मिट्टी की पुकार - भाग 3 : संघर्ष

 

मिट्टी की पुकार

भाग 3 : संघर्ष 

अध्याय 11 : शहर की चमक और कड़वा यथार्थ

जुलाई का पहला हफ्ता आ चुका था। आसमान में काले-कले बादलों के टुकड़े तैर रहे थे, पर वे बेलौना की ज़मीन को सिर्फ तरसाकर आगे बढ़ जाते। बूँद नहीं गिरती थी, बस उमस और बढ़ जाती थी। स्कूल में अब बच्चों की संख्या पाँच से बढ़कर बारह हो चुकी थी। नंदू अब रोज़ आता था, और मीरा ने उसे कंचों की गति और कोण के सहारे रेखागणित सिखाना शुरू कर दिया था।

एक दोपहर, जब स्कूल की छुट्टी हुई, तो अर्जुन स्कूल के अहाते में हैंडपंप के पास टूटे हुए चबूतरे की मरम्मत कर रहा था। तभी गेट पर एक पुरानी मोटरसाइकिल आकर रुकी। उस पर राहुल बैठा था। वह शहर से लौटा था, पर इस बार उसके बदन पर न तो वो कीमती जींस थी और न ही आँखों पर चश्मा। वह बेहद थका हुआ और मटमैला दिख रहा था।

"अर्थात तू अभी तक शहर नहीं गया अर्जुन?" राहुल ने गाड़ी खड़ी करते हुए पूछा। उसकी आवाज़ में वो पुरानी अकड़ गायब थी।

"मैंने अपना इरादा बदल दिया राहुल। मैं यहीं रहूँगा," अर्जुन ने कन्नी से सीमेंट हटाते हुए कहा। उसने राहुल के चेहरे को देखा। "तू तो कह रहा था कि तू शहर की किसी बड़ी सिक्योरिटी एजेंसी में बात करने जा रहा है? क्या हुआ?"

राहुल चबूतरे के कोने पर बैठ गया और अपना सिर पकड़ लिया। "शहर कोई जगह नहीं है अर्जुन, वो एक कसाईखाना है। मैं जिस दोस्त के भरोसे गया था, उसने खुद तीन महीने से कमरा किराया नहीं दिया था। मैं एक हफ्ते तक रेलवे स्टेशन के फुटपाथ पर सोया हूँ। एक सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी के लिए इंटरव्यू देने गया था, तो वहाँ पाँच-पाँच सौ रुपये की घूस मांग रहे थे। मेरी डिग्रियां, मेरी पढ़ाई... सब उस शहर के कचरे के डिब्बे में गिर गईं।"

मीरा बरामदे से निकलकर उनके पास आई। उसने राहुल की बात सुनी थी। "राहुल जी, शहर किसी को तब तक नहीं अपनाता जब तक वह उसकी रीढ़ की हड्डी न तोड़ दे। नाकामी का यह मतलब नहीं कि आप खत्म हो गए।"

राहुल कड़वाहट से हंसा। "मैडम जी, आपके पास सरकारी नौकरी है, इसलिए ये बातें अच्छी लगती हैं। मेरे घर पर हरिलाल रोज़ आकर बैठता है। माँ बीमार है। मैं हार चुका हूँ।"

अर्जुन ने अपना हाथ राहुल के कांपते कंधे पर रखा। उसने अपनी ज़िंदगी में पहली बार राहुल को इस तरह टूटते देखा था। "तू हारा नहीं है भाई। तू अपनी मिट्टी में वापस आया है। हम यहीं रहकर कुछ करेंगे।"

राहुल ने अर्जुन को देखा। उसकी आँखों में अभी भी संशय था, पर उस संशय के पीछे एक डूबते हुए इंसान की आख़िरी उम्मीद भी थी। वह अर्जुन का विरोधी नहीं, बल्कि उसकी लड़ाई का पहला गवाह बनने जा रहा था।

अध्याय 12 : बुढ़वा कुएं का गुप्त दस्तावेज़

बेलौना गाँव में बुढ़वा कुएं को लेकर एक पुरानी कहानी मशहूर थी। बेनी काका अक्सर सुखदेव की दुकान पर कहते थे कि सन 2004 में जब नहर का काम बीच में ही रुका था, तब सरकारी इंजीनियरों और विक्रम सिंह के बीच कुएं के पास ही कोई गुप्त लिखा-पढ़ी हुई थी, जिसे बाद में कुएं की भीतरी मुंडेर के एक खोखले ताक (Cavity) में छिपा दिया गया था। गाँव वाले इसे सिर्फ एक बूढ़े की बकवास मानते थे।

