शरीर साम्राज्य का महायुद्ध - अध्याय 9 : स्वयं को घायल करने की कला




अध्याय 9 : स्वयं को घायल करने की कला

देह साम्राज्य में असहयोग की आग अब महलों के बंद कमरों से निकलकर सीधे बस्तियों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी को झुलसाने लगी थी। यह समय खुली तलवारों का नहीं था, बल्कि एक ऐसी मूक और आत्मघाती कूटनीति का था जहाँ दोनों पक्ष सामने वाले को पंगु बनाने के लिए खुद अपने ही शरीर को ज़ख्मी करने पर आमादा थे।

लेकिन इस राजनैतिक खेल की सबसे क्रूर विडंबना यह थी कि चोट देने की शुरुआत विचारधाराओं ने की थी, पर उसका दर्द आम नागरिकों के चेहरों पर तैर रहा था।

रक्तेश अपनी नाव को लेकर जब उन दिनों महाधमनी के घाटों से गुजरता, तो उसे साम्राज्य के स्वास्थ्य की सुस्ती किसी आंकड़े में नहीं, बल्कि सीधे सड़कों पर दिखाई देती।

आज पहली बार, उत्तर के 'मस्तिष्क नगर' के प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ने वाली छोटी तंत्रिका कोशिकाओं (Glial cells) को दोपहर के समय अचानक चक्कर आने लगे थे। उनके चेहरों का रंग पीला पड़ रहा था। 'कॉर्टेक्स काउंसिल' के चरमपंथियों ने जब से नियंत्रण की लय को कठोर किया था, पूरे देश की चयापचय (Metabolism) व्यवस्था लड़खड़ा गई थी।

संवेदी मार्गों पर दौड़ने वाले युवा न्यूरॉन अब दक्षिण से आने वाले भूख के आवेगों (Signals) को जानबूझकर अनदेखा कर रहे थे। एक युवा पहरेदार ने सीमा चौकी पर खड़े होकर कड़े स्वर में कहा:

"अगर दक्षिण को अपनी धड़कनों पर इतना ही घमंड है, तो उन्हें अपनी बस्तियों को बिना हमारे तार्किक मार्गदर्शन के चलाकर दिखाना चाहिए। देखते हैं, भावनाएं बिना बुद्धि के कितनी दूर तक जाती हैं।"

यह खबर जब दक्षिण के 'समान वितरण मोर्चे' तक पहुँची, तो किंग वेंट्रिकल के दरबार में क्रोध की एक हिंसक लहर दौड़ गई। हृदय दुर्ग के सैनिकों ने इसे सीधे अपने वजूद पर आघात माना। उन्होंने प्रतिशोध में उत्तर की ओर जाने वाले मुख्य राजमार्गों पर रक्त का प्रवाह जानबूझकर धीमा कर दिया।

इस राजनैतिक दांव की पहली कीमत कंकाल के सफेद पहाड़ों के नीचे चुकाई गई।

अस्थि-मज्जा (Bone Marrow) की सैन्य अकादमी में नई, नवजात कोशिकाओं की एक बड़ी परेड चल रही थी। तभी, ऑक्सीजन की अचानक हुई कमी के कारण एक छोटी प्रशिक्षु कोशिका परेड के बीच में ही हांफते हुए बेहोश होकर गिर पड़ी। उसका हीमोग्लोबिन पूरी तरह सफेद पड़ चुका था।

आसपास खड़े मजदूर और सैनिक रो पड़े। दक्षिण की बस्तियों में अब लोग कड़वाहट से कह रहे थे:

"देखते हैं, चांसलर की ऊंची योजनाएं और ठंडे तर्क बिना हमारे इस जीवन-रस के कितनी देर तक हवा में तैरते हैं। जब खोपड़ी में सूखा पड़ेगा, तब उन्हें इस बहते हुए रक्त की कीमत समझ आएगी।"

इस पारस्परिक असहयोग की त्रासदी दोनों शासकों के महलों की दीवारों को भी चीर रही थी। वे दोनों अब अपने ही समर्थकों की कट्टरता के कैदी बन चुके थे।

मस्तिष्क नगर के गर्भगृह में चांसलर सेरेब्रम के सामने उनके योजना मंत्री ने एक नई रिपोर्ट रखी।

"चांसलर," मंत्री की आवाज़ थमी हुई थी। "दक्षिणी सीमाओं पर ऑक्सीजन की कमी के कारण सात प्रशिक्षणार्थी कोशिकाएँ परेड के मैदान में बेहोश हो गईं।"

कक्ष में एक भयानक, भारी मौन छा गया। चांसलर के न्यूरॉन्स की बिजली मद्धम पड़ गई। उन्होंने कुछ क्षणों के मौन के बाद, बहुत ही दबी आवाज़ में पूछा: "उनकी उम्र?"

