली
अध्याय 10 : जब भूख ने बहस जीत ली
साम्राज्य के दोनों शीर्ष शासकों के आत्मघाती असहयोग ने पूरे देह साम्राज्य को एक ऐसे मूक संकट में धकेल दिया था, जहाँ सांसें उखड़ रही थीं और ऊर्जा दम तोड़ रही थी। उत्तर और दक्षिण के बीच खिंची कड़वाहट की इस दीवार के बीच, मध्य भाग में स्थित 'यकृत राज्य' (The Alchemy of Liver) अब तक पूरी तरह शांत था।
सबको लगता था कि यकृत के कीमियागर इस राजनीति से बेअसर हैं, लेकिन सच यह था कि इस राजनैतिक शीत युद्ध की सबसे मूक और गहरी कीमत यही राज्य चुका रहा था।
रक्तेश अपनी नाव को यकृत राज्य के मुख्य घाट पर बांध रहा था, जहाँ से पूरे देश में भोजन (ग्लूकोज) की रसद भेजी जाती थी। लेकिन आज वहां का दृश्य डरावना था। हमेशा सुलगने वाली रासायनिक भट्टियाँ आज बुझी पड़ी थीं। चारों ओर कोयले की राख और सन्नाटा था।
भट्टियों के सामने यकृत के मजदूर थके-हारे बैठे थे। उनके चेहरों पर कालिख थी और आँखें धँसी हुई थीं। रक्तेश ने देखा कि घाट के ठीक पीछे 'ग्लाइकोजन' के विशाल गोदाम खड़े थे। उन गोदामों के भीतर इतना अनाज सुरक्षित था कि पूरा साम्राज्य हफ़्तों तक पेट भर सकता था। लेकिन उन भारी लोहे के द्वारों पर कड़े सरकारी ताले लटके थे। किसी भी मजदूर ने, किसी भी भूखे सैनिक ने उन तालों को तोड़ने की कोशिश तक नहीं की थी। वे गोदामों की दीवारों से टिककर भूखे बैठे थे।
रक्तेश ने जब एक वृद्ध मुख्य मजदूर की आँखों में आंसू देखे, तो उसे समझ आया कि इस साम्राज्य की सबसे बड़ी त्रासदी संसाधनों की कमी नहीं थी, बल्कि उस आपसी विश्वास का पूरी तरह मर जाना था जो कभी उन्हें एक रखता था। वे डरते थे कि अगर आज उन्होंने ताला तोड़ा, तो दूसरा पक्ष उन पर गद्दारी का इल्जाम लगा देगा।
तभी, काले पत्थरों से बने उस रासायनिक दुर्ग की प्राचीर पर बैरन हेपेटिक आकर खड़े हुए। उनके हाथों में न तो कोई तलवार थी, न कोई राजकीय फरमान। उनके वस्त्र फटे हुए थे और चेहरा भूख की सुस्ती से पीला था। उन्होंने नीचे खड़े दोनों क्षेत्रों के कूटनीतिक दूतों की ओर देखा। उन्होंने बहुत ही शांत, मगर भारी आवाज़ में कहा:
"राजा कहता है वह जीवन है। चांसलर कहता है वह चेतना है। वे दोनों अपनी श्रेष्ठता की बहस में एक-दूसरे का खून और संदेश रोक रहे हैं। मैं उनकी इन ऊंची बहसों के बारे में कुछ नहीं जानता... मैं तो बस इतना जानता हूँ कि तीन दिनों से मेरे खुद के मजदूर भूखे सो रहे हैं। यदि चेतना बड़ी है, तो उसे बिना ईंधन के सोचकर दिखाने दो। यदि प्राण बड़े हैं, तो उन्हें बिना ऊर्जा के धड़ककर दिखाने दो।"
यह बैरन का कोई अहंकार नहीं था, यह एक भूखे और लाचार मध्यस्थ का मौन था जिसने दोनों अहंकारी महलों को एक ही झटके में उनके वास्तविक वजूद के खोखलेपन का अहसास करा दिया था।
इस आर्थिक नाकेबंदी की मार इतनी भीषण थी कि उसने विचारधाराओं के सारे मुखौटे नोच दिए। इसका सबसे जीवंत और मर्मस्पर्शी दृश्य रक्तेश को पाचन घाटी के एक मुहाने पर बने 'राशन-कैंप' में देखने को मिला।
वहाँ कोई राजनैतिक बहस नहीं हो रही थी। एक बहुत लंबी, थकी हुई कतार लगी थी। और उस कतार में, एक-दूसरे के ठीक पीछे दो दोस्त खड़े थे—चिन्मय और स्पंदन। चिन्मय के गले में मस्तिष्क नगर का नीला विद्युत-बैज था जिसकी बिजली अब पूरी तरह बुझ चुकी थी, और स्पंदन की लाल पोशाक धूल से धूसरित थी। दोनों के कंधे झुके थे और वे भूख से हांफ रहे थे।
तभी राशन बांटने वाले कर्मचारी की सूखी आवाज़ गूँजी: "अगला!"
