मिट्टी की पुकार - भाग 2 : बदलते रास्ते
मिट्टी की पुकार
भाग 2 : बदलते रास्ते
अध्याय 6 : बंद स्कूल और कंचों की खनक
जेठ की ढलती हुई शाम में भी प्राथमिक विद्यालय का अहाता भट्टी की तरह सुलग रहा था। अर्जुन ने अहाते के कोने में धंसे जंग लगे सरकारी हैंडपंप के लोहे के हत्थे को पूरी ताकत से ऊपर-नीचे करना शुरू किया। दस-बारह बार सूखी, धातुई चरचराहट के बाद हैंडपंप ने एक गहरी हिचकी ली और नीचे से पीला, मटमैला और खारा पानी उगलना शुरू किया।
"बस-बस अर्जुन जी, इतना बहुत है," मीरा ने हाँफते हुए कहा। उसने अपनी साड़ी का पल्लू कमर में और कस लिया था। उसके चेहरे पर पसीने की बूंदों ने धूल के साथ मिलकर मटमैली लकीरें बना दी थीं। उसने प्लास्टिक की बाल्टी उठाई और जर्जर बरामदे की तरफ बढ़ी।
अर्जुन हैंडपंप पर ही रुक गया। उसकी सांसें तेज़ चल रही थीं और दाहिनी हथेली पर लोहे के हत्थे की रगड़ से एक छाला उभर आया था। वह भीतर ही भीतर खुद पर चिढ़ रहा था। 'मैं यहाँ क्यों रुका हूँ? मुझे तो अब तक बस स्टैंड पर होना चाहिए था। माँ की सिरप घर देकर सीधे निकल जाना था।' उसका अहंकार उसे कचोट रहा था। उसे लग रहा था कि दिल्ली की एक पढ़ी-लिखी लड़की के सामने वह किसी आज्ञाकारी मजदूर की तरह काम कर रहा है।
"आप जा सकते हैं, अगर आपकी शहर वाली बस का टाइम हो रहा हो तो," मीरा ने बिना मुड़े, बरामदे के फर्श पर पानी छिड़कते हुए कहा। उसकी आवाज़ में कोई एहसान जताने का भाव नहीं था, बस एक रूखापन था जो उसकी अपनी असुरक्षा से उपजा था।
"हम भाग नहीं रहे हैं मैडम," अर्जुन ने अपनी जींस की जेब में हाथ डालते हुए कड़े लहजे में कहा। "लेकिन आपकी जानकारी के लिए बता दें, इस फर्श को पानी से धोने से बच्चे नहीं आएंगे। वो जो सामने बरगद के नीचे लड़के बैठे हैं ना, उन्हें कंचे खेलने में ज्यादा मजा आता है। इस गाँव का मिज़ाज अलग है।"
स्कूल की ढही हुई बाउंड्री वॉल के बाहर, धूल में बैठे चार-पाँच बच्चे जोर-जोर से चिल्ला रहे थे। उनमें चौदह साल का नंदू सबसे आगे था, जिसकी मैली हो चुकी कमीज के नीचे के दो बटन गायब थे।
"अरे देख, देख! नकिया लग गया! चल, पाँच अठन्नी निकाल अब!" नंदू अपनी फटी हुई चप्पल को जमीन पर पटकते हुए चिल्लाया।
मीरा बरामदे से बाहर आई। उसने हाथ की झाड़ू वहीं मुंडेर पर टिकी रहने दी और गेट की तरफ बढ़ी। अर्जुन भी कशमकश में उसके पीछे हो लिया।
"तुम लोग स्कूल क्यों नहीं आते?" मीरा ने सीधे नंदू के सामने खड़े होकर पूछा। उसकी आवाज़ नियंत्रित थी, जैसी उसने अपनी सिविल सेवा की कॉपियों में सीखी थी, पर देहात के इस यथार्थ के सामने वह थोड़ी कमज़ोर लग रही थी।
नंदू ने हाथ में पकड़े कंचों को अपनी मैली जेब में ठूंसा और मीरा को ऊपर से नीचे तक देखा। "काहे आएँ मैडम जी? मास्टर साहेब जो पहले थे, वो तो बस हफ्ते में एक दिन आते थे, खैनी मलते थे और हमसे अपनी मोटरसाइकिल साफ करवाते थे। स्कूल में खिचड़ी भी तो आधी सड़ी मिलती है। उससे अच्छा तो हम बेनी काका की गाय चरा लेते हैं, शाम को पाँच रुपया और एक लोटा छाछ मिल जाता है। पेट तो भरता है।"
बाकी लड़के ही-ही करके हंस पड़े। अर्जुन के जबड़े भिंच गए। उसने आगे बढ़कर नंदू का कॉलर पकड़ना चाहा, "ए नंदू! तमीज़ से बात कर मैडम से। बहुत पर निकल आए हैं तेरे?"
