मिट्टी की पुकार - भाग 4 : टकराव
मिट्टी की पुकार
भाग 4 : टकराव
अध्याय 16 : सच का बोझ और सामाजिक अलगाव
अगस्त की शुरुआत हो चुकी थी, पर बेलौना के आसमान में सिर्फ बादलों के सूखे मखमली टुकड़े दौड़ रहे थे। हवा में एक अजीब सा भारीपन था। विक्रम सिंह की वो धमकी हवा में गायब नहीं हुई थी, उसने गाँव की रगों में अपना ज़हर घोलना शुरू कर दिया था।
सोमवार की सुबह जब रामस्वरूप मिश्रा सुखदेव की दुकान पर चाय लेने पहुंचे, तो वहाँ का नज़ारा बदला हुआ था। बेंच पर बैठे बेनी काका ने अपनी लाठी उठाई और खांसते हुए दूसरी तरफ देखने लगे। हरिलाल ने अपनी बही खोली, पर रामस्वरूप से नज़रें नहीं मिलाईं।
"सुखदेव, ज़रा एक पुड़िया चायपत्ती दे दो," रामस्वरूप ने अपनी पीली डायरी को काँपते हाथों से सीने से सहेजते हुए कहा।
सुखदेव ने चायपत्ती की पुड़िया मेज पर सरका दी, पर उसकी आवाज़ में वो पुरानी गर्मजोशी नहीं थी। "मिश्रा जी, ज़रा अपने लड़के अर्जुन को समझाइए। प्रधान जी बहुत खफ़ा हैं। गाँव में जो गेहूं बंट रहा था, वो इस हफ्ते से बंद हो गया है। लोग कह रहे हैं कि अर्जुन की नेतागिरी के चक्कर में पूरा गाँव भूखा मरेगा।"
"हमने तो हमेशा गाँव का भला चाहा सुखदेव..." रामस्वरूप की आवाज़ भर्रा गई।
"भला?" पीछे से घसीटा आ पहुँचा, उसके हाथ में वही लोहे की लाठी थी। "मिश्रा जी, सन 2004 में जो पाँच हज़ार का लिफ़ाफ़ा लिए थे, वो भला था? पूरा गाँव जान गया है कि तुम्हारे दस्तखत की वजह से नहर का रुख मुड़ा था। आज तुम्हारा लड़का खुद को मसीहा और पूरे गाँव को चोर साबित करने पर तुला है।"
दुकान पर सन्नाटा पसर गया। रामस्वरूप का सिर उस गहरे अपमान से झुक गया। वे बिना चायपत्ती उठाए, अपनी फटी चप्पलें घसीटते हुए घर की तरफ बढ़ गए। बेलौना की जिस मिट्टी को उन्होंने अपनी माँ माना था, आज उसी मिट्टी के लोगों ने उनके मुंह पर कालिख पोत दी थी।
शाम तक मिश्रा जी के घर का हुक्का-पानी बंद हो चुका था। गाँव की किसी महिला ने सावित्री देवी से कुएं पर बात नहीं की। अर्जुन जब घर पहुँचा, तो उसने अपने पिता को ओसारे के कोने में घुटनों में सिर दिए रोते हुए पाया। आरती रसोई की चौखट पर चुपचाप आँसू बहा रही थी। अर्जुन को अहसास हुआ कि सच का बोझ सिर्फ उठाने वाले को नहीं, बल्कि उसके पूरे परिवार को कुचल देता है।
अध्याय 17 : कूटनीतिक वार और ट्रांसफर का कागज़
अगले दिन स्कूल में सन्नाटा था। बच्चों की संख्या बारह से घटकर फिर से सिर्फ तीन पर आ चुकी थी। नंदू आया था, पर वह स्कूल के फाटक के पास उदास बैठा था। गाँव के लोगों ने विक्रम सिंह के डर से और रामस्वरूप के अतीत के सच से चिढ़कर अपने बच्चों को स्कूल भेजना बंद कर दिया था।
दुपहर के ठीक बारह बजे, ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफ़िस (BDO) की गाड़ी धूल उड़ाती हुई स्कूल के अहाते में आकर रुकी। गाड़ी से एक सरकारी बाबू उतरा, जिसके हाथ में एक सरकारी सील बंद लिफ़ाफ़ा था।
वह सीधे बरामदे में गया जहाँ मीरा बैठी हाजिरी रजिस्टर देख रही थी।
