अब आगे क्या - अध्याय 8: वाणिज्य का दुर्ग
अध्याय 8: वाणिज्य का दुर्ग (Commerce)
जैसे ही आरव ने भारी ग्रेनाइट के दरवाजों को पार किया, उसके पीछे का पूरा परिदृश्य बदल गया। विज्ञान नगर की नीली बिजली और जीवन के उपवन की हरी-भरी लताएँ गायब हो चुकी थीं। अब उसके सामने धूसर और सफेद संगमरमर से बनी एक ऐसी नगरी थी जो किसी अनंत, अभेद्य किले जैसी दिखती थी।
यहाँ की हवा में एक अजीब सा कड़ा अनुशासन था। हवा के झोंकों के साथ पन्नों के पलटने, स्याही की तीव्र महक और तराजू के पलों के टकराने की धीमी आवाजें आ रही थीं। इस दुर्ग के विशाल प्रांगण के ठीक बीचों-बीच, हवा में सोने और चांदी के सूक्ष्म कण तैर रहे थे, जो कभी आपस में जुड़कर तराजू की आकृति बनते तो कभी कोई प्राचीन बही-खाता।
आरव ने ऊपर देखा। इस दुर्ग के मुख्य प्राचीर पर एक बहुत बड़ा, चमकता हुआ प्रश्न उत्कीर्ण था, जिसने उसकी आत्मा को झकझोर दिया:
"मूल्य कहाँ से आता है?"
"इस दुर्ग की दीवारें इसी एक प्रश्न पर टिकती हैं, आरव," समय-ऋषि ने कहा। उनकी आवाज इस किले के पत्थरों की तरह ही गंभीर और ठोस थी। "विज्ञान तुम्हें चीज़ों को बनाना सिखाता है, लेकिन यह वाणिज्य का दुर्ग तुम्हें यह सिखाता है कि जो कुछ बनाया गया है, समाज के लिए उसका वास्तविक महत्व क्या है। यहाँ का दर्शन विनिमय और मूल्य-सृजन है।"
आरव ने प्रांगण में चारों तरफ देखा। यहाँ की व्यवस्था किसी कुशल सेना जैसी थी। हर व्यक्ति बहुत सधे हुए कदमों से चल रहा था, सबके हाथों में कुछ दस्तावेज थे, और उनकी नजरें हवा में तैरती हुई मूल्य-तालिकाओं पर टिकती थीं।
"ऋषि जी, यहाँ तो सब कुछ बहुत अमीर और भव्य है," आरव ने विस्मय से कहा। "यहाँ के लोग तो सिर्फ धन का हिसाब रखते होंगे?"
समय-ऋषि चुप रहे। वे आगे बढ़ने लगे। तभी प्रांगण के उत्तरी छोर पर एक भारी कोलाहल मच गया। वहाँ "वित्तीय प्राचीर" के मुहाने पर दुर्ग के कुछ उच्च अधिकारी और कौशल ग्राम के कुछ कारीगर आपस में उलझे हुए थे। आरव उत्सुकतावश उस ओर दौड़ा।
कौशल ग्राम के कारीगरों के चेहरे पर बेबसी थी। "इस वर्ष हमारे खेतों में भयंकर सूखा पड़ा है। हमारी लागत दोगुनी हो गई है। यदि हमें हमारे अनाज का बढ़ा हुआ मूल्य नहीं मिला, तो हमारे बच्चे भूखे मर जाएंगे।"
दुर्ग के एक अधिकारी ने ठंडे स्वर में अपना बही-खाता दिखाते हुए कहा, "नियम पुस्तिका के अनुच्छेद ४ के अनुसार, विनिमय की दरें पहले से तय हैं। सूखा या बाढ़ तुम्हारी समस्या है, हमारे बही-खाते नियमों से चलते हैं, भावनाओं से नहीं। कानून के अनुसार पुरानी कीमत ही सही है।"
हवा में तैरते हुए वित्तीय आंकड़े तेजी से लाल रंग में बदलने लगे थे, मानो वह व्यवस्था इस अन्याय से चरमरा रही हो।
तभी भीड़ के पीछे से एक युवक आगे बढ़ा। उसकी उम्र लगभग २३ वर्ष रही होगी। उसने एक बहुत ही साफ-सुथरा, धूसर वस्त्र पहन रखा था। उसकी आँखों में कोई घबराहट नहीं थी, बल्कि एक तीखी, न्यायप्रिय चमक थी। उसका नाम था—अद्वैत। वह इस दुर्ग का एक वरिष्ठ खोजी था।
"नियम पुस्तिका को बंद कीजिए, अधिकारी महोदय," अद्वैत की शांत लेकिन भारी आवाज गूंजी।
"अद्वैत! तुम इस दुर्ग के नियमों को चुनौती दे रहे हो?" अधिकारी ने त्योरियां चढ़ाईं।
अद्वैत आगे बढ़ा और उसने कौशल ग्राम के कारीगरों के सूखे हाथों को देखा। फिर उसने अधिकारी से कहा, "संख्याएं कभी झूठ नहीं बोलतीं, वे बस यह बताती हैं कि कमी कहाँ है। आपने बही-खाते में अनाज के वजन को तो लिख लिया, लेकिन उस मानवीय श्रम और सूखे के दर्द को छोड़ दिया जिसने उसकी लागत को बढ़ाया है। कानून सही हो सकता है, अधिकारी महोदय... लेकिन यह न्याय नहीं है।"
अद्वैत ने हवा में हाथ लहराया और अपनी उंगलियों से उन आंकड़ों को छुआ। "यदि समाज का एक हिस्सा भूखा रहेगा, तो इस दुर्ग के स्वर्ण की कोई कीमत नहीं बचेगी। वाणिज्य का मतलब सिर्फ मुनाफा कमाना नहीं है, बल्कि समाज के हर हिस्से को उसका सही और न्यायसंगत मूल्य देना है।"
अद्वैत के इस नैतिक साहस और नई गणना को देखते ही अधिकारी को पीछे हटना पड़ा। जैसे ही विनिमय की दरें न्यायसंगत हुईं, हवा में तैरते वे आंकड़े वापस शांत, सुनहरे रंग में बदल गए। दूर कौशल ग्राम की ओर जाने वाले मार्ग पर एक नई रोशनी चमक उठी।
आरव यह सब देखकर स्तब्ध था। उसे लगता था कि कॉमर्स या वाणिज्य का मतलब सिर्फ दुकानदारी या बैंक में बैठना होता है। लेकिन अद्वैत ने जो किया, वह पूरे समाज की आर्थिक रीढ़ और न्याय को सीधा रखने जैसा था।
आरव अद्वैत के पास गया। "भैया... क्या इस दुर्ग में केवल वही आ सकता है जो बहुत चालाक हो?"
