अब आगे क्या - अध्याय 4: विज्ञान नगर का प्रवेश द्वार


📖 अध्याय 4: विज्ञान नगर का प्रवेश द्वार

अदृश्य पारदर्शी सीढ़ी जैसे ही नीचे समाप्त हुई, आरव के पैर एक ऐसी सड़क पर पड़े जो कंक्रीट या डामर की नहीं थी। वह किसी गहरे काले रंग के ठोस तत्व से बनी थी, जिसके भीतर नीले रंग की चमकदार रेखाएं किसी जीवित प्राणी की नसों की तरह रह-रहकर कौंध रही थीं।

आरव ने मुड़कर देखा। समय-ऋषि उसके ठीक पीछे खड़े थे—मौन, शांत, उनके चेहरे पर एक असीम गुरुत्वाकर्षण था। करियर मानचित्र उनके बगल में हवा में तैर रहा था, लेकिन उसका रंग अब एक तीखे, विद्युत नीले रंग में बदल चुका था। पुस्तक के भीतर से एक बहुत धीमी, निरंतर गूंज आ रही थी, जैसे कोई बहुत बड़ी ऊर्जा पृष्ठभूमि में जाग्रत हो गई हो।

"ऋषि जी, क्या हम पहुँच गए?" आरव ने फुसफुसाते हुए पूछा, मानो उसकी तेज आवाज यहाँ की शांति को भंग कर देगी।

समय-ऋषि कुछ नहीं बोले। उन्होंने केवल अपनी लाठी उठाई और सामने की ओर इशारा किया।

सामने विज्ञान नगर का मुख्य प्रवेश द्वार था—एक विशाल, चक्राकार द्वार जो हवा में बिना किसी सहारे के धीरे-धीरे घूम रहा था। वह भारी धातुओं और चुंबकीय चुंबकीय शक्ति से बना प्रतीत होता था। उस द्वार के शीर्ष पर, सफ़ेद दिव्य रोशनी में चमचमाते हुए इस पूरे साम्राज्य का मूल दार्शनिक मंत्र खुदा था:

"यह कैसे काम करता है?"

"इस नगर की पहली और आखिरी सांस यही प्रश्न है, आरव," समय-ऋषि ने बहुत धीमी, गहरी आवाज में कहा। "यहाँ कदम रखने वाला हर जीव इसी एक सवाल के पीछे अपनी पूरी जिंदगी लगा देता है। यह विशुद्ध जिज्ञासा की भूमि है।"

जैसे ही वे उस घूमते हुए चक्राकार द्वार के पार गए, आरव की आँखें चौंधिया गईं। यह नगर किसी अलौकिक कल्पना जैसा था, लेकिन इसके भीतर एक अजीब सा ठंडापन और अकेलापन था। यहाँ की हवा पूरी तरह धूल-मुक्त और ठंडी थी, मानो यहाँ भावनाओं की गर्माहट के लिए कोई जगह न हो।

आरव ने ऊपर देखा। चारों ओर विशाल, गगनचुंबी मीनारें खड़ी थीं जो इतनी ऊँची थीं कि बादलों को चीर रही थीं। उन मीनारों की दीवारों पर प्रकाश की अदृश्य तरंगें ऊपर-नीचे दौड़ रही थीं। "वे अभियंताओं के टावर हैं," समय-ऋषि ने आरव की नजरों का पीछा करते हुए कहा। "वहां रात और दिन का अंतर खत्म हो चुका है। वहाँ लोग मानवीय श्रम को आसान बनाने के लिए नए उपकरण रच रहे हैं।"

थोड़ी दूर पर, आरव को सफेद पत्थरों और पारदर्शी कांच से बने विशाल, गुंबददार भवन दिखाई दिए, जहाँ से एक शांत और दुख को हरने वाली ऊर्जा निकल रही थी। उन भवनों के द्वारों पर जीवन के प्राचीन प्रतीक उत्कीर्ण थे। "वे चिकित्सकों के उपचार-गृह हैं। वहाँ का दर्शन जीवन को बचाना और पीड़ा को कम करना है।"

और उस नगर के सबसे सुदूर कोने में, जहाँ आसमान बिल्कुल साफ था, आरव ने विशालकाय वेधशालाएं देखीं, जहाँ से रह-रहकर तीखी रोशनी के साथ खोजी यान अज्ञात ब्रह्मांड के अंधेरे की ओर जा रहे थे। "वे वैज्ञानिकों की वेधशालाएँ हैं। वे उस परम सत्य को ढूंढ रहे हैं जो अभी तक इंसानों की समझ से परे है।"

