अब आगे क्या - अध्याय 1: वह प्रश्न जो सबको डराता है

 

अध्याय 1: वह प्रश्न जो सबको डराता है

कमरे की खिड़की से छनकर आती जून की दोपहर की धूप फर्श पर एक चौकोर टुकड़ा बना रही थी। बाहर हवा पूरी तरह थमी हुई थी, मानो प्रकृति भी अपनी सांस रोके किसी अनहोनी का इंतजार कर रही हो। लेकिन उस सुलगती दोपहर में भी, आरव के कमरे के भीतर एक अनसुना, अदृश्य तूफान चल रहा था।

मेज पर उसका लैपटॉप खुला था, जिसकी स्क्रीन पर उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद् का रिजल्ट पेज चमक रहा था। रोल नंबर के ठीक सामने बड़े अक्षरों में लिखा था—92%

तभी उसके बिस्तर पर रखा मोबाइल फोन एक बार फिर थरथराया। आरव ने थकी हुई नजरों से स्क्रीन को देखा। मैसेंजर ऐप्स और व्हाट्सऐप पर संदेशों की बाढ़ आई हुई थी: ‘Congratulations, Beta!’ ‘Proud of you! खानदान का नाम रोशन कर दिया!’ ‘Future IITian!’ ‘बधाई हो डॉक्टर साहब!’

आरव एक-एक करके उन संदेशों को देख रहा था, लेकिन उसके भीतर कोई हलचल नहीं हो रही थी। उसे ऐसा लग रहा था मानो लोग किसी और को बधाई दे रहे हों, किसी ऐसे आरव को जिसे वह खुद नहीं जानता। ९२% आने के बाद जिस खुशी और गर्व का अहसास होना चाहिए था, उसकी जगह आरव के सीने में एक गहरा, डरावना खालीपन पसर गया था।

बाहर ड्राइंग रूम से लगातार हंसने-बोलने और बड़ों की गंभीर चर्चाओं की आवाजें आ रही थीं। रसोई से ताजे बने समोसों और चाशनी में डूबे गुलाब जामुनों की महक तैरती हुई कमरे तक पहुंच रही थी, लेकिन आरव के हलक से थूक निगलना भी भारी हो रहा था।

तभी फूफाजी की भारी, रौबीली आवाज गूंजी, "भाई, ९२% आए हैं लड़के के! कोई मामूली बात नहीं है। अब जरा भी देर मत करो, सीधे बोरिया-बिस्तर बांधो और इसे कोटा भेजो। IIT से कम तो कुछ सोचना ही नहीं है। आज के समय में कंप्यूटर साइंस इंजीनियर की जो सैलरी है, तुम सोच नहीं सकते! सीधे लाखों का पैकेज।"

"अरे नहीं फूफाजी," तभी बगल से मौसी ने अपनी राय रखी, "इंजीनियरिंग में अब वो बात कहाँ रही? हर गली में एक इंजीनियर घूम रहा है। आरव का स्वभाव शांत है, उसे नीट (NEET) की तैयारी करानी चाहिए। डॉक्टर बनेगा हमारा आरव, तो पूरे समाज में जो इज्जत होगी, वो किसी और नौकरी में कहाँ?"

तभी आरव ने अपने पिता की धीमी, संकोच से भरी आवाज सुनी, "हम भी यही सोच रहे थे... लेकिन तैयारी का खर्च..." "अरे खर्च की चिंता छोड़ो भाई साहब!" फूफाजी ने बात काटते हुए कहा, "ऐसे होनहार लड़के पर कर्ज लेकर भी लगाया जाए, तो वो वसूल हो जाता है।"

आरव ने धीरे से अपने दोनों हाथों से कान बंद कर लिए। ‘वसुली’, ‘पैकेज’, ‘स्कोप’... ये शब्द उसे किसी नुकीले तीर की तरह चुभ रहे थे। सब उसके भविष्य की इमारत खड़ी कर रहे थे, लेकिन किसी ने यह नहीं पूछा कि इस इमारत की नींव में जो लड़का बैठा है, वह क्या सोच रहा है। माँ-पिता भी समाज के इस शोर में बहते जा रहे थे।

आरव को उस बंद कमरे में घुटन होने लगी। उसने आहिस्ता से अपने कमरे का दरवाजा खोला और बिना किसी की नजर में आए, पीछे की सीढ़ियों से होता हुआ घर की छत पर चला गया।

छत पर दोपहर की तेज, गर्म हवा चल रही थी। आरव मुंडेर के पास जाकर खड़ा हो गया। सामने पूरा शहर फैला हुआ था—दूर कतारों में खड़ी गाड़ियां, दुकानों पर उमड़ती भीड़, और अपने-अपने कामों में भागते लोग। आरव ने ऊपर नीले, अंतहीन आसमान की ओर देखा।

"अब आगे क्या?"