नंदू ने अर्जुन को देखा, उसकी आँखों में कोई डर नहीं था, बल्कि एक अजीब सा भोलापन और कड़वाहट मिक्स थी। "अरे अर्जुन भैया, तुम काहे खिसिया रहे हो? तुम खुद तो डिग्री लेकर दिनभर सुखदेव की दुकान पर बैठे रहते हो। जब तुम पढ़-लिखकर कुछ नहीं कर पाए, तो हम पढ़कर कौन सा कलक्टर बन जाएंगे?"
नंदू का यह तीखा तीर सीधे अर्जुन के उस घाव पर लगा जिसे वह दुनिया से छिपाना चाहता था। उसका चेहरा लाल हो गया, पर उसके पास कोई जवाब नहीं था। मीरा ने फुर्ती से बीच में आकर अर्जुन का हाथ हटा दिया।
"गुस्से से बात नहीं बनेगी अर्जुन जी," मीरा ने ठंडी आवाज़ में कहा, फिर वह नंदू की तरफ मुड़ी। "नंदू, कल सुबह अगर तुम और तुम्हारे दोस्त स्कूल आए, तो मैं तुम्हें कंचों के खेल का एक ऐसा नियम बताऊँगी जिससे तुम निशाना लगाने में कभी नहीं हारोगे। गणित का नियम। आओगे?"
नंदू ने अपने दोस्तों को देखा, फिर मीरा के चेहरे को। "झूठ बोल रही हैं। कंचे में कोई पढ़ाई काम नहीं आती। यह तो उंगलियों का खेल है।"
"आज़मा कर देख लो। कल सुबह नौ बजे।" मीरा ने कहा और वापस स्कूल के अंदर चली गई। अर्जुन वहीं खड़ा रहा। उसने जमीन पर बिखरे कंचों को देखा और फिर स्कूल की इमारत को, जहाँ मीरा अब अकेले ही एक कोने को साफ करने में जुटी थी।
अध्याय 7 : पहला हफ्ता और सुखदेव की कड़ाही
मीरा की वह तरकीब पहले दिन पूरी तरह नाकाम रही। अगले दिन सुबह नौ बजे न तो नंदू आया और न ही गाँव का कोई दूसरा बच्चा। मीरा तीन घंटे तक खाली बेंचों के सामने अकेली बैठी रही। दीवारों से उखड़ा हुआ प्लास्टर उसकी बेबसी का मज़ाक उड़ा रहा था। उसे एहसास हो गया था कि दिल्ली के कोचिंग सेंटरों में बैठकर समाज बदलने के जो नोट्स उसने बनाए थे, वे बेलौना की इस तपती धूप में पिघल चुके थे।
चार दिन बीत गए। मीरा ने हार नहीं मानी। वह रोज़ सुबह गाँव की गलियों में जाती, घरों के चक्कर काटती। लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात था।
