मिट्टी की पुकार - भाग 5 : नई सुबह [उपन्यास पूर्णतः समाप्त]


मिट्टी की पुकार

भाग 5 : नई सुबह

अध्याय 21 : पर्चा और ज़मीन की बोली

अक्टूबर का महीना आ चुका था। धूप की तल्खी थोड़ी कम हुई थी और सुबह की हवा में एक हल्की सी सिहरन महसूस होने लगी थी। बेलौना गाँव के इतिहास में पहली बार चुनावी सरगर्मी इतनी ठंडी और इतनी खतरनाक थी। विक्रम सिंह ने अपना आख़िरी पासा फेंक दिया था। सहकारी बैंक के मैनेजर से मिलकर उन्होंने रामस्वरूप के अस्सी हज़ार के कर्ज की अंतिम कुर्की और ज़मीन की नीलामी का नोटिस मिश्रा जी के दरवाज़े पर चिपकवा दिया था। नीलामी की तारीख और समय ठीक वही तय किया गया था, जिस दिन अर्जुन को ब्लॉक मुख्यालय जाकर अपना नामांकन पत्र दाखिल करना था।

"अगर कल दोपहर दो बजे तक अस्सी हज़ार रुपये जमा नहीं हुए मिश्रा जी, तो यह तीन बीघे का कुएं वाला खेत सरेआम चौराहे पर नीलाम कर दिया जाएगा," हरिलाल ने ओसारे में खड़े होकर कड़क आवाज़ में कहा। उसके पीछे दो सरकारी अमीन खड़े थे।

विक्रम सिंह का यह दांव विशुद्ध रूप से मनोवैज्ञानिक था। वे जानते थे कि देहात में ज़मीन की सरेआम नीलामी किसी भी खानदान की सामाजिक मौत होती है। वे रामस्वरूप को लोकलाज के ऐसे दलदल में धकेलना चाहते थे कि अर्जुन शर्म के मारे खुद ही चुनाव का पर्चा फाड़ दे और ब्लॉक जाने की हिम्मत न जुटा पाए।

"तुम जाओ अर्जुन, पर्चा दाखिल करो," रामस्वरूप कमरे से बाहर आए। उनकी आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव था। "ज़मीन तो वैसे भी बीस साल पहले मेरे हाथों बिक चुकी थी। आज उसका सिर्फ कागज़ी हिसाब हो रहा है। पर तू पीछे मत हटना।"

"नहीं पिताजी," अर्जुन ने अपने पिता के कांपते हाथों को पकड़ा। "ज़मीन भी बचेगी और स्वाभिमान भी।"

उसी रात, मिश्रा जी के घर में एक गुप्त बैठक हुई। मीरा, राहुल और आरती मेज के इर्द-गिर्द बैठे थे। राहुल ने अपनी जेब से एक लिफ़ाफ़ा निकाला, जिसमें बारह हज़ार रुपये थे। "यह मेरी आख़िरी बची हुई शहरी बचत है अर्जुन। इसे रख ले।"

आरती ने अपनी किताबों के नीचे से एक छोटा सा डाकघर का पासबुक निकाला। "अम्मा ने मेरे ब्याह के लिए इसमें दस हज़ार जोड़े थे। बाबूजी को मत बताना।"

मीरा आगे बढ़ी, उसने अपने हाथ से सोने की एक पतली चेन उतारी और मेज पर रख दी। "यह मेरी मां की आख़िरी निशानी है अर्जुन जी। इसे शहर के सर्राफ़ा बाज़ार में बेच दीजिए। संकट ज़मीन का नहीं, इस गाँव के भविष्य का है।"

अर्जुन ने मेज पर रखे उन पैसों और उस चेन को देखा। उसकी आँखों से एक आँसू टपक कर रामस्वरूप की पीली डायरी पर गिर गया। यह चंदा नहीं था, यह उन चार इंसानों के सपनों की संचित आहुति थी जो विक्रम सिंह के अहंकार के खिलाफ एकजुट हुए थे।

