शरीर साम्राज्य का महायुद्ध - अध्याय 3 : विचारधाराओं का उदय
अध्याय 3 : विचारधाराओं का उदय
साम्राज्य जब टूटने की कगार पर होते हैं, तो सबसे पहले उनकी भाषा और उनके रिश्ते बिखरते हैं। देह साम्राज्य में भी वैचारिक बदलाव का यह दौर किसी बड़े राजकीय फरमान से नहीं, बल्कि आम नागरिकों की रोज़मर्रा की बातचीत से शुरू हुआ।
जो विचार अब तक शांत और अदृश्य थे, वे अब धीरे-धीरे शब्दों का रूप ले रहे थे।
रक्तेश का जहाज उस शाम लाल नदी के एक शांत मुहाने पर खड़ा था, जहाँ तीन अलग-अलग राज्यों की सीमाएं मिलती थीं। वहाँ एक पुरानी सराय में रक्तेश अपने तीन सबसे पुराने मित्रों के साथ बैठा था। यह उनकी पुरानी मंडली थी, जो वर्षों से हर हफ्ते यहाँ जुटती थी।
उसका पहला मित्र था स्पंदन, हृदय दुर्ग की एक युवा पेशी कोशिका (Myocyte)—गर्मजोश, भावुक और हमेशा दूसरों की मदद के लिए तैयार। दूसरा था चिन्मय, मस्तिष्क नगर का एक शांत और कुशाग्र न्यूरॉन—जिसकी आँखों में विद्युत तरंगों जैसी तीक्ष्णता थी। और तीसरी थी वीरा, अस्थि-मज्जा से निकली एक न्यूट्रोफिल सिपाही—गंभीर, सतर्क और अपनी भारी ढाल को हमेशा पास रखने वाली।
टेबल पर पोषक तत्वों के प्याले रखे थे, लेकिन आज उनके बीच की हवा में वह चिर-परिचित गर्मजोशी गायब थी।
"तुमने सुना?" चिन्मय (न्यूरॉन) ने शांत स्वर में विद्युत-स्पंदन छोड़ते हुए बात शुरू की। "कल रात चांसलर के महल ने एक नया गणना-पत्र तैयार किया है। अब से साम्राज्य के सुदूर छोरों को दिए जाने वाले रक्त की मात्रा सीधे उनकी उपयोगिता के आधार पर तय होगी। यह तार्किक भी है; यदि निर्णय केवल भावनाओं से होंगे, तो पूरे देश की जटिल गणना कौन करेगा? हमें व्यवस्था और नियम चाहिए।"
स्पंदन (हृदय कोशिका) ने अपना प्याला मेज पर पटका, उसकी सतह लालिमा से भर गई। "उपयोगिता? चिन्मय, तुम संख्याओं के पीछे इतने अंधे कैसे हो सकते हो? और यदि केवल गणना होगी, तो इस साम्राज्य में करुणा कौन करेगा? सुदूर बस्तियों में रहने वाली बूढ़ी कोशिकाएं अगर कम काम कर पाती हैं, तो क्या उन्हें भूखा मार दिया जाए? जीवन भावनाओं से चलता है, तुम्हारी निर्दयी मशीनी गणनाओं से नहीं!"