पाँचवें दिन, चौराहे पर सुखदेव की चाय की दुकान पर जलेबियां छन रही थीं। वनस्पति तेल की तेज़ चरचराहट के बीच बेनी काका अपने हुक्के का कश खींच रहे थे, जिससे निकलने वाला धुआं नीम के पत्तों में उलझ रहा था। हरिलाल अपनी बड़ी बही में कुछ लिखते हुए चश्मे के ऊपर से देख रहा था।
तभी वहाँ से मीरा गुज़री। उसके चेहरे पर हताशा साफ़ दिख रही थी।
"राम-राम मास्टरनी साहिबा!" सुखदेव ने कड़ाही से खंता हटाते हुए आवाज़ दी। "चाय-वाय पीजिए। इस गाँव में पैर टिकाना है, तो ज़रा हमारे यहाँ का पानी भी पीकर देखिए। बेलौना की हवा बड़ी तेज़ है।"
मीरा रुकी। उसने सुखदेव की दुकान पर बैठे बुजुर्गों को देखा। "राम-राम काका। चाय तो फिर कभी, बस आपसे एक बात कहनी थी। आपके घर में जो बच्चे हैं, उन्हें भेजिएगा ज़रूर। स्कूल खुला रहता है।"
बेनी काका हंसे, उनके खोखले मुंह से तंबाकू की तेज़ गंध निकली। "बिटिया, स्कूल भेजने से पेट नहीं भरता। इस साल सूखा है। बच्चे खेतों में या मवेशियों के पीछे नहीं जाएंगे, तो शाम को चूल्हा कैसे जलेगा? पढ़ाई-लिखाई बड़े लोगों के चोंचले हैं।"
"काका, अगर आज वो स्कूल नहीं आए, तो ज़िंदगी भर दूसरों के खेतों में ही पाँच रुपये की मज़दूरी करेंगे," मीरा की आवाज़ में दृढ़ता थी, लेकिन उसमें एक हल्की सी कड़वाहट भी थी, जैसे वह बच्चों को नहीं, बल्कि खुद के उस अतीत को समझा रही हो जहाँ वह खुद तीन बार असफल होकर टूटी थी।
"अरे छोड़ो मैडम जी," हरिलाल ने अपनी बही को थपथपाते हुए तंज़ कसा। "तुम अपनी नौकरी बचाओ। ज्यादा नेतागिरी करोगी तो प्रधान जी नाराज़ हो जाएंगे। इस गाँव का नियम-कानून वही तय करते हैं, स्कूल की दीवारें नहीं।"
तभी अर्जुन और राहुल वहाँ से गुज़रे। अर्जुन से अब और चुप नहीं रहा गया। हरिलाल का यह लहजा उसे हमेशा से चुभता था। "काका, नियम-कानून सरकारी काग़ज़ और संविधान से चलता है, किसी की बपौती नहीं है। और आप अपने कर्ज़ की बही का हिसाब रखिए, स्कूल के मामलों में टांग मत अड़ाइए।"
"अर्जुन!" बेनी काका ने हुक्के की नली हटाकर डांटा। "बाप का कर्ज़ा चुकाने की औकात नहीं और बड़ों से बातें बड़ी-बड़ी!"