अध्याय 22 : कुरुक्षेत्र बेलौना का

अगली सुबह, बेलौना का चौराहा छावनी में बदल चुका था। सुखदेव की चाय की दुकान के सामने सरकारी अमीन और तहसीलदार की गाड़ी खड़ी थी। विक्रम सिंह अपनी स्कॉर्पियो के बोनट पर टेक लगाए खड़े थे, और हरिलाल बही खोले बैठा था। ज़मीन की बोली शुरू होने वाली थी। गाँव के लोग दूर-दूर खड़े थे, सहमे हुए।

ठीक उसी समय, ब्लॉक मुख्यालय के रास्ते पर अर्जुन और राहुल एक पुरानी साइकिल पर सवार होकर तेज़ी से पैडल मार रहे थे। अर्जुन की जेब में नामांकन के कागज़ात थे।

"तीन बीघे का वो खेत... सरकारी बकाया अस्सी हज़ार। पहली बोली कौन?... कौन लगाएगा?" तहसीलदार ने लाउडस्पीकर पर कहा।

"एक लाख!" हरिलाल ने तुरंत आवाज़ दी। वह जानता था कि कोई और गाँव वाला प्रधान के खिलाफ जाकर बोली लगाने की हिम्मत नहीं करेगा।

"एक लाख दस हज़ार!" पीछे से एक खुरदुरी, कड़क आवाज़ आई।

विक्रम सिंह ने मुड़कर देखा। यह फूलमती थी। उसके पीछे गाँव की बीस-पच्चीस महिलाएँ खड़ी थीं, और सबके हाथों में उनके स्वयं सहायता समूह के छोटे-छोटे मटके और कपड़े की थैलियाँ थीं।

"फूलमती! तुम सरकारी काम में बाधा डाल रही हो," हरिलाल चिल्लाया।

"बाधा नहीं डाल रहे हैं काका, बोली लगा रहे हैं!" फूलमती ने अपने मटके को तहसीलदार की मेज पर पलट दिया। उसमें चिल्लर, दस-दस के नोट और औरतों के चांदी के बिछिए गिर पड़े। "यह बेलौना की औरतों की बचत है। मिश्रा जी की ज़मीन कोई चोर नहीं खरीदेगा।"

सुखदेव भी अपनी दुकान से बाहर आया। उसने अपनी जेब से बीस हज़ार रुपये निकाले और मेज पर रख दिए। "मेरी तरफ से भी जोड़ लो साहब। मिश्रा जी ने हमारे बुरे वक़्त में हमेशा साथ दिया है।"

चौराहे पर एक अभूतपूर्व दृश्य उपस्थित हो गया था। पूरा गाँव एक लाचार किसान के पीछे अपनी औकात से ज़्यादा खड़ा हो चुका था। तहसीलदार ने नोटों की गिनती शुरू की। कुल मिलाकर नवासी हज़ार चार सौ रुपये इकट्ठा हो चुके थे, जो बैंक के बकाए से ज़्यादा थे।

तहसीलदार ने हथौड़ी पटकी, "बोली रद्द की जाती है। रामस्वरूप मिश्रा का सरकारी कर्ज चुकता माना जाता है।"

विक्रम सिंह का चेहरा काला पड़ गया। उन्होंने अपनी जिंदगी में पहली बार जनता की आँखों में अपने लिए खौफ़ की जगह नफ़रत और विद्रोह देखा था। उसी समय, ब्लॉक मुख्यालय के बड़े घंटे ने दोपहर के तीन बजाए। अर्जुन ने हांफते हुए अपना नामांकन पत्र ठीक 2 बजकर 58 मिनट पर चुनाव अधिकारी की मेज पर रख दिया था। बिसात का आख़िरी मोहरा जनता ने पलट दिया था।

अध्याय 23 : मतदान का सन्नाटा

चुनाव के आख़िरी दो दिन बेलौना में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा रहा। न तो विक्रम सिंह की गाड़ियाँ घूम रही थीं और न ही अर्जुन का कोई लाउडस्पीकर बज रहा था। हवा में एक ऐसा सन्नाटा था जो किसी बड़े तूफ़ान के आने से पहले होता है। विक्रम सिंह ने वोट खरीदने के लिए रात के अंधेरे में शराब और साड़ियों के बंडल बंटवाए थे, पर इस बार गाँव के दरवाज़े बंद रहे। लोगों ने सामान तो रख लिया, पर जुबान नहीं खोली।