अद्वैत ने आरव को देखा और उसके चेहरे पर एक गंभीर मुस्कान आई। "आरव, बाहर के लोग सोचते हैं कि यहाँ केवल आंकड़ों का खेल है। लेकिन इस दुर्ग का असली रक्षक वह है जो 'मूल्य-सृजन' को समझता है। हमारा काम धन को तिजोरी में बंद करना नहीं, बल्कि धन को एक बहती हुई नदी बनाना है जो समाज के आखिरी व्यक्ति तक समृद्धि पहुँचा सके।"
जैसे ही अद्वैत ने ये शब्द कहे, आरव के हाथ में थमी करियर मानचित्र पुस्तक में एक अभूतपूर्व बदलाव हुआ।
पुस्तक का पन्ना खुद-ब-खुद पलटा। आरव ने देखा कि अब तक जो पात्र अलग-अलग पन्नों पर बिखरे थे, वे सब सिमटकर आकाश के एक विशाल नक्शे की तरह उभर आए थे। पुस्तक के ऊपरी हिस्से में एक दिव्य प्रकाश चमका और वहां लिखा आया—"विज्ञान नक्षत्र"। उस नक्षत्र के भीतर सुमित, विहान, आचार्या जीविका, पीयूष और तनु जीवित तारों की तरह चमकने लगे।
और ठीक उसके नीचे, एक नया आकाश खुला, जिस पर लिखा था—"वाणिज्य नक्षत्र"। उस नए नक्षत्र में अद्वैत की तराजू थामे हुए अनुशासित आकृति पहले टिमटिमाते तारे के रूप में स्थापित हो गई। पुस्तक अब केवल लोगों का संग्रह नहीं कर रही थी, वह आरव के भीतर विचारधाराओं का एक अनंत आकाश बना रही थी।
आरव ने मंत्रमुग्ध होकर समय-ऋषि की ओर देखा। "ऋषि जी... विज्ञान समस्याओं को हल करने के लिए उपकरण बनाता है, लेकिन यह वाणिज्य का दुर्ग यह तय करता है कि वे उपकरण हर इंसान तक न्यायसंगत मूल्य पर कैसे पहुँचें।"
"तुम इस दुर्ग के पहले सत्य को समझ रहे हो, आरव," समय-ऋषि ने कहा।
तभी, आरव की नजर उस भव्य प्रांगण के सबसे दूर, एक अंधेरे और ठंडे कोने पर पड़ी। वहाँ कुछ लोग जमीन पर बैठे थे। वे पागलों की तरह अपने हाथों में सोने के सिक्के ले रहे थे, उन्हें गिन रहे थे, और फिर गिरा रहे थे। उनके चेहरे पूरी तरह से पीले पड़ चुके थे, उनकी आँखें सूखी थीं, और वे अपने आसपास खड़े किसी भी इंसान को देख नहीं रहे थे। वे एक अजीब से सम्मोहन में थे।
आरव को उन्हें देखकर अपने भीतर एक ठंडा डर महसूस हुआ। "ऋषि जी... वे लोग कौन हैं? उनके चेहरे इतने पीले क्यों हैं?"
समय-ऋषि ने उस ओर देखा, लेकिन उन्होंने कोई व्याख्या नहीं की। उनकी आँखों में एक गहरा रहस्य था। "उनका उत्तर तुम्हें आगे मिलेगा, आरव। जब तुम इस दुर्ग की उन कठिन राहों पर चलोगे जहाँ मूल्य और न्याय की परीक्षा होती है।"
ऋषि ने अपनी लाठी से दुर्ग के भीतर जाने वाले तीन विशाल द्वारों की ओर इशारा किया, जो तीन वैचारिक साम्राज्यों की तरह खड़े थे।
पहले द्वार पर लिखा था— लेखा दुर्ग। उसका मूल प्रश्न हवा में गूंज रहा था: "सत्य का सही हिसाब क्या है?"
दूसरे द्वार पर लिखा था— शासन प्रकोष्ठ। उसका प्रश्न था: "शक्ति को नियमों में कैसे बाँधा जाए?"
तीसरे और सबसे विशाल द्वार पर लिखा था— नेतृत्व सभागार। उसका मूल प्रश्न आरव के दिल को छू रहा था: "लोगों और संसाधनों को एक सही दिशा कैसे दी जाए?"
आरव ने अपनी उस जादुई पुस्तक को कसकर पकड़ा, जिसके भीतर दो नक्षत्र अब अपनी रोशनी बिखेर रहे थे। वह वाणिज्य के इन वैचारिक साम्राज्यों के भीतर उतरने के लिए तैयार था...
अध्याय 8 समाप्त