शरीर साम्राज्य का महायुद्ध - अध्याय 15 : अंधकार का साम्राज्य
अध्याय 15 : अंधकार का साम्राज्य
जब यह तय हो जाए कि सुबह नहीं आएगी, तो लड़ाई का चरित्र बदल जाता है। फेफड़ों की घाटी में चढ़ता हुआ वह पानी अब केवल एक क्षेत्र की समस्या नहीं था; वह पूरे साम्राज्य का दम घोंट रहा था। ऑक्सीजन का अंतिम प्रवाह रुक जाने के बाद, देह साम्राज्य का भूगोल एक आदिम, डरावने और अंतहीन अंधकार में डूब गया। यह वह क्षण था जब साम्राज्य की भव्य प्रशासनिक इमारतें, विचार-महल और लाल किले पूरी तरह अर्थहीन हो गए। अब केवल एक ही सत्य बचा था—अस्तित्व की आखिरी, थरथराती हुई लौ।
और उस लौ को थामने की अंतिम जिम्मेदारी अब उस अंग पर आ टिकी थी, जिसने साम्राज्य को अपनी पहली धड़कन दी थी।
रक्तेश अपनी नाव के डेक पर घुटने टेके बैठा था। लाल नदी का पानी अब बह नहीं रहा था; वह एक गहरे, गाढ़े और ठंडे मलबे की तरह जम चुका था। नदी की सतह पर हीमोग्लोबिन के हज़ारों जहाज बिना किसी दिशा के तैर रहे थे, उनके नीले पड़ चुके चालक दल अपनी खाली बोतलों को देख रहे थे।
तभी नदी के ऊपरी छोर से, जहाँ 'मस्तिष्क नगर' के ऊंचे बुर्ज हुआ करते थे, बिजली का एक आखिरी, कमज़ोर पल्स कौंधा और बुझ गया।
कपाल के महलों में चेतना का अवसान शुरू हो चुका था। चांसलर सेरेब्रम, जो फेफड़ों की कीचड़ में बैठकर टूटे हुए तारों को जोड़ने का प्रयास कर रहे थे, उनके हाथ अचानक शिथिल पड़ गए। उनकी आँखों की विद्युत-चमक मद्धम होती गई।
किंग वेंट्रिकल ने मलबे के बीच ही उनके झुकते हुए शरीर को संभाला। राजा ने अपने पुराने मित्र के ठंडे पड़ते माथे को अपने सीने से लगा लिया। उन्होंने चांसलर के न्यूरॉन्स से उठती उस आखिरी, कांपती हुई प्रशासनिक गूंज को सुना:
"वेंट्रिकल... मेरे सारे आंकड़े... सारे नियम समाप्त हो गए। खिड़की के बाहर... बहुत अंधेरा है, मेरे भाई।"
चांसलर की आँखें बंद हो गईं। मस्तिष्क नगर सुसुप्ति (Coma) के सबसे गहरे तहखाने में उतर चुका था। अब उत्तर से न कोई आदेश आने वाला था, न कोई तार्किक योजना। पूरी शासन व्यवस्था का अंत हो चुका था। राजा अब उस साम्राज्य में अकेले बचे थे, जिसकी चेतना सो चुकी थी।
राजा ने चांसलर को वीरा के सैनिकों के सहारे छोड़ा और स्वयं लड़खड़ाते कदमों से अपने 'हृदय दुर्ग' की ओर बढ़े। जब वे अपने किले के गर्भगृह में पहुँचे, तो वहाँ का दृश्य किसी श्मशान जैसा था।
दुर्ग की विशाल पेशी-दीवारें, जो कभी एक मिनट में सत्तर बार पूरे साम्राज्य को जीवन-रस से सींचती थीं, आज ऑक्सीजन के बिना बुरी तरह हांफ रही थीं। पेशियों के भीतर तेजाब का कड़वापन जमा हो चुका था, जिससे हर कंपन के साथ किला दर्द से थरथरा उठता था।
"महाराज..." दुर्ग के मुख्य द्वार पर तैनात बूढ़े सेनापति ने कांपते हुए कहा। उसकी लाल पोशाक फटी हुई थी। "दुर्ग में अब कोई नहीं बचा जो अगली पहरेदारी ले सके।"
किंग वेंट्रिकल ने अपने उस विशाल, भारी सिंहासन की बाह को पकड़ लिया। उनका सीना दर्द के एक भयानक झटके से फट रहा था। हर धड़कन के साथ ऐसा लगता था जैसे कोई उनके दिल पर पत्थरों से वार कर रहा हो। उन्होंने अपने कांपते हाथों से अपनी छाती को भींचा और बहुत ही धीमी, पत्थरों को भी रुला देने वाली आवाज़ में कहा:
"अगर मैं रुक गया... तो वह अकेला रह जाएगा।"
राजा ने अपने सेनापति का हाथ छोड़ दिया और स्वयं उस मुख्य पेसमेकर यंत्र (SA Node) के पास पहुँचे, जहाँ से धड़कन की कमान संभाली जाती थी। बिजली खत्म हो चुकी थी, लेकिन राजा ने अपने वजूद की आखिरी जैविक ऊर्जा को समेटा और यंत्र के लीवर को अपनी पूरी ताकत से दबाया।
धक्...
किले की दीवारें एक बार फिर हिचकी लेकर कांपीं। यह धड़कन किसी साम्राज्य को चलाने के लिए नहीं थी; यह केवल मौत के कफ़न को कुछ पलों के लिए दूर धकेलने की एक आखिरी, दीवानी ज़िद थी।
रक्तेश ने अपनी जेब में हाथ डाला। उसकी उँगलियों को माँ के पत्र का वह आखिरी जला हुआ कोना मिला। अब उस पर माँ की लिखावट का वह आधा घुमाव भी नदी के गाढ़े होते पानी में घुलकर पूरी तरह मिट चुका था। कागज़ का वह अंतिम टुकड़ा अब पूरी तरह सफेद और कोरा हो चुका था। रक्तेश ने उसे नदी के स्थिर पानी में छोड़ दिया। अब न कोई अतीत बचा था, न कोई भविष्य।
तभी, हृदय दुर्ग से एक बहुत ही धीमी, थकी हुई और असमान लय गूँजी— धक्....... धक्....... धक्.......
रक्तेश ने सिर उठाकर अंधेरे की ओर देखा। किसी ने कुछ नहीं कहा।
दूर, हृदय दुर्ग की सबसे ऊँची मीनार पर जलता हुआ अंतिम लाल दीपक एक बार टिमटिमाया।
फिर बहुत देर तक नहीं टिमटिमाया।
अध्याय 15 समाप्त।