उसी जुलाई की एक शाम, जब तेज़ धूल भरी आँधी चल रही थी, अर्जुन अपनी गाय को ढूंढते हुए बुढ़वा कुएं के पास पहुँचा। आँधी इतनी तेज़ थी कि मुंडेर के पास लगे नीम के बूढ़े पेड़ की एक सूखी और भारी डाली टूटकर सीधे कुएं के अंदर जा गिरी। उस भारी चोट से कुएं की भीतरी दीवार का वो बरसों पुराना हिस्सा, जहाँ चूने का लेप लगा था, भरभराकर ढह गया।

अर्जुन ने टॉर्च की रोशनी नीचे डाली। ढही हुई ईंटों के बीच, उसी खोखले ताक के अंदर एक लोहे का पुराना, जंग लगा डिब्बा साफ़ दिखाई दे रहा था। बेनी काका की कही बात अर्जुन के दिमाग में कौंधी। वह धड़कते दिल से रस्सी के सहारे कुएं के अंदर उतरा। सूखी और फटी मिट्टी पर पैर टिकाते हुए उसने उस भारी डिब्बे को बाहर निकाला।

उसने पत्थर से मारकर डिब्बे का ताला तोड़ा। अंदर प्लास्टिक में लिपटा हुआ एक पुराना सरकारी खाता और कुछ नक़्शे थे—'बेलौना सिंचाई परियोजना, सन 2004' की मूल फाइल की कॉपियां।

उन कागज़ों पर साफ़ लिखा था कि मुख्य नहर का पानी सीधे बुढ़वा कुएं के पास से होते हुए पूरे गाँव के खेतों में जाना था। लेकिन नीचे एक और नक़्शा था, जिस पर राजस्व विभाग और तत्कालीन सिंचाई अभियंता के जाली हस्ताक्षर थे, जिसके तहत मुख्य धारा को दो किलोमीटर पीछे ही मोड़कर विक्रम सिंह के कोल्ड स्टोरेज और खेतों की तरफ कर दिया गया था।

और सबसे बड़ा झटका उस फाइल के आख़िरी पन्ने पर था। वहाँ एक गवाह के हस्ताक्षर थे, जिसने पाँच हज़ार रुपये के मुआवज़े के बदले गाँव की ज़मीन का पानी मोड़ने की सहमति दी थी। वह हस्ताक्षर किसी और के नहीं, बल्कि अर्जुन के पिता रामस्वरूप मिश्रा के थे। अर्जुन के पैरों तले की ज़मीन खिसक गई। जिस भ्रष्टाचार के खिलाफ वह लड़ रहा था, उसका पहला दाग उसके अपने ही घर के स्वाभिमान पर लगा था।

अध्याय 13 : पिता का सच और भीतर का सुखाड़

रात के सन्नाटे में अर्जुन तूफ़ान की तरह घर में दाखिल हुआ। सावित्री देवी ओसारे में सो रही थीं। अर्जुन सीधे रामस्वरूप के कमरे में गया, जहाँ वे लालटेन की रोशनी में अपनी वही पीली डायरी खोलकर बैठे थे।

अर्जुन ने वो लोहे का डिब्बा और भूरे पड़ चुके नक़्शे मेज पर पटक दिए।

"यह क्या है पिताजी?" अर्जुन की आवाज़ कांप रही थी, पर उसमें एक भयानक तल्खी थी।

रामस्वरूप ने उन कागज़ों को देखा। उनके चेहरे का रंग पल भर में उड़ गया, जैसे किसी ने उनके जीवन का सबसे बड़ा पाप उनके सामने लाकर खड़ा कर दिया हो। उन्होंने अपनी पीली डायरी को कसकर सीने से लगा लिया।

"तुझे... तुझे यह कहाँ से मिला?" रामस्वरूप की आवाज़ लड़खड़ा गई।

"यह बुढ़वा कुएं के सीने से निकला है पिताजी!" अर्जुन चिल्लाया। "आप रोज़ इस पीली डायरी को देखकर स्वाभिमान का नाटक करते हैं? आप जिला टॉपर थे ना? फिर आपने पूरे बेलौना गाँव का पानी विक्रम सिंह के हाथों क्यों बेच दिया? आपके इस एक हस्ताक्षर की वजह से पिछले बीस सालों से यह गाँव सूखे से मर रहा है! धनीराम का बैल प्यास से मर गया, आरती की पढ़ाई छूट गई... इस सब के गुनहगार आप हैं!"

