अध्याय 2 : विश्वास में पहली दरार

अध्याय 2 : विश्वास में पहली दरार

महान वार्षिक परिषद के समापन के बाद, आमाशय के विशाल केंद्रीय कक्ष की बत्तियां बुझ चुकी थीं। सभा भंग हो गई थी, लेकिन लेडी लिंगुआ का वह प्रश्न हवा में एक ऐसे अदृश्य कोहरे की तरह तैर रहा था, जिसने देह साम्राज्य के पारदर्शी आसमान को थोड़ा सा धुंधला कर दिया था।

यह कोई तात्कालिक संकट नहीं था, न ही किसी ने हथियारों पर हाथ रखा था। यह तो बस एक विचार था—एक ऐसा विचार जिसने हज़ारों वर्षों से चले आ रहे 'परम संतुलन' के कवच में एक बारीक सी दरार डाल दी थी।

अगली सुबह, रक्तेश का मालवाहक जहाज जब महाधमनी (Aorta) के मुख्य राजमार्ग से गुजर रहा था, तो नदी का बहाव हमेशा की तरह सुचारू था, परंतु घाटों पर काम करने वाले नागरिकों का स्वर बदला हुआ था।

"क्या तुमने कल रात लेडी लिंगुआ की बात सुनी?" एक युवा प्लेटलेट इंजीनियर ने नदी किनारे टूटी हुई केशिका की मरम्मत करते हुए अपने साथी से पूछा। उसके हाथों में फाइब्रिन के धागे थे। "अगर सचमुच कभी ऐसा चुनाव करना पड़े, तो हमारा क्या होगा? हम तो हड्डियों के कारखानों से निकलते हैं, हमें तो कोई नहीं पूछेगा।"

पास ही खड़ा एक भारी-भरकम श्वेत रक्त कोशिका का सैनिक, जो अपनी ढाल चमका रहा था, उदासी से बड़बड़ाया, "नेता कोई भी बने... सीमा पार के राक्षसों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वे तो बस हमारे कमजोर होने का इंतजार कर रहे हैं। अगर यह साम्राज्य सुरक्षित नहीं रहा, तो किसकी श्रेष्ठता और कैसा राज?"

रक्तेश ने अपनी पतवार थामे हुए इन बातों को सुना। उसने महसूस किया कि लेडी लिंगुआ के उस एक प्रश्न ने केवल राजाओं को नहीं, बल्कि देश के सबसे छोटे मजदूर से लेकर सीमा पर तैनात सिपाही तक के भीतर एक अनजाना डर पैदा कर दिया था। समाज के भीतर अपनी-अपनी पहचान और वजूद को लेकर एक धीमी सी सुगबुगाहट शुरू हो चुकी थी।

उत्तर में, मस्तिष्क नगर के 'सेरेब्रल कॉर्टेक्स' महल में हमेशा की तरह शांत, नीली विद्युत तरंगें बह रही थीं। यहाँ कोई चिल्लाहट नहीं थी, कोई युद्ध का आह्वान नहीं था। चांसलर सेरेब्रम अपनी विचार-कुर्सी पर बैठे गहरे ध्यान में थे। उनके सामने उनके मुख्य रणनीतिकार, लॉर्ड फ्रंटल खड़े थे।

"चांसलर," लॉर्ड फ्रंटल ने बहुत ही संयत स्वर में कहा, "वार्षिक परिषद के बाद से तंत्रिका मार्गों (Nerves) में थोड़ी सी बेचैनी है। क्या हमें हृदय दुर्ग की गतिविधियों पर कड़ी नजर रखनी चाहिए?"

चांसलर सेरेब्रम ने अपनी आँखें खोलीं। उनकी आवाज में कोई क्रोध नहीं था, बल्कि एक गहरा, विचारशील संयम था:

"लॉर्ड फ्रंटल, मैं किंग वेंट्रिकल के इरादों पर कतई संदेह नहीं करता। वे मेरे पुराने मित्र हैं और इस साम्राज्य के सबसे परोपकारी रक्षक हैं। लेकिन... समस्या किंग वेंट्रिकल नहीं हैं, समस्या उनकी विचारधारा है। वे भावना से चलते हैं। और भावनाएं, चाहे कितनी भी पवित्र क्यों न हों, अस्थिर होती हैं। इस असीम ब्रह्मांड में यह साम्राज्य तब तक ही जीवित रह सकता है, जब तक इसके निर्णय ठंडी बुद्धि, कठोर तर्क और सटीक गणना के आधार पर लिए जाएं। विचारों को भावनाओं के हवाले नहीं किया जा सकता। हमें बस यह सुनिश्चित करना है कि साम्राज्य की तर्कवादी व्यवस्था अक्षुण्ण रहे।"

चांसलर ने किसी युद्ध की योजना नहीं बनाई। उन्होंने बस इतना आदेश दिया कि संवेदी अंग (आंख और कान) साम्राज्य की चयापचय (Metabolism) स्थिति का अधिक सटीक डेटा इकट्ठा करना शुरू करें, ताकि तर्क की नींव कमजोर न हो।

उसी समय, पसलियों के लाल पिंजरे के भीतर 'हृदय दुर्ग' की दीवारें अपनी शाश्वत लय में संकुचित और शिथिल हो रही थीं—धक्-धक्... धक्-धक्...। किंग वेंट्रिकल अपने सिंहासन पर बैठे थे, उनकी हथेलियाँ उनकी तलवार की मूठ पर थीं। उनके सामने फेफड़ा प्रदेश के रक्षक खड़े थे।