आरव सम्मोहित सा खड़ा रहा। "यह तो अद्भुत है, ऋषि जी! यहाँ के लोग कितने भाग्यशाली होंगे। वे दुनिया को बदल रहे हैं।"

समय-ऋषि ने आरव की बात का कोई सीधा उत्तर नहीं दिया। उन्होंने केवल इतना कहा, "सिक्के का केवल एक रुख देखकर उसकी कीमत मत तय करो, आरव। इस नगर में जितनी चमक है, इसके पीछे उतना ही घना अंधेरा भी है। चलो, इस चमक के पीछे का सच देखें।"

वे उस नीले प्रकाश वाली सड़क पर आगे बढ़ने लगे। आरव बड़ी उत्सुकता से उन ऊंचे टावरों को देख रहा था, लेकिन तभी उसकी नजर सड़क के किनारे, एक ठंडी धातु की बेंच पर बैठे एक लड़के पर पड़ी।

उस लड़के की उम्र मुश्किल से अठारह या उन्नीस साल रही होगी। उसने एक साधारण, मटमैला वस्त्र पहन रखा था, उसके बाल बिखरे हुए थे, और उसकी आँखें सूजी हुई थीं, मानो वह कई रातों से सोया न हो। उसके पैरों के पास मोटी-मोटी भारी किताबों का एक ढेर लगा था। वह पागलों की तरह अपने हाथों में पकड़े एक पुराने पेन को उंगलियों के बीच घुमा रहा था और शून्य में घूर रहा था।

आरव के कदम रुक गए। उस लड़के का चेहरा देखकर आरव के भीतर एक अजीब सा डर बैठ गया।

"ऋषि जी... यह कौन है? यह इस तरह क्यों बैठा है?" आरव ने धीरे से पूछा।

समय-ऋषि उस लड़के के सामने जाकर रुक गए। उन्होंने आरव की ओर देखा और कहा, "इससे खुद ही पूछो, आरव। यह तुम्हें वह बताएगा जो ये ऊंचे टावर कभी नहीं बताते।"

आरव झिझकते हुए उस लड़के के पास गया। "भैया... आप ठीक तो हैं?"

उस लड़के ने धीरे से अपना सचमुच थका हुआ सिर उठाया। उसकी आँखों में कोई चमक नहीं थी, केवल एक गहरा खालीपन था। वह कुछ देर आरव को देखता रहा, फिर एक सूखी, बेजान हंसी हँसा।

"ठीक?" लड़के की आवाज में एक कड़वाहट थी। "इस विज्ञान नगर में 'ठीक' होना एक विलासिता है, छोटे भाई। मेरा नाम सुमित है।"

"आप यहाँ इस टावर के नीचे क्यों बैठे हैं? आप अंदर क्यों नहीं जाते?" आरव ने पूछा।

सुमित ने उन ऊंचे अभियंताओं के टावरों की ओर देखा। "मैं भी तीन साल पहले तुम्हारी तरह ९०% से ज्यादा अंक लाकर इस नगर के आकर्षण में खिंचा चला आया था। मेरे पिता ने कर्ज लिया, रिश्तेदारों ने कहा कि 'लड़का बुद्धिमान है, इसे इंजीनियर ही बनना चाहिए।' मैंने बिना सोचे-समझे, सिर्फ भीड़ को देखकर इस नगर का मार्ग चुन लिया।"

सुमित रुका, उसने जमीन पर पड़ी अपनी भारी किताबों को पैर से ठोकर मारी। "शुरुआत में सब अच्छा लगा। लेकिन जैसे-जैसे मैं इस नगर के भीतर गया, मुझे समझ आया कि मेरी रुचि कभी भी इन जटिल समीकरणों और गणनाओं में थी ही नहीं। मुझे शब्दों से प्यार था, मुझे इतिहास की परतों को खोलना पसंद था। लेकिन समाज के दबाव में मैंने अपनी उस आंतरिक आवाज को दबा दिया।"

"तो फिर आपने बीच में रास्ता क्यों नहीं बदला?" आरव ने व्याकुल होकर पूछा।

"रास्ता बदलना इतना आसान नहीं होता, छोटे," सुमित ने ठंडी सांस ली। "जब आपके पीछे पिता का कर्ज हो, रिश्तेदारों के तानों का डर हो, और समाज का यह अटूट नियम हो कि 'अगर तुम विज्ञान छोड़कर कुछ और लोगे तो तुम कमजोर हो'... तो कदम जाम हो जाते हैं। मैं तीन साल से एक ऐसी परीक्षा को पास करने की कोशिश कर रहा हूँ, जिसके लिए मेरा मस्तिष्क बना ही नहीं है। मैं एक असफल अभ्यर्थी हूँ, आरव। एक ऐसा पंछी, जिसने खुद अपनी मर्जी से इस सुनहरे पिंजरे को चुना था।"

