अब आगे क्या - अध्याय 3: मार्गों का चौराहा


📖 अध्याय 3: मार्गों का चौराहा

पैर किसी ठोस सतह को छुए, उससे पहले ही आरव के कानों में एक अनंत कोलाहल गूंज उठा था। यह किसी कारखाने का शोर नहीं था, और न ही किसी पारंपरिक बाजार की आवाज। यह लाखों इंसानों के एक साथ फुसफुसाने, भारी पहियों के घूमने, पन्नों के फड़फड़ाने और दूर आसमान में किसी अज्ञात यान के उड़ने की मिली-जुली एक गूंज थी।

जब प्रकाश पूरी तरह छंटा, तो आरव ने खुद को एक बहुत ऊंचे, नुकीले पहाड़ की चोटी पर खड़ा पाया। हवा इतनी तेज थी कि उसके बाल उड़ रहे थे और एक ठंडी सिहरन उसकी हड्डियों को कंपा रही थी।

"नीचे देखो, आरव।"

समय-ऋषि उसके पीछे शांत खड़े थे। उनके हाथ उनकी पीठ के पीछे बंधे थे और आँखें नीचे फैली अंतहीन घाटी पर टिकी थीं।

आरव ने आगे बढ़कर पहाड़ की मुंडेर से नीचे झांका, और जो कुछ उसने देखा, उसने उसकी सांसें रोक दीं। उसके सामने कोई साधारण मैदान नहीं था, बल्कि सभ्यताओं का एक पूरा भूगोल फैला हुआ था, जो पांच अलग-अलग दिशाओं में बंटा था और हर दिशा का अपना एक अलग ही चरित्र था।

दूर पूर्व की ओर, धातुओं और नीले कांच से बनी गगनचुंबी इमारतों का एक विशाल, चमकता हुआ महानगर था, जिसके ऊपर कृत्रिम बिजलियां कौंध रही थीं। वहाँ की हवा में एक तीव्र बेचैनी और कुछ नया ढूंढने की तड़प तैर रही थी। उस पूरे नगर के आकाश पर एक अदृश्य गूंज थी—'यह कैसे काम करता है?' "वह विज्ञान का नगर है," समय-ऋषि ने धीमी, गंभीर आवाज में कहा। "यहाँ की मूल भावना जिज्ञासा है, लेकिन इस नगर की सबसे ऊंची मीनारों पर अहंकार का पहरा भी है।"

ठीक उसके बगल में, पश्चिम की ओर, धूसर ग्रेनाइट के पत्थरों से बना एक अभेद्य, मजबूत और कड़े अनुशासन वाला किला खड़ा था। उसके फाटकों पर तराजू और सिक्कों की नक्काशी थी। वहाँ की हवा में सिक्कों की खनक और बही-खातों के पलटने की आवाज थी। वहाँ का आसमान एक ही सवाल से गूंज रहा था—'किस चीज़ का कितना मूल्य है?' "वह वाणिज्य का दुर्ग है," ऋषि ने कहा। "यहाँ का दर्शन विनिमय है, पर याद रखना, इस दुर्ग की गहरी खाइयों में लालच का वास है।"

तीसरी दिशा में, उत्तर की ओर, पहाड़ियों और हरी-भरी वादियों के बीच बसा एक ऐसा खुला लोक था जो स्थिर नहीं था। वह हर पल अपना रंग बदल रहा था। कभी वहाँ से किसी बांसुरी की करुण धुन आती, कभी अमूर्त रंग हवा में तैरते, तो कभी इतिहास की भव्य इमारतें हवा में बनकर बिखर जातीं। वहाँ का कण-कण पूछ रहा था—'मैं क्या महसूस करता हूँ?' "वह कला का लोक है," ऋषि की आँखों में एक हल्की सी चमक आई। "यह अभिव्यक्ति का संसार है, लेकिन इस खुले आसमान के नीचे सबसे बड़ा खतरा दिशाहीनता का है।"

चौथी दिशा में, नीचे एक संकरी और गहरी घाटी थी जहाँ से गियर, पहियों और भाप का धुआं उड़ रहा था। वहाँ का दर्शन था अनुप्रयोग और सवाल था—'इस ज्ञान को वास्तविक दुनिया में कैसे उतारें?' ऋषि ने उसे पॉलिटेक्निक घाटी का नाम दिया।

और सबसे दूर, मिट्टी, तांबे और जलती हुई भट्टियों से बना एक विशाल, जीवंत गांव था, जहाँ लाखों हाथ हथौड़ों और औजारों के साथ कुछ न कुछ गढ़ रहे थे। उनका दर्शन था निर्माण और सवाल था—'मैं अपने हाथों से क्या बना सकता हूँ?' "वह कौशल ग्राम है आरव। लेकिन इस गांव की सीमाओं को समाज के पूर्वाग्रह की दीवारों ने घेर रखा है।"

आरव ने देखा कि इन पांचों विशाल लोकों की ओर जाने वाले रास्ते नीचे एक बहुत बड़े, धूल भरे गोल चौराहे पर आकर मिलते थे। उस चौराहे पर लाखों की संख्या में धुंधले चेहरे वाले किशोर—ठीक आरव की उम्र के बच्चे—खड़े थे। वे पागलों की तरह कभी विज्ञान के नगर को देखते, कभी वाणिज्य के दुर्ग को। उनके चेहरे उलझन और गहरे तनाव से नीले पड़ चुके थे। वे एक-दूसरे से टकरा रहे थे, गिर रहे थे, पर किसी को समझ नहीं आ रहा था कि वे किस तरफ बढ़ें।