अर्जुन के भीतर की कड़वाहट आँखों में उतर आई। उसने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं। वह कुछ और कड़ा बोलने ही वाला था कि राहुल ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"चल यहाँ से अर्जुन, क्यों अपनी फज़ीहत करवा रहा है," राहुल ने उसे पीछे खींचते हुए कहा।
राहुल ने मीरा की तरफ देखा, उसकी आँखों में कोई सहानुभूति नहीं थी। जब वे चौराहे से दूर महुआ के पेड़ के पास पहुंचे, तो राहुल ने अर्जुन से कहा, "तू देख रहा है ना? यह मास्टरनी दो महीने में अपना ट्रांसफर कराकर शहर भाग जाएगी। और तू... तू यहीं फंसा रह जाएगा। शहर चल मेरे साथ, वहाँ कम से कम कोई तुझे तेरे बाप के कर्ज़ के ताने तो नहीं मारेगा। यहाँ रहेगा तो ये लोग तुझे मानसिक रूप से मार डालेंगे।"
अर्जुन ने दूर स्कूल की छत को देखा, जहाँ मीरा चुपचाप वापस लौट रही थी। राहुल की बातें सही थीं, पर अर्जुन के भीतर का स्वाभिमान इस हार को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था।
अध्याय 8 : पंचायत की छांव और मसीहा का मुखौटा
मीरा के आने के दो हफ्ते बीत चुके थे। स्कूल में अभी भी बकरियां ही चर रही थीं। इसी बीच, ग्राम प्रधान विक्रम सिंह के आलीशान, पक्के दालान में एक विशेष पंचायत बैठी थी। ऊंचे चबूतरे पर बेलौना के बड़े काश्तकार और कुछ रसूखदार लोग कुर्सियों पर बैठे थे, जबकि छोटे किसान और मज़दूर नीचे बिछी टाट की पट्टियों पर धूल में बैठे थे। विक्रम सिंह अपनी नक्काशीदार सागवान की कुर्सी पर बैठे पैर हिला रहे थे। उनके हाथ में पीतल के गिलास में ठंडी लस्सी थी।
"देखो भाई, इस बार सूखाड़ भारी है," विक्रम सिंह ने गंभीर और गहरी आवाज़ में कहा, जो सीधे लोगों के दिलों में उतरती थी। "ब्लॉक से जो सूखा राहत सामग्री की बोरियां आनी थीं, वो सरकारी बाबू लोग फाइलों में दबाकर बैठ गए हैं। पर तुम लोग घबराओ मत। हमने अपने निजी गोदाम से बीस बोरी गेहूं का इंतज़ाम किया है। जिस-जिस के घर में राशन खत्म हो, शाम को चुपचाप ट्रैक्टर के पास आकर ले जाना।"
"प्रधान जी अमर रहें! भगवान आपको सात जनम तक सुखी रखे!" नीचे बैठे दो-तीन गरीब, फटेहाल किसानों ने हाथ जोड़कर कहा।
फूलमती, जो एक कोने में घूंघट काढ़े बैठी थी, उसने चुपचाप अपनी सूखी, फटी हथेली को देखा। वह अंदर से जानती थी कि यह गेहूं मुफ्त नहीं है। इसके बदले उसके दोनों बेटों को अगले महीने विक्रम सिंह के खेतों में बिना किसी मज़दूरी के खटना होगा। पर इस वक्त बच्चों का पेट भरना ज्यादा ज़रूरी था, स्वाभिमान बाद की बात थी। विक्रम सिंह इसी मजबूरी का फायदा उठाकर सबका मसीहा बना हुआ था।
तभी घसीटा ने आकर विक्रम सिंह के कान में कुछ फुसफुसाया। विक्रम सिंह की भौहें थोड़ी सिकुड़ीं, पर चेहरे की वो ट्रेडमार्क मुस्कान गायब नहीं हुई।
"रामस्वरूप भाई," विक्रम सिंह ने नीचे बैठे रामस्वरूप को आवाज़ दी, जो अपनी पीली डायरी को सहेजकर एक कोने में बैठे थे। "सुना है अर्जुन बाबू आजकल सरकारी स्कूल की सफाई में लगे हैं? शहर जाने का टिकट कैंसिल करवा दिए क्या उनका?"