सुमित की बातें आरव के कानों में पिघले हुए सीशे की तरह उतरीं। उसे लगा जैसे सुमित की जगह उसका अपना चेहरा उस बेंच पर बैठा हो। ९२% आने का जो घमंड या जो उत्साह उसके भीतर था, वह पल भर में चकनाचूर हो गया।

तभी, करियर मानचित्र पुस्तक आरव के सीने के पास हवा में तेजी से कंपन करने लगी। उसका नीला रंग अब गहरा, लगभग स्याह हो चुका था। पुस्तक आरव के भीतर उठ रहे उस गहरे डर और सुमित के दर्द पर प्रतिक्रिया दे रही थी। आरव ने देखा कि पुस्तक का वह पन्ना, जिस पर 'विज्ञान नगर' का नक्शा बना था, उस पर कुछ धुंधली, काली लकीरें उभर आई थीं। मानो वह पुस्तक आरव को चेतावनी दे रही हो कि यदि निर्णय केवल 'बाहरी चमक' देखकर लिया गया, तो अंजाम क्या हो सकता है।

आरव ने पीछे मुड़कर समय-ऋषि की ओर देखा। उसकी आँखों में अब स्पष्टता की जगह एक बहुत बड़ा सवाल था। "ऋषि जी... क्या विज्ञान नगर क्रूर है?"

समय-ऋषि ने सुमित के सिर पर धीरे से अपना हाथ रखा, जिससे सुमित की आँखों में एक पल के लिए शांति की एक हल्की लहर दौड़ गई। फिर ऋषि ने आरव की आँखों में देखते हुए इस यात्रा का सबसे गंभीर प्रश्न पूछा:

"आरव, क्या तलवार क्रूर होती है, या वह हाथ क्रूर होता है जो बिना चलाना जाने उसे उठा लेता है?"

आरव मौन रहा। उसे उत्तर मिल चुका था। गलती इस नगर की नहीं थी, बल्कि बिना आत्म-मूल्यांकन के इसमें कूद जाने वाले अज्ञान की थी।

ऋषि ने अपनी लाठी से आगे के रास्ते की ओर इशारा किया, जहाँ से विज्ञान नगर की मुख्य सड़क आगे चलकर तीन अलग-अलग उप-संसारों (Sub-realms) में विभाजित हो रही थी। ये केवल रास्ते नहीं थे, बल्कि तीन विशाल लोक थे।

पहला लोक तांबे, लोहे और विशाल यांत्रिक ऊर्जा से दहक रहा था, जिसके द्वार पर लिखा था— "निर्माताओं का क्षेत्र" (PCM)। उसका मूल प्रश्न हवा में गूंज रहा था: "हम दुनिया कैसे बनाते हैं?"

दूसरा लोक लताओं, औषधियों और जीवित कोशिकाओं की तरह स्पंदन कर रहा था, जिसके द्वार पर लिखा था— "जीवन का उपवन" (PCB)। उसका मूल प्रश्न था: "जीवन कैसे कार्य करता है?"

और इन दोनों के बीच से निकलता हुआ एक संकरा, चमकीला और बेहद जटिल मार्ग था, जिसके द्वार पर लिखा था— "द्वैध पथ" (PCMB)। उसका मूल प्रश्न आरव की आत्मा को झकझोर रहा था: "क्या दो महान यात्राएँ एक साथ चल सकती हैं?"

आरव ने इन तीनों अद्भुत और रहस्यमयी संसारों को देखा। अब उसके सामने केवल विषयों के कॉम्बिनेशन नहीं थे, बल्कि ब्रह्मांड के तीन अलग-अलग दर्शन थे।

"अब चुनाव तुम्हारा है, आरव," समय-ऋषि की धीमी आवाज आई। "इनमें से किस संसार की हकीकत को तुम सबसे पहले देखना चाहोगे?"

आरव ने अपनी मुट्ठियां भींचीं और उस जीवित जादुई पुस्तक की ओर देखा, जो अब शांत होकर उसके कदम बढ़ाने का इंतजार कर रही थी।

अध्याय 4 समाप्त