"मीरा देवी?" बाबू ने पूछा।
"जी," मीरा ने चश्मा ठीक करते हुए कहा।
"यह शिक्षा विभाग की तरफ से आपका आदेश पत्र है। बेलौना के प्राथमिक विद्यालय में छात्र संख्या न्यूनतम होने और प्रशासनिक कारणों से आपका स्थानांतरण (Transfer) तत्काल प्रभाव से सोनभद्र के दुद्धी ब्लॉक में किया जाता है। आपको कल सुबह तक यहाँ से कार्यमुक्त होना होगा।"
बाबू ने कागज़ मेज पर रखा, हस्ताक्षर लिए और गाड़ी में बैठकर चला गया।
मीरा ने उस कागज़ को देखा। सोनभद्र का वो ब्लॉक यहाँ से तीन सौ किलोमीटर दूर, घने जंगलों के बीच था। यह कोई सामान्य ट्रांसफर नहीं था, यह विक्रम सिंह का कूटनीतिक वार था। मीरा के हाथ कांपने लगे। उसके दिमाग में फिर से अपनी तीन बार की नाकामी का भूत नाचने लगा। 'क्या मैं फिर से हार गई? क्या मैं जहाँ भी जाती हूँ, सिर्फ नाकामी ही मेरा पीछा करती है?'
तभी अर्जुन वहाँ पहुँचा। उसने मीरा के हाथ से वह कागज़ ले लिया। कागज़ पढ़ते ही अर्जुन की मुट्ठियाँ भिंच गईं। "यह विक्रम सिंह की चाल है मैडम। हम यह ट्रांसफर नहीं मानेंगे।"
मीरा उठी, उसकी आँखों में इस बार आंसू थे, पर वो आंसू गुस्से के नहीं, गहरी हताशा के थे। "कैसे नहीं मानेंगे अर्जुन जी? यह सरकारी आदेश है। मैं एक अदनी सी संविदा शिक्षक हूँ। विक्रम सिंह के रसूख के सामने मेरी हैसियत क्या है? मैंने सोचा था कि मैं यहाँ खुद को साबित करूँगी, पर मैं फिर से नाकाम हो गई।"
अर्जुन ने मीरा को देखा। जो लड़की पत्थर से ताला तोड़कर अंदर आई थी, आज व्यवस्था के एक कागज़ ने उसकी हिम्मत तोड़ दी थी। अर्जुन के भीतर का स्वाभिमान चीख उठा। वह समझ गया कि अगर मीरा चली गई, तो बेलौना का यह स्कूल हमेशा के लिए बंद हो जाएगा।
अध्याय 18 : अंधेरी रात और पहला हमला
उसी बुधवार की रात, बेलौना पर अंधेरा और गहरा हो गया था। आसमान में बिजली कड़क रही थी, पर पानी की एक बूँद नहीं गिर रही थी। अर्जुन और राहुल स्कूल के अंदर बैठे लालटेन की रोशनी में आरटीआई (RTI) के उस जवाब की समीक्षा कर रहे थे जो राहुल दो दिन पहले जिला मुख्यालय से लेकर आया था। उस जवाब में साफ़ लिखा था कि नहर का पैसा निकाला जा चुका है और कागज़ों पर नहर बेलौना तक पहुँच चुकी है।
"यह आखिरी सबूत है अर्जुन," राहुल ने धीमे से कहा। "अगर यह कागज़ कल सुबह जिला कलेक्टर के पास पहुँच गया, तो विक्रम सिंह पर एफआईआर (FIR) होना तय है।"
"लेकिन बाबूजी का क्या होगा राहुल?" अर्जुन की आवाज़ में द्वंद्व था।
"तू चिंता मत कर भाई। सौभाग्य से मैंने कल सुबह ही इस पूरी फाइल को अपने मोबाइल के कैमरे से स्कैन करके अपने डिजिटल ड्राइव और पेनड्राइव में सुरक्षित कर लिया था। और इसकी एक अटेस्टेड फोटोकॉपी मेरे शहर के वकील दोस्त के पास भी है। ये मूल कागज़ ले भी जाएं, तो भी तकनीकी रूप से ये अब हमारा बाल भी बांका नहीं कर सकते," राहुल ने अर्जुन का कंधा थपथपाते हुए एक गहरी और समझदारी भरी मुस्कान दी।
तभी अचानक स्कूल के मुख्य फाटक पर एक ज़ोरदार धमाका हुआ। धाड़!