यह चार शब्दों का सवाल उसके सामने एक बहुत बड़े, काले पहाड़ की तरह खड़ा था। उसे विज्ञान के प्रयोग अच्छे लगते थे, लेकिन फॉर्मूले डराते थे। उसे इतिहास की कहानियां पसंद थीं, लेकिन लोग कहते थे कि 'आर्ट्स तो कमजोर बच्चे लेते हैं।' क्या जिंदगी का असली मकसद सिर्फ एक ऐसी नौकरी पाना है जो हर महीने की एक तारीख को बैंक खाते में कुछ पैसे जमा कर दे? क्या उसे भी पूरी जिंदगी उसी भीड़ का हिस्सा बनकर भागना होगा, जो नीचे सड़कों पर भाग रही थी? इस गहरी, घनी अनिश्चितता ने उसके भीतर एक ऐसा डर पैदा कर दिया कि उसकी आँखों से आंसू टपक कर गर्म सीमेंट के फर्श पर गिर गए और पल भर में भाप बनकर उड़ गए।

"जब रास्ते धुंधले हों आरव, तो आँखों को बंद करने से रास्ता साफ नहीं होता, बल्कि भीतर का प्रकाश जगाना पड़ता है।"

एक गहरी, शांत और गूंजती हुई आवाज आरव के ठीक पीछे से आई। आवाज में इतना ठहराव था कि दोपहर की उस गर्म, सांय-सांय करती हवा का शोर जैसे पल भर में गायब हो गया। आरव ने चौंककर पीछे देखा।

छत की मियानी की छांव में, जहाँ कुछ देर पहले तक कोई नहीं था, वहाँ एक वृद्ध बैठे थे। उन्होंने बर्फ जैसे सफेद, स्वच्छ वस्त्र पहने हुए थे। उनकी दाढ़ी चांदी की तरह चमक रही थी, और उनकी आँखों में सदियों का अनुभव और एक असीम करुणा थी। लेकिन सबसे अजीब बात उनके हाथों में मौजूद एक भारी, चमड़े की जिल्द वाली प्राचीन पुस्तक थी, जिसके मुखपृष्ठ पर सुनहरे अक्षरों में उभरा हुआ था—"करियर मानचित्र"

आरव डर के मारे अपनी जगह पर जम गया। दोपहर की चिलचिलाती धूप में इस अजनबी का छत पर होना किसी चमत्कार जैसा था। "आप... आप कौन हैं? और यहाँ ऊपर कैसे आए?" आरव की आवाज लड़खड़ाई।

वृद्ध ने हाथ उठाकर उसे शांत रहने का संकेत दिया। उनकी मुस्कान में ऐसा जादू था कि आरव के भीतर की सारी घबराहट पल भर में गायब हो गई।

"डरो मत, आरव," वृद्ध ने कहा, उनकी आवाज किसी बहती हुई नदी जैसी सुरीली थी। "मैं समय-ऋषि हूँ। मैं समय के अनंत चक्र से निकलकर तुम्हारे जैसे उन लाखों युवाओं की उलझन सुलझाने आता हूँ, जो जीवन के इस सबसे महत्वपूर्ण चौराहे पर आकर ठिठक जाते हैं। यह जो अकेलापन और डर तुम्हारे भीतर है, यह कोई कमजोरी नहीं है। यह इस बात का प्रमाण है कि तुम अपने जीवन को लेकर गंभीर हो।"

आरव ने थूक निगलते हुए उस भारी पुस्तक की ओर देखा, जो वृद्ध के हाथों में थी। "और यह पुस्तक?"

"यह 'करियर मानचित्र' है," समय-ऋषि ने उसे सहलाते हुए कहा। "तुम्हारे नीचे जो लोग बैठे हैं, वे बुरे नहीं हैं। वे तुम्हें प्यार करते हैं, इसलिए वे तुम्हें सुरक्षा देना चाहते हैं। वे तुम्हें एक 'नौकरी' की तरफ धकेल रहे हैं, जबकि तुम्हें इस समय अपने 'करियर' की तलाश करनी चाहिए।"

"नौकरी और करियर?" आरव ने हैरान होकर पूछा, "क्या ये दोनों एक ही चीज़ नहीं हैं?"

