शरीर साम्राज्य का महायुद्ध - अध्याय 16 : होमियोस्टैसिस की आखिरी पुकार

 


अध्याय 16 : होमियोस्टैसिस की आखिरी पुकार

जब सत्ता के सारे बुर्ज ढह जाते हैं और इतिहास के पन्नों से बड़े-बड़े राजाओं और चांसलरों के नाम मिट जाते हैं, तब भी ज़मीन के नीचे कुछ ऐसा बचता है जो किसी आदेश या विचारधारा का मोहताज नहीं होता। मस्तिष्क नगर सो चुका था। हृदय दुर्ग का अंतिम दीया बुझने की कगार पर था। लेकिन देह साम्राज्य की सबसे गहरी, अंधेरी और प्राचीन गुफाओं—अस्थि-मज्जा (The Bone Marrow)—के भीतर, जहाँ जीवन की पहली कोशिका ने जन्म लिया था, वहाँ अभी भी एक ऐसी व्यवस्था ज़िंदा थी जो साम्राज्य के बनने से पहले से अस्तित्व में थी।

यह 'होमियोस्टैसिस' की वह आदिम, मूक और आख़िरी पुकार थी, जो तब गूँजती है जब चेतना पूरी तरह हार मान चुकी होती है।

रक्तेश अपनी नाव के डेक पर निढाल पड़ा था। चारों ओर ऐसा सन्नाटा था मानो समय ठहर गया हो। लाल नदी का पानी अब पूरी तरह जम चुका था। बर्फीली धुंध ने पूरे वायुमार्ग और रक्तमार्गों को अपने कब्ज़े में ले लिया था। इन्फ्लुएंजा के वायरस अब बिना किसी प्रतिरोध के, साम्राज्य के मलबे पर रेंग रहे थे। उन्हें लग रहा था कि वे यह युद्ध जीत चुके हैं।

तभी, हड्डियों के सफेद पहाड़ों के सबसे गहरे तहखाने में एक भारी, पथरीली सरसराहट हुई।

तहखानों में कोई युद्धघोष नहीं हुआ। कोई ध्वज नहीं उठा। वहाँ न तो उत्तर के तार्किक आंकड़ों का कोई मूल्य था, न ही दक्षिण के भावुक घोषणापत्रों का। केवल विशिष्ट सफेद कोशिकाओं (Lymphocytes) की बंद पड़ी कतारें धीरे-धीरे चलने लेनीं। उनमें कोई घमंड नहीं था, कोई नारा नहीं था। उनकी गति ऐसी थी, जैसे किसी बहुत पुराने बीज को अचानक याद आ गया हो कि उसे अंकुरित होना है।

यह इस घर की मिट्टी की अपनी एक प्राचीन, अनैच्छिक याददाश्त थी जो तब जागती है जब सब कुछ सो जाता है। जीवन की वह गहरी जैविक स्मृति जो बिना किसी आदेश के केवल इतना कहती है: "अभी नहीं।"

इस अंतिम भूमिगत प्रवाह को मोर्चे पर भेजने के लिए अब किसी चांसलर के दस्तखत की जरूरत नहीं थी। उन पूर्वज कोशिकाओं ने अपने वजूद का आखिरी रासायनिक संकेत सीधे 'हृदय दुर्ग' की उन थक चुकी दीवारों तक भेजा।

हृदय दुर्ग के भीतर, किंग वेंट्रिकल अब भी उस मुख्य पेसमेकर यंत्र के लीवर से टिके हुए थे। उनकी उंगलियाँ बर्फ की तरह ठंडी हो चुकी थीं। उनका सीना जम रहा था। तभी, नीचे की घाटी से आया वह सूक्ष्म, आदिम रासायनिक आवेग उनके दिल की आख़िरी जीवित कोशिका से टकराया।

बूढ़े सेनापति ने, जो ज़मीन पर ढाल के सहारे अंतिम सांसें गिन रहा था, राजा की ओर देखा। उसकी आँखें धुंधली थीं, लेकिन उसने दीवारों के भीतर होने वाले उस बारीक कंपन को महसूस कर लिया था। उसने बहुत ही धीमी, हाँफती हुई आवाज़ में बुदबुदाया:

"महाराज... नीचे से... पूर्वज जाग गए हैं।"

किंग वेंट्रिकल ने अपनी बंद होती आँखों को एक आखिरी बार खोला। उनके जमे हुए होंठों से कोई शब्द नहीं निकला, बस एक थकी हुई सांस बची थी। उन्होंने अपने शरीर का पूरा वजन उस लोहे के लीवर पर डाल दिया।

धक्.......

हृदय दुर्ग की सबसे ऊँची मीनार पर जलता हुआ वह अंतिम लाल दीपक, जो बहुत देर से बुझा पड़ा था, अंधेरे के बीच एक बार फिर थरथरा कर जल उठा।

रक्तेश ने अपनी नाव के पतवार पर से सिर उठाया। उसने देखा कि नदी के जमे हुए पानी के नीचे, बहुत गहराई में, नीले और लाल रंग से अलग, एक गहरे सफेद रंग की मूक धारा बहने लगी थी। यह उन विशिष्ट कोशिकाओं का प्रवाह था जो बिना किसी शोर के, बिना किसी सायरन के, सीधे इन्फ्लुएंजा के मुख्य अड्डों की ओर बढ़ रही थी।

राशन-कैंप के मलबे के पास, जहाँ चिन्मय और स्पंदन उस घायल बच्चे को छाती से लगाए पड़े थे, वहाँ से यह सफेद धारा गुज़री।

चिन्मय की आँखें आधी खुली थीं। स्पंदन का हाथ अभी भी चिन्मय के कंधे पर था। वह सफेद धारा उनके ठीक बीच से गुज़र गई।

दोनों चुप रहे। किसी ने कोई बात नहीं की।

बाहर इन्फ्लुएंजा की बर्फीली आंधी अब भी उतनी ही तेज थी। फेफड़ों का पानी अभी भी अपनी जगह जमा हुआ था। पतन अभी भी उतना ही अपरिहार्य लग रहा था।

लेकिन अब सन्नाटा वैसा नहीं रहा था।

हड्डियों के सफेद पहाड़ों के बहुत नीचे कहीं, किसी ने फिर से काम शुरू कर दिया था।

अध्याय 16 समाप्त।