आरव का अपना सिर चकराने लगा। अब तक वह अपने कमरे में बैठकर सोच रहा था कि रास्ते कम हैं, इसलिए वह डरा हुआ है। लेकिन यहाँ का नजारा तो बिल्कुल उल्टा था।

"ऋषि जी..." आरव ने हांफते हुए अपने माथे का पसीना पोंछा, "इतने सारे रास्ते? इतने सारे दर्शन? मुझे तो लगा था कि बस फॉर्म भरकर कोई एक विषय चुन लेना होता है। यहाँ तो हर मोड़ पर एक अलग ही ब्रह्मांड है। मुझे डर लग रहा है।"

समय-ऋषि चुप रहे। उन्होंने हमेशा की तरह कोई दिलासा नहीं दिया। वे बस आरव के भीतर उठते इस डर को अपनी गहरी, अनादि आँखों से नापते रहे।

तभी, आरव के कंधे के पास हवा में तैर रही पुस्तक, करियर मानचित्र, में एक अजीब सी व्याकुलता पैदा हुई। उसके पुराने चमड़े के कवर पर उभरी सुनहरी नसें अचानक धड़कने लगीं और उनका रंग बदलकर एक तीखे लाल रंग में तब्दील हो गया। पुस्तक आरव के भीतर के मानसिक दबाव को महसूस कर रही थी। उसके पन्ने बिना किसी हवा के, बहुत तेजी से खुद-ब-खुद फड़फड़ाने लगे।

पन्ने रुक-रुक कर कुछ दृश्यों को हवा में तैरते हुए चित्रों की तरह प्रोजेक्ट करने लगे— एक धुंधले दृश्य में आरव ने देखा कि एक लड़का समाज के दबाव में आकर विज्ञान के नगर में घुस तो गया, पर कुछ दूर जाकर वह उन गगनचुंबी इमारतों के ठंडेपन में अपना रास्ता भूल गया और एक कोने में बैठकर रोने लगा। एक दूसरे दृश्य में एक लड़की वाणिज्य के दुर्ग में दाखिल हुई, लेकिन उसकी भारी, गणितीय दीवारों के बीच उसकी रचनात्मक आत्मा दम तोड़ने लगी और वह खुद को एक कैदी की तरह महसूस करने लगी।

आरव ने घबराकर अपने कदम पीछे खींच लिए। उसने नीचे उस चौराहे पर खड़े लाखों बच्चों को देखा जो बिना सोचे-समझे, बस भीड़ के रेले के साथ किसी भी रास्ते पर दौड़े जा रहे थे।

उसने ऋषि की ओर देखा और बुदबुदाया, "ऋषि जी... मेरी इस पूरी पीढ़ी की समस्या अवसरों की कमी नहीं है। हमारी पुरानी पीढ़ी के पास शायद अवसर नहीं थे, इसलिए वे परेशान थे। लेकिन हमारी समस्या यह है कि अवसर इतने ज्यादा हैं कि हम निर्णय ही नहीं ले पा रहे हैं। समस्या विकल्पों की कमी नहीं, उनकी अधिकता है।"

जैसे ही आरव के मुंह से यह गहरे दार्शनिक शब्द निकले, करियर मानचित्र की लाल नसें अचानक शांत हो गईं। पुस्तक ने एक गहरी, तृप्त सांस जैसी ध्वनि की और उसका रंग बदलकर एक शांत, गहरे नीले रंग में तब्दील हो गया। पुस्तक ने आरव के इस सत्य-बोध को स्वीकार कर लिया था।

उसके पन्ने पलटे और बिल्कुल बीच का एक पन्ना आकर ठहर गया, जो अब तक किसी भारी धातु के लॉक से बंद था। वह लॉक अपने आप खुल गया। उस पन्ने पर उभरे हुए पत्थरों की तरह एक नया मार्गचित्र बनने लगा, जो सीधे नीचे उस डरावने चौराहे की ओर जाता था।

समय-ऋषि ने पुस्तक की ओर देखा और फिर आरव की आँखों में झांका। उनके होठों पर वही रहस्यमयी, अपरिवर्तित मुस्कान थी। उन्होंने इस बार कोई उत्तर नहीं दिया, बल्कि आरव से एक और मर्मभेदी प्रश्न पूछा:

"आरव, जब विकल्पों का यह समुद्र सामने हो, तो क्या तुम लहरों के डर से इसी ऊंचे पहाड़ पर छिपे रहोगे, या नीचे उतरकर यह देखोगे कि इस चक्रव्यूह का पहला द्वार तुम्हारे लिए क्या लेकर आता है?"

आरव ने एक गहरी सांस ली। उसके भीतर की घबराहट अब एक शांत दृढ़ता में बदल रही थी। उसे अपनी उलझन का अंतिम उत्तर तो नहीं मिला था, लेकिन अब उसे यह पता था कि उसे इसchoices (विकल्पों) के चक्रव्यूह से भागना नहीं है, बल्कि इसके भीतर उतरकर इसे समझना है।

"मैं तैयार हूँ, ऋषि जी," आरव ने कहा।

समय-ऋषि ने अपनी लाठी हवा में घुमाई, और पहाड़ की चोटी से एक अदृश्य, पारदर्शी सीढ़ी सीधे नीचे 'विज्ञान के नगर' के मुख्य द्वार की ओर बढ़ने लगी। आरव उस जीवित जादुई पुस्तक और समय-ऋषि के पीछे-पीछे नीचे उतरने लगा, जहाँ विज्ञान के नगर की नीली, रहस्यमयी रोशनियां उसका इम्तिहान लेने के लिए तैयार थीं...

अध्याय 3 समाप्त