रामस्वरूप अचानक टोकने से सकपका गए। उन्होंने अपनी फटी हवाई चप्पल को जमीन पर रगड़ते हुए कहा, "नहीं प्रधान जी, वो तो बस... लड़का है, थोड़ा रास्ता भटक गया है। घर में झगड़ा करके निकला था। मैं उसे समझाऊँगा।"
"समझा लीजिए मिश्रा जी," विक्रम सिंह ने लस्सी का एक बड़ा घूंट लेते हुए कहा। अब उनकी आवाज़ में एक मखमली, ठंडी धमकी घुल चुकी थी। "नया खून है, जोश में अक्सर होश खो देता है। वो जो नई मास्टरनी आई है, बेचारी भोली लड़की है। शहर से आई है, उसे नहीं पता कि बेलौना की मिट्टी का मिज़ाज क्या है। यहाँ ज्यादा हलचल होगी, तो ब्लॉक के बड़े अफसर आएंगे, जांच-पड़ताल होगी। फिर जो राहत सामग्री हम अपनी जेब से दे रहे हैं, वो भी रुक जाएगी। तुम तो नहीं चाहोगे ना मिश्रा जी कि तुम्हारे लड़के की ज़िद की वजह से पूरे गाँव का पेट खाली रहे? और हाँ, बैंक वाले कल्टीवेटर लोन की फाइल भी हमारे टेबल पर छोड़ गए हैं।"
रामस्वरूप का बचा-कुचा हौसला भी टूट गया। उनका सिर झुक गया। वे जानते थे कि विक्रम सिंह अगर अपनी ज़िद पर आ जाए, तो बैंक का लोन कल ही उनके घर के बर्तनों तक की कुर्की करवा देगा।
उसी शाम, जब रामस्वरूप थके कदमों से घर पहुंचे, तो उनका चेहरा पूरी तरह सफ़ेद पड़ चुका था। उन्होंने ओसारे में बैठी सावित्री से बिना नज़रें मिलाए सिर्फ इतना कहा, "आरती से कहो, वो कॉलेज का फॉर्म फाड़कर चूल्हे में डाल दे। इस घर में अब कोई नहीं पढ़ेगा। पढ़ाई ही सारी आफ़त की जड़ है।"
अध्याय 9 : झुलसती उम्मीदें और धनीराम का बैल
तीसरे हफ्ते की शुरुआत तक सूखाड़ ने अपना सबसे क्रूर और नग्न रूप दिखाया। दोपहर की हवा इतनी गर्म थी कि खेतों के किनारे खड़े बबूल के पेड़ों की छाल भी चटकने लगी थी। अचानक गाँव के एक छोटे किसान, धनीराम के खपरैल के घर से करुण चीख-पुकार मच गई।
अर्जुन और राहुल, जो बस स्टैंड के पास एक पुराने खोखे के पीछे खड़े बात कर रहे थे, आवाज़ सुनकर धनीराम के टोले की तरफ भागे। वहाँ पूरा गाँव पहले से ही इकट्ठा था। धूल से भरे अहाते में धनीराम का इकलौता हरियाणवी नस्ल का बैल जमीन पर गिरा हुआ था। उसकी बड़ी-बड़ी आँखें पथरा चुकी थीं और सूखे मुंह से सफ़ेद झाग निकल रहा था। पानी की कमी और सूखे भूसे ने उसके पेट को फुला दिया था, जिससे उसकी जान चली गई थी।
धनीराम जमीन पर छाती पीट-पीटकर रो रहा था। "हाय री दइया! अब हम केकर सहारे जीब? यही एक आस बची थी... ज़मीन भी सूखी, बैल भी चला गया! अब हल कौन खींचेगा?"