लकड़ी का दरवाज़ा टूटकर अंदर गिरा। लालटेन बुझ गई। अंधेरे में छह-सात नकाबपोश लोग लाठियां और लोहे के सरिये लेकर अंदर दाखिल हुए।
"कौन है!" अर्जुन चिल्लाया।
इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता, एक भारी लाठी उसकी पीठ पर आकर लगी। अर्जुन जमीन पर गिर पड़ा। राहुल ने बीच-बीच में बचाने की कोशिश की, पर घसीटा की आवाज़ अंधेरे में गूंजी, "मारो सालों को! बहुत नेता बनते हैं! वो फाइल कहाँ है ढूंढो!"
कमरे के अंदर की चटाई फाड़ दी गई, ब्लैकबोर्ड को कुल्हाड़ी से काट दिया गया, और मीरा के बनाए रंगीन चार्ट पेपर्स को पैरों तले रौंद दिया गया। राहुल को अलमारी से टकराकर सिर पर गहरी चोट आई और वह बेहोश हो गया।
अर्जुन जमीन पर पड़ा था, उसका शरीर दर्द से टूट रहा था। उसने देखा कि एक नकाबपोश ने उस अलमारी को तोड़ा और आरटीआई की वो मूल फाइल निकाल ली।
"फाइल मिल गई घसीटा भाई!" एक गुर्गे ने कहा।
"चलो! और इस्कूल में आग लगा दो, ताकि ये मास्टरनी कल सुबह यहाँ बैठने लायक न रहे!" घसीटा ने कड़क कर कहा।
उन्होंने कमरे के कोने में रखे केरोसिन के डिब्बे को फर्श पर उड़ेल दिया और एक माचिस की तीली जलाकर फेंक दी। पल भर में स्कूल का वो कमरा, जिसे मीरा और अर्जुन ने अपने हाथों से साफ़ किया था, लपटों से घिर गया। हमलावर अंधेरे का फ़ायदा उठाकर भाग गए।
अर्जुन ने अपनी पूरी ताकत समेटी, रेंगते हुए बेहोश राहुल को पकड़ा और उसे घसीटते हुए जलते हुए कमरे से बाहर अहाते में ले आया। वह नीम के पेड़ के नीचे बैठकर हांफ रहा था। उसके सामने स्कूल धू-धू करके जल रहा था। आग की लपटें आसमान को छू रही थीं। अर्जुन ने अपनी सूखी मिट्टी को मुट्ठी में भींचा। वह इस वक्त शारीरिक और मानसिक रूप से गहरे संकट में था। मूल फाइल जा चुकी थी, राहुल लहूलुहान था, और स्कूल राख हो रहा था।
अध्याय 19 : राख का चबूतरा और जनसभा की गूंज
अगली सुबह जब सूरज उगा, तो बेलौना का प्राथमिक विद्यालय सिर्फ काली राख और धुएं का एक जर्जर ढांचा मात्र रह गया था। गाँव के लोग दूर खड़े तमाशा देख रहे थे। किसी के चेहरे पर दुख था, तो किसी की आँखों में विक्रम सिंह का डर।
मीरा अपना झोला लेकर स्कूल पहुँची। जलती हुई इमारत को देखकर उसका दिल बैठ गया। उसने अपना झोला जमीन पर पटक दिया और घुटनों के बल बैठकर रोने लगी। उसकी सारी उम्मीदें उस राख में मिल चुकी थीं।
तभी अर्जुन आगे बढ़ा। उसकी पीठ पर पट्टियां बंधी थीं, और उसकी आँखों के नीचे का हिस्सा सूजा हुआ था। उसका शरीर कांप रहा था, पर उसकी आँखों का वो ठंडा संकल्प अब एक दावानल में बदल चुका था।
उसने जमीन से थोड़ी सी काली राख उठाई और अपने माथे पर लगा ली।
"मैडम जी, स्कूल दीवारों से नहीं, बच्चों से बनता है," अर्जुन की आवाज़ पूरे अहाते में गूंजी। उसने मुड़कर दूर खड़े गाँव वालों को देखा। "बेनी काका! सुखदेव भाई! धनीराम! बाहर मत खड़े रहो। अंदर आओ!"