रामस्वरूप अपनी खाट से नीचे गिर पड़े। उनकी आँखों से बरसों का दबा हुआ आंसू बहने लगा। उन्होंने अपने दोनों हाथों से अर्जुन के पैर पकड़ लिए।

"मुझे माफ़ कर दे अर्जुन... मुझे माफ़ कर दे," रामस्वरूप बिलख पड़े। "सन 2004 में तेरी बड़ी दीदी की शादी थी। हरिलाल ने ऐन वक़्त पर हाथ खींच लिया था। बारात दरवाज़े पर खड़ी थी और मेरे पास विदाई के लिए एक रुपया नहीं था। विक्रम सिंह ने तब मेरी मजबूरी का फायदा उठाया था। उसने मुझे पाँच हज़ार रुपये दिए और इस कागज़ पर दस्तखत करवा लिए। मुझे नहीं पता था कि वह पूरे गाँव की तक़दीर बदल देगा। मैं तब से रोज़ इस आग में जल रहा हूँ अर्जुन। यह पीली डायरी मेरे गौरव की नहीं, मेरे पश्चाताप की है।"

रसोई की चौखट पर खड़ी आरती और सावित्री देवी यह सब सुन रही थीं। आरती के हाथ से पानी का लोटा छूटकर गिर गया।

अर्जुन स्तब्ध रह गया। उसका वो अहंकार, उसका वो गुस्सा जो अब तक दूसरों पर बरसता था, आज अपने ही पिता की लाचारी के सामने पिघलकर बह गया। उसके भीतर एक ऐसा सुखाड़ आ चुका था जिसने उसे पूरी तरह खामोश कर दिया था। उसने धीरे से अपने पैर पिता के हाथों से छुड़ाए, कागज़ात समेटे और बिना कुछ कहे रात के अंधेरे में बाहर निकल गया।

अध्याय 14 : महिलाओं का समूह और मीरा की ढाल

अगले दो दिनों तक अर्जुन स्कूल नहीं आया। वह गाँव की गलियों से, सुखदेव की दुकान से और खुद अपनी परछाई से भी भाग रहा था। उसे लग रहा था कि वह एक पाखंडी है, जिसके घर की नींव ही गाँव के विनाश पर टिकी है। वह दिनभर खेतों की सूखी मेड़ों पर अकेला बैठा रहता, अपनी ही डिग्रियों को देखता और सोचता कि उसकी पढ़ाई ने उसे अपने पिता की लाचारी को कोसने के अलावा क्या दिया।

तीसरे दिन, जब वह बेहद थका हुआ और बिखरा हुआ स्कूल के ब्लैकबोर्ड के सामने आकर बैठा, तो मीरा वहाँ पहले से मौजूद थी। अर्जुन ने बिना नजरें मिलाए वह सरकारी फाइल मीरा के सामने सरका दी।

"अब मैं किस मुँह से गाँव वालों के सामने खड़ा होऊँगा मीरा मैडम?" अर्जुन की आवाज़ अंदर से टूट चुकी थी। "मेरा अपना बाप इस पाप का गवाह था।"

मीरा ने उन कागज़ों को देखा, फिर बहुत शांत और स्वाभाविक आवाज़ में बोली, "आपके पिता ने गलती की होगी अर्जुन जी, लेकिन किसी की मजबूरी खरीदना उससे भी बड़ा अपराध है।" उसने फाइल बंद की। "अगर आप आज पीछे हट गए, तो आपके पिता का वह पश्चाताप कभी खत्म नहीं होगा। इन कागज़ों को छुपाना नहीं, इन्हें अपनी ताकत बनाना है।"

"पर हम अकेले विक्रम सिंह का मुकाबला कैसे करेंगे?" पीछे से एक आवाज़ आई। यह राहुल था, जो अब रोज़ स्कूल आने लगा था।

"हम अकेले नहीं हैं," मीरा उठी और गेट की तरफ इशारा किया।

गेट पर फूलमती, शांति देवी और गाँव की करीब पंद्रह-बीस महिलाएँ खड़ी थीं। फूलमती के हाथ में मिट्टी का एक छोटा सा मटका था।