उसकी पत्नी और तीन छोटे-छोटे बच्चे बैल के गले से लिपटकर रो रहे थे। माहौल में एक ऐसा सन्नाटा और मातम था जो इस सूखाड़ की असली कीमत बयां कर रहा था। अर्जुन ने आगे बढ़कर धनीराम के कांपते कंधे को संभालने की कोशिश की, "धनीराम काका, संभालो खुद को। धीरज रखो।"
"क्या धीरज रखे अर्जुन बाबू?" बेनी काका ने पीछे से आकर अपनी लाठी जमीन पर पटकी, उनकी बूढ़ी आँखें भी डबडबा आई थीं। "यह सिर्फ धनीराम का बैल नहीं मरा है, इस बेलौना गाँव की बची-कुची रीढ़ की हड्डी टूट गई है। जब पानी ही नहीं है, तो जानवर क्या, इंसान भी एक दिन ऐसे ही तड़पकर मरेगा।"
तभी वहाँ विक्रम सिंह अपनी स्कॉर्पियो से उतरे। उनके पीछे घसीटा दो बोरियां लेकर आया। विक्रम सिंह ने धनीराम के सिर पर हाथ रखा और कहा, "धनीराम, जो होना था हो गया। रोने से बैल जिंदा नहीं होगा। घसीटा! इसके घर में एक बोरी अनाज डालो, और सुनो... कल हमारे अस्तबल से दूसरा बैल ले आना, अपना खेत जोत लेना। जब तक विक्रम सिंह जिंदा है, बेलौना का कोई किसान भूखा नहीं मरेगा।"
पूरा गाँव फिर से विक्रम सिंह के पैरों में झुक गया। अर्जुन यह सब देख रहा था। उसे विक्रम सिंह की इस 'मदद' के पीछे छिपा वो घिनौना जाल साफ़ दिखाई दे रहा था, जो पूरे गाँव को मानसिक गुलाम बनाए हुए था। अर्जुन की आँखें सुलग उठीं, लेकिन इस बार उसने अपने गुस्से को दबाया। उसने कड़े लेकिन शांत स्वर में भीड़ के बीच से कहा, "यह बैल प्यास से मरा है प्रधान जी। और प्यास से यह इसलिए मरा क्योंकि हमारे गाँव के सरकारी कुएं और तालाब सूखे हैं, और नहर का पानी आपके कोल्ड स्टोरेज में जा रहा है। आप एक बैल देकर पूरे गाँव की चेतना खरीद रहे हैं!"
रामस्वरूप ने तुरंत आगे बढ़कर अर्जुन का हाथ खींचा, "चुप कर नालायक! प्रधान जी की भलाई का ये सिला दे रहा है?"
विक्रम सिंह रुके। उन्होंने मुड़कर अर्जुन को देखा। इस बार उनकी मुस्कुराती हुई आँखों में एक गहरी, हिंसक चमक थी। "अर्जुन बाबू, राजनीति और समाज सुधार का शौक अच्छा है, पर जब घर का चूल्हा जल रहा हो तब... अपने बाप की फटी कमीज देखो पहले, फिर बेलौना की फिक्र करना।"
विक्रम सिंह अपनी गाड़ी में बैठकर चले गए। गाँव के लोग अर्जुन को इस तरह देखने लगे मानो उसने किसी भगवान का अपमान कर दिया हो। राहुल ने भी अर्जुन का हाथ पकड़ा और उसे वहाँ से घसीटते हुए दूर ले गया। राहुल का चेहरा भी डर से पीला था।
अध्याय 10 : पहला विरोध और बंद कपाट
उस रात बेलौना में कोई नहीं सोया। धनीराम के घर से आ रही रोने की आवाज़ें हवा में तैर रही थीं। अर्जुन अपने घर के ओसारे में अकेला बैठा था। उसका गाल अभी भी उस अपमान से सुलग रहा था जो उसे हर जगह मिल रहा था। उसके भीतर एक भयानक युद्ध चल रहा था।
तभी राहुल अंधेरे में से निकलकर उसके पास आया। राहुल का बैग उसके कंधे पर था।