गाँव के लोग झिझकते हुए अहाते के अंदर आने लगे। बेनी काका अपनी लाठी के सहारे आगे बढ़े।
"अर्जुन बाबू, अब क्या बचा है यहाँ? सब तो जल गया," बेनी काका ने रूआंसे होकर कहा।
"बहुत कुछ बचा है काका!" अर्जुन नीम के चबूतरे पर चढ़ गया, जहाँ कभी बुढ़वा कुएं की मुंडेर दिखती थी। "कल रात विक्रम सिंह के आदमियों ने हमारी फाइलें जलाईं, हमारा स्कूल जलाया। क्यों? क्योंकि वे डर गए हैं! वे डर गए हैं कि अगर बेलौना के बच्चे पढ़ गए, तो उनका कोल्ड स्टोरेज बंद हो जाएगा। वे डर गए हैं कि अगर नहर का पानी यहाँ आ गया, तो हरिलाल की बही बंद हो जाएगी!"
तभी भीड़ के पीछे से रामस्वरूप मिश्रा आगे बढ़े। उनके हाथ में उनकी वो पीली डायरी नहीं थी। उन्होंने सीधे गाँव वालों के सामने हाथ जोड़े।
"भाइयों! बीस साल पहले मैंने अपनी बेटी की शादी के लिए पांच हज़ार रुपये लेकर इस गाँव के पानी पर दस्तखत किए थे। मैं पापी हूँ। मेरी वजह से यह सूखा पड़ा है," रामस्वरूप की आवाज़ कांप रही थी, पर वे खुलकर बोल रहे थे। "लेकिन मेरा बेटा चोर नहीं है। यह स्कूल और यह मास्टरनी हमारे बच्चों का भविष्य हैं। अगर आज हम चुप रहे, तो हमारी आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ़ नहीं करेंगी।"
रामस्वरूप के इस कबूलनामे ने पूरे गाँव के सीने पर चोट की। फूलमती आगे बढ़ी, उसने अपनी लाठी जमीन पर पटकी। "प्रधान जी ने मेरे बेटों को बंधुआ मजदूर बनाया है। मैं अब और नहीं सहूँगी। मास्टरनी बिटिया, तुम कहीं नहीं जाओगी। अगर स्कूल जल गया है, तो आज से क्लास मेरे खलिहान में चलेगी!"
"मेरे दालान में चलेगी!" सुखदेव ने भी आवाज़ उठाई।
"हम ब्लॉक चलेंगे! प्रधान का तख्ता पलटेंगे!" धनीराम चिल्लाया।
राख के उस मलबे से बेलौना गाँव की सोई हुई चेतना पहली बार एक जनसैलाब के रूप में फूट पड़ी थी। मीरा ने अपने आँसू पोंछे। उसने देखा कि जिस गाँव ने उसे दुत्कार दिया था, आज वही गाँव उसकी ढाल बनकर खड़ा था।
अध्याय 20 : चुनाव की घोषणा और बिसात का आख़िरी मोहरा
स्कूल में लगी आग और ग्रामीणों के इस अभूतपूर्व विद्रोह की ख़बर राहुल ने शहर के अपने कुछ पत्रकार दोस्तों के ज़रिए जिले के मीडिया पोर्टल्स पर डलवा दी। सोशल मीडिया पर फैलते वीडियो, बढ़ते जनाक्रोश, महिलाओं के लगातार धरने और प्रशासन को सौंपे गए सामूहिक ज्ञापन के भारी दबाव के बाद, लगभग एक हफ्ते बाद जिला मजिस्ट्रेट (DM) की विशेष संयुक्त टीम पुलिस बल के साथ बेलौना पहुँची। मीरा का ट्रांसफर ऑर्डर जांच पूरी होने तक तुरंत होल्ड पर डाल दिया गया और स्कूल पर हुए हमले की कड़ाई से जांच शुरू हो गई। यद्यपि घसीटा और उसके आदमी भूमिगत हो चुके थे, पर विक्रम सिंह अभी भी अपने किले में सुरक्षित थे।