"भावनाएं साम्राज्य को सुरक्षा नहीं देतीं, स्पंदन," वीरा (न्यूट्रोफिल सिपाही) ने अपनी भारी आवाज में दोनों को टोकते हुए कहा। उसकी उंगलियाँ तलवार की मूठ पर कसी थीं। "तुम दोनों की बहसें तब तक ही सुरक्षित हैं, जब तक सीमा पर हम खड़े हैं। स्वतंत्रता और लोक-कल्याण की बातें अच्छी लगती हैं, लेकिन यदि साम्राज्य सुरक्षित ही नहीं रहा, तो स्वतंत्रता और करुणा किस काम की? मेरे लिए देश की संप्रभुता और सुरक्षा ही परम सत्य हैं, बाकी सब इसके बाद आता है।"
रक्तेश चुपचाप अपनी जगह बैठा अपनी इस बिखरती हुई दुनिया को देख रहा था। उसने कभी नहीं सोचा था कि जिन दोस्तों के साथ उसने बचपन बिताया, वे आज एक-दूसरे को दुश्मन की तरह देख रहे होंगे।
उसी सराय के कोने में बैठी एक बूढ़ी, थकी हुई लाल रक्त कोशिका ने, जिसके शरीर का हीमोग्लोबिन अब फीका पड़ चुका था, इन युवाओं की बहस सुनी। उसने एक गहरी और कड़वी सांस ली और बहुत ही कांपती आवाज में कहा:
"तुम युवा आज किस रास्ते पर निकल पड़े हो? कोई खुद को तर्कवादी कह रहा है, कोई भाववादी, तो कोई सुरक्षा का प्रहरी। हमारे समय में ये सब दीवारें नहीं थीं। हम सब जब अस्थि-मज्जा से निकलते थे, तो केवल एक ही शपथ लेते थे—'महासमरसता' यानी पूर्ण समन्वय की शपथ। हम सब एक ही विराट पुरुष के हिस्से थे। आज तुम लोगों ने खुद को अलग-अलग टुकड़ों में बांट लिया है। याद रखना, जब अंग खुद को अलग समझने लगते हैं, तो विनाश दूर नहीं होता।"
बूढ़े नाविक की बात सुनकर कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया, लेकिन वह सन्नाटा कड़वाहट से भरा था। युवाओं ने सम्मान में सिर तो झुकाया, लेकिन उनकी आँखों के भीतर सुलगते विचार शांत नहीं हुए। महासमरसता का वह प्राचीन स्वर्ण युग अब इतिहास की किताबों का हिस्सा बनता जा रहा था।
इस वैचारिक दरार का असर अब अर्थव्यवस्था पर भी दिखने लगा था। 'पाचन घाटी' के विशाल आर्थिक केंद्र—छोटी आंत की मंडियों में—भी एक व्यावहारिक और आक्रामक विचार ने जन्म ले लिया था।
वहाँ के मजदूर और आमाशय (Stomach) के तेजाबी भट्टियों के इंजीनियर अब खुलेआम कहने लगे थे, "ऊर्जा ही वास्तविक शक्ति है। ज्ञान के ऊंचे विचार और कल्याण की भावुक बातें कभी खाली पेट नहीं हो सकतीं। जो पेट भरेगा, वही राज करेगा।" इस आर्थिक संघ को महसूस होने लगा था कि साम्राज्य के असली अन्नदाता वे हैं, इसलिए नीतियों पर पहला हक उनका होना चाहिए।
इन सबके बीच, साम्राज्य के उस रहस्यमयी, अंधेरे तहखाने—'अंतःस्रावी परिषद'—से निकलने वाले हॉर्मोन संदेशवाहक बिना किसी शोर-शराबे के रक्त की नदियों में तैर रहे थे। आम जनता अभी उन्हें समझती ही नहीं थी। वे तो बस एक 'अदृश्य हाथ' की तरह थे, जो चुपचाप कभी थायराइड के कारखानों की गति बदल देते, तो कभी एड्रिनल के बारूद घरों को नियंत्रित करते। वे क्या कर रहे थे, यह किसी को नहीं पता था, लेकिन उनका प्रभाव हर कोशिका महसूस कर रही थी।
रात गहरी हो चुकी थी। सराय की बत्तियां मद्धम पड़ गईं।
बहस बेनतीजा खत्म हो गई। चिन्मय बिना विदा लिए अपने विद्युत-मार्ग की ओर बढ़ गया। स्पंदन भारी कदमों से हृदय दुर्ग की ओर चल पड़ा, और वीरा अपनी ढाल संभाले सीमा चौकी की तरफ मुड़ गई।
रक्तेश वहीं अकेला खड़ा रहा। उसने अपनी नाव के डेक पर लेटकर काले आसमान को देखा। हवा का तापमान बदल रहा था।
उसने अपने उन तीन मित्रों के बारे में सोचा जो कभी एक-दूसरे के पूरक थे। उसके होंठ बुदबुदाए:
"आज पहली बार हमें एक-दूसरे को समझाने की ज़रूरत पड़ी... पहले तो हम बस समझ जाते थे।"
यह वाक्य देह साम्राज्य के उस सुनहरे युग के अंत का रोना था, जहाँ संवाद की नहीं, सह-अस्तित्व की भाषा चलती थी। विचार उदित हो चुके थे, और उनके साथ ही बिखर चुका था वह प्राचीन विश्वास, जिसने इस साम्राज्य को कभी एक सूत्र में बांधा था।
अध्याय 3 समाप्त।