"मैं कल सुबह की पहली बस से शहर वापस जा रहा हूँ अर्जुन," राहुल ने धीमी आवाज़ में कहा। उसकी आँखों में एक अजीब सा डर था। "विक्रम सिंह बहुत खतरनाक आदमी है। तू नहीं जानता कि वह क्या कर सकता है। तू इस गाँव को नहीं बदल सकता। मेरे साथ चल, अभी भी वक़्त है।"
"मैं नहीं भागूँगा राहुल," अर्जुन ने बिना सिर उठाए कहा।
"तो फिर मैं तेरी मदद नहीं कर पाऊँगा, भाई," राहुल ने दबी, टूटी आवाज़ में कहा। उसने अर्जुन के कंधे पर हाथ रखा, फिर हटा लिया। वह अर्जुन को छोड़ रहा था, क्योंकि वह अपनी कमज़ोरियों के साथ इस लड़ाई का हिस्सा बनने से डरता था। वह अंधेरे में विलीन हो गया।
राहुल के जाने के बाद, आरती दबे पांव अर्जुन के पास आकर बैठ गई। उसके हाथ में वही रामस्वरूप की पीली डायरी थी।
"भैया," आरती ने फुसफुसाते हुए कहा। उसने डायरी खोली और उसमें से वो 1986 का स्कॉलरशिप लेटर निकाला। "बाबूजी ने मुझसे कहा था कि मैं इसे चूल्हे में जला दूँ। पर मैंने इसे छुपा लिया। भैया, बाबूजी डरे हुए हैं क्योंकि उनके पास खोने के लिए सिर्फ यह तीन बीघे ज़मीन बची है। पर आपके पास तो पूरा भविष्य है। क्या आप भी डरकर शहर भाग जाएंगे?"
अर्जुन ने उस भूरे पड़ चुके कागज़ को देखा। उसने आरती की आँखों में देखा, जहाँ पढ़ाई की एक अधूरी ललक थी। फिर उसने दूर अंधेरे में दिख रहे उस प्राथमिक विद्यालय की रूपरेखा को देखा।
"नहीं आरती," अर्जुन ने कड़े स्वर में कहा, उसका भटकाव अब एक ठोस संकल्प में बदल चुका था। "मैं कहीं नहीं जाऊँगा। यह लड़ाई सिर्फ ज़मीन की नहीं है, यह इस मिट्टी के स्वाभिमान की है।"
अगली सुबह, जब नौ बजे स्कूल की घंटी बजी—जो तीन हफ्तों की नाकामी के बाद गूंजी थी—तो मीरा स्कूल के बरामदे में खड़ी थी। उसे उम्मीद नहीं थी कि कोई आएगा।
पिछले कुछ दिनों से नंदू रोज़ दूर खड़ा होकर देखता था कि मैडम बिना नागा स्कूल आती हैं, चाहे कोई बच्चा आए या नहीं। आज वह बरगद के पेड़ के नीचे खड़ा अपने कंचे हथेली पर लेकर झिझक रहा था।
लेकिन तभी उसने देखा कि फाटक के टूटे हिस्से से नंदू और उसके पीछे चार और लड़के धीरे-धीरे अंदर आ रहे थे। उनके हाथों में कंचे नहीं, बल्कि स्लेट और चॉक थे। नंदू की जेब में कंचे तो थे, पर उसकी आँखों में मीरा की उस गणित वाली चुनौती को आज़माने की उत्सुकता थी।
और उनके ठीक पीछे अर्जुन मिश्रा खड़ा था, जिसके कंधे पर इस बार शहर जाने वाला झोला नहीं, बल्कि स्कूल की टूटी हुई खिड़कियों को ठीक करने के लिए कुछ लकड़ी के तख्ते और हथौड़ी थी।
मीरा के चेहरे पर एक हल्की सी, प्रामाणिक मुस्कान उभरी। उसने अर्जुन की तरफ देखा और कहा, "पानी आ गया अर्जुन जी?"
"हैंडपंप का पानी खारा है मैडम, पर इस स्कूल की धूल साफ़ करने के लिए काफी है," अर्जुन ने हथौड़ी संभालते हुए कहा।
बेलौना गाँव में पहली बार व्यवस्था के बंद कपाटों पर एक सीधी चोट की गई थी, और इसकी गूंज अब प्रधान के दालान तक पहुँचने वाली थी।
[भाग 2 समाप्त]