सोमवार की सुबह, प्राथमिक विद्यालय के उसी जले हुए ढांचे के सामने बने नए मतदान केंद्र पर लंबी कतारें लग गईं। पुरुषों से लंबी कतार औरतों की थी। फूलमती सबसे आगे खड़ी थी।

रामस्वरूप मिश्रा अपनी पीली डायरी हाथ में लिए कतार के बीच में खड़े थे। उनके बगल में बेनी काका थे।

"रामस्वरूप," बेनी काका ने धीरे से कहा। "आज बीस साल बाद तुम अपने उस हस्ताक्षर का दाग धो रहे हो। सही जगह मुहर लगाना।"

रामस्वरूप ने कुछ नहीं कहा, बस अपनी धुंधली आँखें आसमान की तरफ उठा दीं, जहाँ महीनों बाद पहली बार हल्के नीले और ठंडे बादल घिरे हुए थे।

शाम के पांच बजे मतपेटियां सील कर दी गईं। विक्रम सिंह अपनी गाड़ी में बैठकर बिना किसी से बात किए शहर की तरफ निकल गए। घसीटा और उसके आदमी पूरे दिन पोलिंग बूथ के आसपास भटकते रहे, पर पुलिस की कड़ाई और औरतों की लाठियों के आगे उनकी एक न चली। बेलौना ने अपना भाग्य मतपेटियों के अंदर बंद कर दिया था।

अध्याय 24 : परिणाम और आख़िरी सस्पेंस

अगले दिन ब्लॉक मुख्यालय के बड़े हॉल में मतों की गिनती शुरू हुई। बेलौना का नंबर सबसे आख़िर में था। चौराहे पर सुखदेव की दुकान के पास पूरा गाँव राहुल के मोबाइल के इर्द-गिर्द इकट्ठा था। अर्जुन और मीरा ब्लॉक के अंदर काउंटर के पास खड़े थे।

पहले राउंड की गिनती आई: विक्रम सिंह - 400 वोट, अर्जुन मिश्रा - 250 वोट। हरिलाल की आँखों में चमक लौट आई।

दूसरा राउंड: विक्रम सिंह - 700 वोट, अर्जुन मिश्रा - 680 वोट। फासला तेजी से कम हो रहा था।

तीसरे और आख़िरी राउंड की गिनती चल ही रही थी कि अचानक तेज़ आंधी के कारण पूरे ब्लॉक परिसर की बत्ती गुल हो गई। काउंटिंग हॉल में घुप्प अंधेरा छा गया। बाहर खड़े गाँव वालों में अफ़वाह फैल गई कि विक्रम सिंह के आदमियों ने मतपेटियां बदल दी हैं।

"साजिश हो रही है! अर्जुन बाबू को हरा दिया गया!" बाहर भीड़ चिल्लाने लगी। अर्जुन के दिल की धड़कनें बढ़ गईं। राहुल का हाथ कांपने लगा।

हॉल के अंदर मोमबत्तियां जलाई गईं। विक्रम सिंह के एजेंट हरिलाल ने तुरंत चिल्लाना शुरू किया, "तीसरे राउंड की फिर से गिनती (Recounting) होगी! कुछ बैलेट पेपर अवैध हैं!"

तनाव अपने चरम पर था। रिटर्निंग ऑफिसर ने हरिलाल की आपत्ति को देखा, फिर कड़े लेसन में कहा, "आपत्ति खारिज की जाती है। वोटों का अंतर साफ़ है।"

तभी बत्ती वापस आ गई। अधिकारी लाउडस्पीकर के पास पहुँचा। उसकी आवाज़ गूंजी: "बेलौना ग्राम पंचायत से... अंतिम राउंड की गिनती के बाद अर्जुन मिश्रा 212 वोटों से विजयी घोषित किए जाते हैं।"

हॉल के बाहर खड़े गाँव वालों में एक ऐसा धमाका हुआ जो किसी पटाखे का नहीं, बल्कि बीस साल के दबे हुए स्वाभिमान का था। राहुल ने अर्जुन को गले से लगा लिया, वह रो रहा था।

मीरा ने अर्जुन की तरफ देखा। उसकी आँखों में भी आँसू थे। उसने अर्जुन के पास आकर मुस्कुराते हुए कहा, "अब तो बेलौना छोड़कर नहीं भागेंगे न, प्रधान जी?"