"नवजात कोशिकाएँ थीं, चांसलर। अभी कुछ ही दिनों पहले अस्थि-मज्जा से निकली थीं।"

चांसलर सेरेब्रम ने इसके बाद कुछ नहीं कहा। उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं। उनके कांपते हाथों ने उस रिपोर्ट को मोड़ा और दराज में रख दिया। उनके चेहरे पर कोई गुस्सा नहीं था, बस एक बूढ़े पिता का गहरा, टूटता हुआ दुख था जो अपने ही बनाए नियमों के जाल में फँस चुका था।

इसी टूटे हुए वजूद के बीच, रक्तेश को घाट पर उसकी पुरानी दोस्त वीरा (न्यूट्रोफिल सिपाही) दिखाई दी। वह नासिका मार्ग के मोर्चे से लौट रही थी, जहाँ उस राइनोवायरस के छिटपुट हमले अभी भी जारी थे। उसकी ढाल टूटी हुई थी और उसकी आँखों में एक गहरे सैनिक की हताशा थी।

"वीरा! तुम सीमा छोड़कर यहाँ क्यों आ गई हो?" रक्तेश ने दौड़कर उसके पास जाते हुए पूछा।

वीरा ने अपनी थकी हुई ढाल को ज़मीन पर टिकाया। उसकी आवाज़ में अब कड़वाहट नहीं, बल्कि अपने ही नेतृत्व के प्रति एक गहरा संशय था:

"मैंने सोचा था दुश्मन बाहर हैं, रक्तेश। मैं अपनी छाती पर घाव खाने को तैयार थी। लेकिन अब जब पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो समझ नहीं आता कि मैं किसकी रक्षा कर रही हूँ? उत्तर ने हमारे संचार रसायनों को रोक दिया है और दक्षिण ने हमारी रसद घटा दी है। पहले... आदेशों पर सवाल उठाना देशद्रोह लगता था। अब... बिना सवाल किए उन आत्मघाती आदेशों का पालन करना देशद्रोह लगने लगा है।"

वीरा की यह बात राजनीति के उस मोड़ को दिखा रही थी जहाँ देश की रक्षा करने वाली सेना खुद अपने ही शासकों की कूटनीति के सामने असहाय खड़ी थी।

रात गहरी हो चुकी थी, लेकिन आज की रात सामान्य नहीं थी। पूरे साम्राज्य का तापमान भीतर से बढ़ने लगा था, जो किसी बाहरी वायरस का हमला नहीं, बल्कि अंगों के आपसी घर्षण का परिणाम था।

रक्तेश अपनी नाव के डेक पर अकेला बैठा था। उसने अपनी जेब से अपनी माँ का वह आखिरी, अस्वीकृत पत्र फिर से निकाला। उसने कांपते हाथों से उस मुड़े हुए कागज़ को खोला। उस पत्र के पीछे माँ की धुंधली, कांपती हुई लिखावट में एक वाक्य लिखा था, जिसे उसने पहले नहीं देखा था:

"बेटा, अगर इस बार छुट्टियों में घर नहीं आ पाओ तो चिंता मत करना। मैं जानती हूँ तुम साम्राज्य के काम में बहुत व्यस्त हो। अपना ख्याल रखना।"

रक्तेश ने उस पत्र को अपनी आँखों से लगा लिया। उसका दिल फट रहा था। उसकी माँ को, जो उत्तर के शांत जलाशयों में अकेली बैठी थी, यह पता ही नहीं था कि सीमाएं हमेशा के लिए बंद हो चुकी हैं। वह सोच रही थी कि उसका बेटा व्यस्त है, जबकि हकीकत यह थी कि राजनीति ने एक बेटे को उसकी माँ से हमेशा के लिए दूर कर दिया था।

उसने दूर देखा। उत्तर की बत्तियाँ ऑक्सीजन की कमी से टिमटिमा रही थीं, और दक्षिण का किला अपनी ही हिंसक लय में कांप रहा था।

सबको लगता था कि वे दूसरे को कमजोर कर रहे हैं, दूसरे को झुका रहे हैं। लेकिन रक्तेश ने बहती हुई नदी के चिपचिपे, गर्म पानी को देखा और निराशा से बुदबुदाया:

"सबको लगता था कि वे दूसरे को कमजोर कर रहे हैं... किसी ने यह नहीं देखा कि कमजोरी पहले ही पूरे शरीर में फैल चुकी थी।"

मस्तिष्क हृदय को सबक सिखाना चाहता था, हृदय मस्तिष्क को झुकाना चाहता था। दोनों अपने इस घमंड में सफल हो रहे थे, और दोनों ही इस साम्राज्य को मौत के मुंह में धकेलकर हार रहे थे।

अध्याय 9 समाप्त।