"मास्टरनी बिटिया," फूलमती आगे बढ़ी। "हमने सुना है कि प्रधान तुमको और स्कूल को यहाँ से हटाने की धमकी दे रहा है। हम गाँव की औरतें कल रात सुखदेव की दुकान पर हुई बात सुन चुकी हैं। यह लो, हमने अपना एक छोटा 'स्वयं सहायता समूह' बनाया है। हमारी बचत के पैसे हैं। तुम स्कूल बंद मत करना। हमारे बच्चे यहीं पढ़ेंगे।"

शांति देवी ने कड़े लहजे में कहा, "और रही बात विक्रम सिंह की, तो इस बार अगर वह राशन रोकने की धमकी देगा, तो हम औरतें ब्लॉक के दफ़्तर के सामने धरना देंगी। बहुत सह लिया उसका अहसान।"

गाँव की महिलाओं को इस तरह एकजुट होते देख अर्जुन की आँखों में फिर से रोशनी लौट आई। बदलाव की शुरुआत कभी पुरुषों की लाठियों से नहीं, बल्कि घर के चूल्हे से जुड़े स्वाभिमान से होती है। मीरा इस आंदोलन की ढाल बन चुकी थी।

अध्याय 15 : भ्रष्टाचार की फाइल और पहली धमकी

महिलाओं के इस साहस ने अर्जुन और राहुल को एक नई दिशा दी। राहुल ने शहर में जो कंप्यूटर का थोड़ा-बहुत काम सीखा था, वह अब काम आने वाला था। उसने और अर्जुन ने मिलकर बुढ़वा कुएं से मिले दस्तावेज़ों की कॉपियां तैयार कीं और एक आरटीआई (RTI) एप्लिकेशन ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर (BDO) के दफ़्तर में लगाने की तैयारी कर ली।

लेकिन बेलौना में कोई भी बात विक्रम सिंह से छिप नहीं सकती थी।

शनिवार की शाम, जब अर्जुन और राहुल स्कूल का दरवाज़ा बंद करके घर लौट रहे थे, तो रास्ते के सूने मोड़ पर विक्रम सिंह की काली स्कॉर्पियो आकर रुकी। गाड़ी का शीशा धीरे-धीरे नीचे उतरा। अंदर विक्रम सिंह बैठे थे, और उनकी बगल में घसीटा के हाथ में लोहे की एक कड़क लाठी थी।

विक्रम सिंह के चेहरे पर इस बार वो ट्रेडमार्क मुस्कान नहीं थी। उनकी आँखें ठंडी और डरावनी थीं।

"अर्जुन बाबू," विक्रम सिंह ने तंबाकू थूकते हुए कहा। "सुना है कुएं की खुदाई में तुम्हें कुछ पुराने मुर्दे मिले हैं? उन मुर्दों को वापस दफ़्न कर दो, तो बेहतरी होगी।"

"वो मुर्दे नहीं हैं प्रधान जी, वो बेलौना के हक के दस्तावेज़ हैं," अर्जुन ने सीधे उनकी आँखों में देखते हुए कहा। इस बार उसकी आवाज़ में गुस्सा नहीं, बल्कि एक गहरा ठहराव था।

विक्रम सिंह हंसे, पर उनकी हंसी में मौत जैसा सन्नाटा था। "तुम्हारे बाप के दस्तखत हैं उस पर अर्जुन। अगर वो फाइल ब्लॉक तक पहुँची, तो नहर का पानी तो बाद में आएगा, तुम्हारे बूढ़े बाप को पुलिस पहले घसीटते हुए ले जाएगी। उम्र के इस पड़ाव पर रामस्वरूप मिश्रा जेल की हवा खाएंगे, यह तुम बर्दाश्त कर लोगे? और वो जो नई मास्टरनी है, उसका ट्रांसफर लेटर सोमवार तक उसकी जेब में होगा। सोच लो, बेलौना की मिट्टी में उतना ही पैर फैलाओ, जितना समेट सको।"

गाड़ी का शीशा ऊपर चढ़ गया और स्कॉर्पियो धूल उड़ाती हुई आगे बढ़ गई।

राहुल का शरीर डर से कांप रहा था। उसने अर्जुन का हाथ पकड़ा, "अर्जुन... वह सही कह रहा है। बाबूजी जेल चले जाएंगे।"

अर्जुन ने धूल के गुबार को जाते हुए देखा। फिर उसने अपनी जेब में रखे उन दस्तावेज़ों को छुआ। लड़ाई अब और कठिन हो चुकी थी, क्योंकि दुश्मन ने सीधे उसके परिवार के सबसे कमजोर हिस्से पर वार किया था।

[भाग 3 समाप्त]