"महाराज," फेफड़ों के एक दूत ने कहा, "मस्तिष्क नगर के न्यूरॉन्स आज सुबह से हमारे वायु-द्वारों के डेटा की जांच कुछ ज्यादा ही बारीकी से कर रहे हैं। ऐसा लगता है वे हम पर अविश्वास कर रहे हैं।"

किंग वेंट्रिकल ने एक लंबी, भारी सांस ली। उनके चेहरे पर गुस्सा नहीं, बल्कि एक गहरा दुख था:

"सेरेब्रम मेरे पुराने और परम मित्र हैं, दूत। उन्होंने और मैंने मिलकर इस देश को शून्य से खड़ा किया है। मैं उनकी बुद्धिमत्ता का आदर करता हूँ। पर... कभी-कभी वे अपने ऊंचे महल में बैठकर यह भूल जाते हैं कि जिन आंकड़ों और संख्याओं को वे मापते हैं, उनके पीछे जीवित प्राण भी होते हैं। यह साम्राज्य केवल तर्कों की एक मशीन नहीं है; यह धड़कता हुआ जीवन है, जो प्रेम, त्याग और आपसी सद्भाव से चलता है। अगर हम हर चीज को सिर्फ नफे-नुकसान की तराजू पर तोलने लगेंगे, तो इस समाज की आत्मा ही मर जाएगी। हमें धड़कते रहना होगा, और यह याद दिलाते रहना होगा कि जीवन का अर्थ गणना से कहीं बड़ा है।"

हृदय दुर्ग में भी कोई तलवारें नहीं खिंचीं। वहां बस अपने लोक-कल्याण के सिद्धांत को और अधिक मजबूती से थामने का संकल्प लिया गया।

परंतु, जब ये दो पुराने मित्र एक-दूसरे के प्रति सम्मान और चिंता के बीच अपने-अपने सिद्धांतों को मजबूत कर रहे थे, तब कपाल घाटी के सबसे निचले और अंधेरे तहखाने में कुछ और ही पक रहा था।

'अंतःस्रावी साम्राज्य' की गुप्त परिषद में ग्रैंड चांसलर पीयूष ग्रंथि (Pituitary Gland) शांत बैठी थीं। छाया में बैठे लॉर्ड हाइपोथैलेमस की मद्धम सांसों की आवाज आ रही थी। यहाँ की विचारधारा बिल्कुल अलग थी। यहाँ का मानना था कि जो सीधे दिखता है, वह भ्रम है; असली शक्ति अदृश्य रहकर संतुलन को साधने में है।

"मस्तिष्क और हृदय दोनों ही अपनी-अपनी जगह पर संभलकर कदम रख रहे हैं," पीयूष ग्रंथि ने कहा। "वे लड़ना नहीं चाहते।"

"वे लड़ेंगे भी नहीं," छाया से लॉर्ड हाइपोथैलेमस की रहस्यमयी आवाज गूंजी। "वे दोनों बहुत महान हैं। लेकिन हम यहां शासन करने के लिए नहीं हैं, चांसलर। हमारा काम केवल एक ही है—संतुलन बनाए रखना। जब दो विशाल विचारधाराएं एक ही धरातल पर खड़ी होती हैं, तो संतुलन बनाए रखने के लिए किसी एक का पलड़ा थोड़ा सा झुकाना पड़ता है। हमारे हॉर्मोन संदेशवाहकों को तैयार रखो। वे किसी के दुश्मन नहीं हैं, वे बस समय आने पर स्थितियों की गति (Feedback Mechanism) बदल देंगे।"

उनकी बातें इतनी शांत और रहस्यमयी थीं कि यह तय कर पाना असंभव था कि वे साम्राज्य की रक्षा कर रहे थे या पर्दे के पीछे से अपनी बिसात बिछा रहे थे।

रक्तेश का जहाज जब यकृत राज्य के घाट पर रुका, तो वहां का दृश्य पूरी तरह शांत था। बैरन हेपेटिक, जो हमेशा इस राजनैतिक सरगर्मी से दूर रहते थे, चुपचाप अपने अनाज (ग्लाइकोजन) के बोरों की गिनती बढ़ा रहे थे। उनका मूक कर्मयोगी का सिद्धांत अटूट था—"जो दिखाई नहीं देता, वही सबसे आवश्यक होता है।" वे जानते थे कि जब राजा और चांसलर के विचारों में तनातनी होती है, तो सबसे पहले आपूर्ति व्यवस्था प्रभावित होती है। इसलिए, उन्होंने चुपचाप अपने भंडार को और सुरक्षित करना शुरू कर दिया था।

उस रात, रक्तेश ने अपनी नाव के डेक पर लेटकर पूरे साम्राज्य को देखा।

बाहर से सब कुछ वैसा ही था। कंकाल के सफेद पहाड़ वैसे ही खड़े थे, त्वचा की महान प्राचीर वैसी ही सुरक्षित थी। लेकिन हवा का मिजाज बदल चुका था। दो मित्रों के बीच, दो महान प्रणालियों के बीच, विश्वास की पहली बारीक दरार आ चुकी थी। वे अब भी एक-दूसरे का सम्मान करते थे, लेकिन अपनी-अपनी विचारधाराओं के प्रति उनकी निष्ठा उन्हें धीरे-धीरे दो अलग-अलग ध्रुवों की ओर खींच रही थी।

संघर्ष की आग अभी भड़की नहीं थी, लेकिन चूल्हे में सूखी लकड़ियाँ चुनी जा चुकी थीं।

अध्याय 2 समाप्त।