चिन्मय और स्पंदन चौंककर आगे बढ़े। मेज पर केवल एक आखिरी ऊर्जा-पैकेट बचा था। पूरे कैंप का अंतिम अनाज।
चिन्मय ने अत्यंत कमज़ोर, सूखी आवाज़ में स्पंदन की ओर देखा। उसकी आँखों से गर्व गायब हो चुका था, वहां केवल एक आदिम लाचारी थी। उसने बहुत धीरे से स्पंदन का कंधा छुआ और कहा, "स्पंदन... मेरे पास अब यह सोचने की भी ऊर्जा नहीं बची है कि मैं तुमसे नफ़रत कैसे करूँ।"
स्पंदन ने कुछ नहीं कहा। कोई भाषण नहीं, कोई बहस नहीं। उसने आगे बढ़कर वह आखिरी पैकेट उठाया, उसे बीच से पूरी सटीकता के साथ दो टुकड़ों में फाड़ा, और उसका आधा हिस्सा चिन्मय के कांपते हाथों में थमा दिया।
बिना किसी शब्द के, एक भूखे दोस्त ने अपनी आधी रोटी दूसरे भूखे दोस्त के मुंह में डाल दी थी। राजनीति और विचारधाराओं की ऊंची दीवारें उस एक आधी रोटी के त्याग के सामने ढहकर राख हो चुकी थीं।
रक्तेश इस दृश्य को देखकर अपनी नाव की ओर लौटा, लेकिन नियति ने उसके लिए आज सबसे बड़ा और अंतिम झटका संभाल कर रखा था।
उसकी नाव के डेक पर उत्तर के एक न्यूरॉन प्रहरी ने एक लिफाफा लाकर पटक दिया था। यह रक्तेश की माँ का वही पत्र था, जिसे उसने उत्तर भेजने की कोशिश की थी और जो सीमा पर ज़ब्त कर लिया गया था। लेकिन इस बार, पत्र के ठीक ऊपर गहरे काले रसायन से एक नई, निर्दयी राजकीय मुहर लगी थी।
रक्तेश उस मुहर को देर तक देखता रहा। उस पर लिखा था: 'गंतव्य अनुपलब्ध'।
उसने पहले कभी पूरे साम्राज्य के इतिहास में यह मुहर नहीं देखी थी। उसके हाथ काँपने लगे। उसने दूसरी बार उस शब्द को पढ़ा। फिर तीसरी बार पढ़ा। और चौथी बार पढ़ते-पढ़ते उसकी आँखें पूरी तरह धुंधली हो गईं।
साम्राज्य अब पूरी तरह से एक शांत, बर्फ जैसी सुसुप्ति में जा रहा था। रक्तेश ने माँ के उस पत्र को अपनी छाती से चिपका लिया और अपनी नाव के पतवार पर सिर रखकर बैठ गया। उसने महसूस किया कि इस श्रेष्ठता की बहस ने पूरे शरीर को कहाँ लाकर खड़ा कर दिया था। उसने निराशा से सिर झुकाया और बुदबुदाया:
"पहले वे यह बहस कर रहे थे कि कौन सबसे महत्वपूर्ण है। फिर वे यह साबित करने में लगे कि दूसरे का कोई महत्व ही नहीं है। और आज... जब भूख ने इस बहस को जीत लिया है, तब उन्हें समझ आया कि दूसरों के महत्व को मिटाने की कोशिश में, वे स्वयं अपना वजूद मिटा चुके हैं।"
उस रात किसी ने अपनी जीत का दावा नहीं किया। क्योंकि भूख के सामने दोनों पक्ष बराबर हार चुके थे। लाल नदी बह रही थी, लेकिन अब उसमें बहस की कोई आवाज़ नहीं थी।
केवल भूख थी। और एक अंतहीन सन्नाटा।
अध्याय 10 समाप्त।