शरीर साम्राज्य का महायुद्ध - अध्याय 8 : स्मृतियों पर पहरा
भाग 2 : श्रेष्ठता की बहस
अध्याय 8 : स्मृतियों पर पहरा
देह साम्राज्य की हवा अब केवल ठंडी या गर्म नहीं थी; वह भारी हो चुकी थी। विभाजन की भौगोलिक रेखाएं खिंचने के बाद, अब असली जंग अपनी-अपनी विचारधाराओं को सही और दूसरे को पूरी तरह व्यर्थ साबित करने की थी। लेकिन यह जंग महलों के फरमानों से नहीं, बल्कि साम्राज्य की सड़कों पर नागरिकों के वजूद और उनके रिश्तों को कुचलकर लड़ी जा रही थी।
रक्तेश अपनी नाव को 'तर्क द्वार' के पास एक संवेदी घाट पर बांध रहा था, जब उसने विभाजन की पहली वास्तविक और क्रूर चोट को अपनी आँखों से देखा।
कपाल घाटी के निचले हिस्से में स्थित 'सिनैप्स पुस्तकालय' (The Memory Vaults) के सामने भारी भीड़ जमा थी। वहाँ न्यूरॉन प्रहरियों ने एक दक्षिणी छात्र कोशिका को रोक रखा था। वह छात्र रो रहा था और एक चमकीले स्मृति-कण (Memory Molecule) को कसकर पकड़े हुए था।
"तुम इसे दक्षिण नहीं ले जा सकते," प्रहरी ने ठंडे, मशीनी स्वर में कहा।
"लेकिन इन स्मृतियों में मेरे दादा की आवाज़ है!" उस दक्षिणी छात्र ने अपनी कांपती आँखें उठाकर गिड़गिड़ाते हुए कहा। "जब वे मरेंगे, तब मेरे पास उनकी याद के नाम पर यही एक टुकड़ा बचेगा। मुझे इसे अपने साथ ले जाने दो!"
प्रहरी ने उसके हाथ से वह स्मृति-कण बेरहमी से छीन लिया, उसे एक ठंडे लोहे के बक्से में बंद किया और कहा:
"कानून स्मृतियों की भावनात्मक कीमत नहीं मापता। चूंकि यह क्षेत्र अब उत्तर की प्रशासनिक सीमा में आता है, इसलिए यह डेटा अब उत्तर की बौद्धिक संपत्ति है।"
रक्तेश ने देखा कि उस छात्र की आँखों का रंग हमेशा के लिए फीका पड़ गया। मस्तिष्क नगर अब केवल सीमाओं पर पहरा नहीं दे रहा था; वह नागरिकों के अतीत, उनके अपनों की आवाज़ों और उनकी पहचान को भी ज़ब्त कर रहा था।
यह खबर जब दक्षिण में 'समान वितरण मोर्चे' तक पहुँची, तो कड़वाहट और बढ़ गई। लेकिन दक्षिण ने इसका जवाब किसी भाषण से नहीं, बल्कि अपने व्यवहार से दिया।
वही बूढ़ी लाल रक्त कोशिका, जो पिछली रातों को सराय के कोने में बैठकर युवाओं को 'महासमरसता' का पाठ पढ़ाया करती थी, आज इस राजनैतिक अलगाव की पहली मानवीय शिकार बन चुकी थी। उसका हीमोग्लोबिन अब पूरी तरह सफेद पड़ चुका था और वह उत्तर की सीमा पर स्थित एक अस्थायी शिविर में दम तोड़ रही थी। चयापचय (Metabolism) के नए कड़े तार्किक नियमों के कारण उत्तर के प्रशासन ने उसे 'कम उपयोगी' घोषित कर उसकी दवाइयों की खेप सीमा पर ही रोक दी थी। उसका बेटा उत्तर के जलाशयों में फँसा था और वह खुद दक्षिण की सीमा पर अकेली थी।
जब हृदय दुर्ग के तीन बड़े लाल रक्त-जहाज उत्तर के नियमों और परमिटों की परवाह किए बिना, विद्युत-बाड़ को चीरते हुए उस बूढ़ी कोशिका को बचाने पहुँचे, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उसने बिना अपनी दवा और बिना अपने बेटे को देखे, आखिरी सांस ले ली थी।
वहां जमा दक्षिणी मजदूरों ने रोते हुए उत्तर के प्रहरियों की ओर देखा और चिल्लाए:
"देखा तुमने? जब सचमुच मौत सामने खड़ी होती है, तो तुम्हारे ऊंचे विचार और आंकड़े काम नहीं आते, हमारा बहता हुआ रक्त काम आता है! तुम्हारी इस ठंडी बुद्धि ने हमारी माँ को मार डाला।"
परंतु, इस पूरे टकराव की सबसे भयानक त्रासदी यह थी कि दोनों शीर्ष शासक—चांसलर सेरेब्रम और किंग वेंट्रिकल—अब अपनी इच्छा से निर्णय नहीं ले रहे थे। वे दोनों अपने ही नीचे खड़े चरमपंथियों और समर्थकों के बंधक बन चुके थे।
उस रात, चांसलर सेरेब्रम ने जब पुस्तकालय में ज़ब्त की गई दक्षिणी स्मृतियों और सीमा पर रोकी गई दवाओं की सूची देखी, तो उनके न्यूरॉन दुख से कांप उठे। उन्होंने अपने एकांत में आँखें बंद कीं और धीरे से कहा:
"मैं हृदय को चोट नहीं पहुँचाना चाहता, मेरे पुराने मित्र... मैं जानता हूँ वह बूढ़ी कोशिका बेकसूर थी। लेकिन अगर मैं आज एक दवा और एक स्मृति को जाने दूंगा, तो मेरे अपने काउंसिल के लोग विद्रोह कर देंगे। ये सीमाएँ कभी स्थिर नहीं होंगी।"
ठीक उसी समय, दक्षिण के लाल किले में किंग वेंट्रिकल ने उत्तर को जाने वाले रक्त-मार्गों (Carotid Arteries) को और कसने का आदेश देते हुए भारी मन से बुदबुदाया:
"मैं उत्तर के नागरिकों को भूखा नहीं रखना चाहता, सेरेब्रम... मैं जानता हूँ उन्हें ऊर्जा चाहिए। लेकिन यदि मैं आज अपनी इस बूढ़ी कोशिका की मौत के बाद भी थोड़ा भी झुक गया, तो मेरा यह पूरा दक्षिण मोर्चा मुझ पर से विश्वास खो देगा। वे कहेंगे कि राजा कायर हो गया है।"
दोनों मित्र एक-दूसरे को बचाना चाहते थे, लेकिन उनके पीछे खड़े गुट उन्हें युद्ध की ओर धकेल रहे थे।
इस वैचारिक और व्यक्तिगत पतन का असली अखाड़ा एक बार फिर वही पुरानी सराय बनी, जहाँ रक्तेश ने बहुत मन्नतों के बाद अपने उन दोनों पुराने दोस्तों—चिन्मय और स्पंदन—को एक आखिरी बार मिलने के लिए राजी किया था। वीरा की कुर्सी आज भी खाली थी।
मेज पर प्याले रखे थे, लेकिन आज चिन्मय और स्पंदन एक-दूसरे को दोस्त नहीं, बल्कि दो दुश्मन मुल्कों की तरह देख रहे थे।
"अगर मस्तिष्क नगर अपने कपाट पूरी तरह बंद कर दे, तो यह पूरा साम्राज्य अंधकार में विलीन हो जाएगा," चिन्मय (न्यूरॉन) ने अपने नीले बैज को सहलाते हुए ठंडे घमंड से कहा। "सब खत्म हो जाएगा।"
स्पंदन ने प्याला नहीं पटका। उसने बहुत धीरे से मेज पर झुककर सीधे चिन्मय की आँखों में देखा। उसकी आवाज़ में राजनीति नहीं, बल्कि एक टूटते हुए दिल का दर्द था:
"याद है चिन्मय? जब मैं प्रशिक्षण के दौरान घायल हुआ था और मेरी पेशी फट गई थी, तो तीन रात तुमने बिना सोए मेरे सिनेप्स पर बैठकर मेरी निगरानी की थी। तब तुमने मुझसे यह नहीं पूछा था कि मैं हृदय से हूँ या मस्तिष्क से। क्या वह सब झूठ था?"
चिन्मय की आँखों की विद्युत तरंगें एक पल के लिए थरथराईं। उसने अपनी नजरें झुका लीं। कक्ष में एक भयानक सन्नाटा छा गया। चिन्मय ने बिना स्पंदन की ओर देखे, बहुत ही धीमी और पत्थरों को भी रुला देने वाली आवाज़ में उत्तर दिया:
"याद है, स्पंदन... और शायद यही मेरी सबसे बड़ी गलती थी।"
स्पंदन उठा और बिना एक शब्द और कहे सराय का दरवाज़ा तोड़कर बाहर चला गया। चिन्मय भी कुछ पल बाद बिना रक्तेश को देखे, भारी कदमों से उत्तर के विद्युत-मार्गों की ओर बढ़ गया। वह राजनीतिक बहस खत्म हो चुकी थी, लेकिन उसके मलबे के नीचे दो दोस्तों का बचपन हमेशा के लिए दफ़्न हो गया था।
सराय से बाहर निकलकर रक्तेश अपनी नाव के डेक पर अकेला बैठ गया। रात ठंडी थी और लाल नदी का बहाव धीमा था।
उसने अपनी जेब से अपनी माँ का वह पत्र निकाला, जिसे उत्तर के प्रहरियों ने अस्वीकृत करके वापस लौटा दिया था। वह पत्र अब कभी अपनी मंजिल तक नहीं पहुँचने वाला था। रक्तेश ने कांपते हाथों से उस मुड़े हुए कागज़ को खोला। उस पूरे पत्र में कोई राजनीति नहीं थी, कोई श्रेष्ठता का दावा नहीं था। नीचे कोने में माँ की धुंधली लिखावट का केवल एक आखिरी वाक्य दिख रहा था:
"बेटा, सर्दियाँ आने वाली हैं। इस बार घर कब आओगे?"
रक्तेश ने पत्र को अपनी छाती से लगा लिया और उसकी आँखों से निकले आंसू लाल नदी के पानी में मिल गए। वह जानता था कि अब वह शायद कभी घर नहीं जा पाएगा। राजनीति अब महलों की कूटनीति से निकलकर सीधे एक बेटे के सीने में खंजर की तरह घुस चुकी थी।
अब वे केवल अलग-अलग अंग नहीं थे; वे दो अलग होती हुई दुनियाएँ थीं, जहाँ लौटने के सारे रास्ते बंद हो चुके थे।
अध्याय 8 समाप्त।