समय-ऋषि ने अपनी उंगलियाँ चटकाईं।

अचानक छत की गर्म हवा थम गई और सामने की हवा एक सजीव स्क्रीन में बदल गई।

पहले रास्ते पर हजारों, लाखों लोग चल रहे थे। वे सब एक कतार में थे, उनके हाथों में वेतन की पर्चियाँ थीं, लेकिन उनके चेहरों पर एक अजीब सी थकान और बेबसी थी। वे बस घड़ी की सुइयों के साथ आगे बढ़ रहे थे, जैसे कोई मशीन हो।

दूसरे रास्ते पर लोग कम थे। वहाँ कोई कतार नहीं थी। आरव ने ध्यान से देखा—वहाँ कोई नदी पर एक विशाल पुल बना रहा था, तो कोई प्रयोगशाला में कांच की नलियों के बीच एक नई दवा खोज रहा था। कोई छोटे बच्चों को घेरे बैठा हंसते हुए पढ़ा रहा था, तो कोई दूर एक कंप्यूटर स्क्रीन पर रॉकेट की दिशा तय कर अंतरिक्ष की ओर भेज रहा था। इन लोगों के चेहरों पर थकान नहीं, बल्कि एक अनोखी चमक थी।

"दोनों रास्तों पर पैसा मिलता है, आरव," ऋषि की गंभीर आवाज गूंजी, "लेकिन पहले रास्ते पर लोग केवल 'कमाते' हैं। दूसरे रास्ते पर लोग कमाते भी हैं और कुछ 'बनाते' भी हैं। पहला रास्ता सिर्फ एक नौकरी है, जो पेट भरती है। दूसरा रास्ता एक करियर है, जो आत्मा को पहचान देता है। अब तुम्हें चुनना है कि तुम सिर्फ कतार का हिस्सा बनना चाहते हो, या कुछ रचना चाहते हो?"

आरव सम्मोहित सा उन दृश्यों को देखता रहा। उसके भीतर की धुंध अब धीरे-धीरे छंट रही थी। उसने उस भारी, चमकीली पुस्तक 'करियर मानचित्र' की ओर देखा। "क्या इस पुस्तक में मेरा रास्ता भी है, ऋषि जी?"

समय-ऋषि ने करियर मानचित्र को धीरे से खोला।

जैसे ही पुस्तक खुली, आरव की आँखें फटी की फटी रह गईं। उस पुस्तक के पन्ने किसी साधारण कागज के नहीं बने थे। वे मानो जीवित थे, धीरे-धीरे स्पंदन कर रहे थे, जैसे कोई सांस ले रहा हो। उन पन्नों के भीतर एक हल्की सुनहरी रोशनी किसी रक्त-संचार की तरह बह रही थी। आरव ने देखा कि पन्नों पर लिखे कुछ शब्द अपने आप बन रहे थे, चमक रहे थे, और कुछ शब्द धुंधले होकर गायब हो रहे थे। मानो वह पुस्तक वर्तमान के साथ-साथ भविष्य को खुद में रच रही हो।

"यह पुस्तक जीवित है..." आरव के मुंह से धीरे से निकला।

"हाँ आरव," समय-ऋषि ने कहा, "क्योंकि भविष्य कभी स्थिर नहीं होता। वह हर पल तुम्हारे फैसलों के साथ बदलता है।"

ऋषि ने पन्ने को थोड़ा और आगे पलटा।

अचानक, छत की दीवारें और मुंडेर गायब होने लगीं। आरव के पैरों के नीचे का फर्श हल्के से कांप उठा। हवा में अनगिनत चमकते हुए विशाल, पारदर्शी द्वार प्रकट होने लगे, जो शून्य में तैर रहे थे। आरव ने अपनी थामी हुई धड़कनों के बीच देखा—एक द्वार पर सुनहरे अक्षरों में लिखा था—"विज्ञान"। दूसरे पर नीले अक्षरों में चमक रहा था—"कला"। एक और द्वार था जिस पर लिखा था—"व्यापार"।

और इन सब द्वारों से बहुत दूर, सबसे पीछे, एक धुंधले और रहस्यमयी द्वार पर केवल एक शब्द रह-रहकर सांस लेता हुआ चमक रहा था— "भविष्य"

आरव ने भय और असीम उत्सुकता के मिले-जुले भाव से उस सबसे दूर वाले द्वार की ओर देखा। उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। वह उस रास्ते पर कदम बढ़ाने ही वाला था कि तभी समय-ऋषि की गंभीर और गूंजती हुई आवाज आई—

"उस अंतिम द्वार तक पहुँचने से पहले आरव, तुम्हें एक बेहद कठिन परीक्षा से गुजरना होगा। तुम्हें स्वयं को जानना होगा।"

और अगले ही क्षण, पूरी छत एक तीव्र, दूधिया प्रकाश में डूब गई। आरव को ऐसा लगा जैसे वह हवा में तैर रहा हो, और फिर सब कुछ शांत हो गया...

अध्याय 1 समाप्त