उसी हफ्ते, राज्य निर्वाचन आयोग ने पंचायतों के चुनावों की तारीखों की घोषणा कर दी। बेलौना में दो हफ्ते बाद मतदान होना था। अर्जुन ने गाँव वालों के कहने पर प्रधान पद के लिए पर्चा भरने का मन बना लिया था।
इस बगावत के बीच, एक शाम सुखदेव की दुकान पर बेनी काका ने हुक्के का कश खींचते हुए गाँव के युवाओं से एक गहरी बात कही। "तुम लोग अर्जुन के साथ खड़े हो, अच्छी बात है। पर विक्रम सिंह को हराना इतना आसान नहीं है। याद है सन 1998 में जब गाँव में हैजा फैला था और सरकारी डॉक्टर आने से मुकर गए थे? तब इसी विक्रम सिंह ने अपनी गाड़ियों से शहर से दवाइयाँ मंगवाई थीं और खुद रात-रात भर जागकर पीड़ितों की सेवा की थी। सन 2011 की वो भयानक बाढ़ भूल गए, जब आधा गाँव डूब गया था और विक्रम सिंह ने अपने पक्के कोल्ड स्टोरेज के दरवाज़े पूरे गाँव के रहने और खाने के लिए खोल दिए थे? उसने पाप किए हैं, पर उसकी इन भलाइयों का कर्ज भी बेलौना की इस मिट्टी पर बहुत गहरा है।"
बेनी काका की इस बात ने अर्जुन को भीतर तक हिला दिया। उसे समझ आया कि विक्रम सिंह केवल एक भ्रष्ट नेता नहीं, बल्कि इस गाँव की रग-रग से वाकिफ़ एक चतुर और पुराना खिलाड़ी है, जिससे लड़ना भावनात्मक रूप से भी एक बहुत बड़ा युद्ध था।
तभी विक्रम सिंह के दालान में एक अलग बिसात बिछ रही थी। हरिलाल घबराया हुआ बैठा था।
"प्रधान जी, माहौल हाथ से निकल रहा है," हरिलाल ने कहा। "मिश्रा का लड़का पूरे गाँव को हमारे खिलाफ कर रहा है। ऊपर से राहुल के पास कागज़ों की कॉपियां भी सुरक्षित हैं।"
विक्रम सिंह ने अपनी कुर्सी की हत्थी को कसकर पकड़ा। उनके चेहरे की मुस्कान पूरी तरह गायब हो चुकी थी, पर उनकी आँखें अभी भी ठंडी और रणनीतिक थीं। "माहौल कागज़ों से बनता है हरिलाल, और कानूनी कागज़ हमारे पास हैं। अर्जुन चुनाव लड़ना चाहता है ना? उसे लड़ने दो। लेकिन चुनाव का पर्चा दाखिल करने की एक अनिवार्य सरकारी शर्त होती है—प्रत्याशी या उसके परिवार पर सरकारी या सहकारी बैंक का कोई भी पुराना बकाया (Defaulter) नहीं होना चाहिए।"
विक्रम सिंह क्रूरता से मुस्कुराए। "कल सुबह ही हरिलाल, तुम अपनी साख का इस्तेमाल कर रामस्वरूप के उस अस्सी हज़ार के लोन की कुर्की का अंतिम नोटिस सहकारी बैंक से जारी करवाओ। अगर दो दिन में पैसा जमा नहीं हुआ, तो उसकी ज़मीन सरकारी तौर पर नीलाम होगी। जब बाप आधिकारिक रूप से बैंक का डिफ़ॉल्टर घोषित हो जाएगा, तो उसका लड़का चुनाव का पर्चा भरने के अयोग्य हो जाएगा। बिसात का आख़िरी मोहरा हम चलेंगे।"
लड़ाई अब सीधे बेलौना की ज़मीन, साख और स्वाभिमान के आख़िरी कुरुक्षेत्र में बदल चुकी थी।
[भाग 4 समाप्त]