अर्जुन हल्का सा मुस्कुराया, उसने अपने माथे का पसीना पोंछा और बोला, "अब तो यहीं मरना-जीना है मैडम। इस मिट्टी ने अपनी पुकार सुना दी है।"

अध्याय 25 : मिट्टी की पुकार

तीन वर्ष बीत चुके थे।

जून के महीने की एक सुबह, बेलौना गाँव का नज़ारा पूरी तरह बदल चुका था। प्राथमिक विद्यालय की इमारत अब पक्की और दुमंजिला हो चुकी थी। दीवारों पर रंगीन नक़्शे और विज्ञान के सूत्र लिखे थे। अहाते के नीम के चबूतरे पर आरती बैठी थी, जो अब उसी स्कूल में मीरा की सहायक शिक्षिका बन चुकी थी। उसने शहर के कॉलेज से अपनी पढ़ाई पूरी कर ली थी।

स्कूल के ठीक सामने से गुज़रने वाली 'बेलौना माइनर' नहर में इस बार कल-कल करता हुआ साफ़ पानी बह रहा था। अर्जुन ने नए डीएम के साथ मिलकर नहर विभाग के पुराने घपले को उजागर किया था, जिसके बाद सरकार को मुख्य धारा का रुख वापस बेलौना की तरफ मोड़ना पड़ा।

अर्जुन मिश्रा, जो अब गाँव का प्रधान था, बुढ़वा कुएं की मुंडेर पर बैठा था। कुएं की सफ़ाई हो चुकी थी, और उसकी तलहटी में अब चार हाथ गहरा साफ़ पानी हिलोरें ले रहा था। कुएं के बगल में खड़ा नीम का बूढ़ा पेड़ अब पूरी तरह हरा-भरा हो चुका था, उसकी पत्तियां हवा में झूम रही थीं।

तभी वहाँ रामस्वरूप मिश्रा आए। उन्होंने अपनी वो पीली डायरी खोली और उसमें से वो 1986 का स्कॉलरशिप लेटर निकाला। उन्होंने उस भूरे पड़ चुके कागज़ को देखा, फिर कुएं के पानी को।

"अब इस डायरी का पश्चाताप पूरा हो गया अर्जुन," रामस्वरूप ने मुस्कुराते हुए कहा। उन्होंने उस पत्र को धीरे से पानी की धारा में प्रवाहित कर दिया। वह कागज़ तैरता हुआ नहर के पानी के साथ खेतों की तरफ बढ़ गया।

राहुल पास ही खड़ा एक नए ट्रैक्टर पर बैठा था। वह अब गाँव में ही आधुनिक खेती का स्टार्टअप संभाल रहा था और शहर की नौकरी से कहीं ज़्यादा सुखी और शांत था।

मीरा स्कूल के बरामदे से बाहर आई और उसने अर्जुन को देखा। दोनों के बीच कोई शब्द नहीं हुआ, बस एक गहरी, मूक समझदारी थी। अर्जुन ने कुएं की मुंडेर से थोड़ी सी गीली मिट्टी उठाई। इस बार वह मिट्टी चूना बनकर हवा में नहीं उड़ी, बल्कि उसमें सोंधी खुशबू थी और नमी का एक ऐसा अहसास था जो जीवन को उगने का हौसला देता है।

उसने वह मिट्टी अपने सीने से लगा ली। उसे समझ आ गया था कि असली सफलता शहर की चकाचौंध में गुलाम बनने में नहीं, बल्कि अपनी मिट्टी की पुकार सुनकर उसे संवारने में है।

उपन्यास का संदेश

"बदलाव किसी नेता या सरकार की खैरात से नहीं, बल्कि जागरूक लोगों के सामूहिक स्वाभिमान से शुरू होता है। गाँव की मिट्टी में केवल फसल नहीं, भविष्य भी उगता है।"