शरीर साम्राज्य का महायुद्ध - अध्याय 17 : एंटीबॉडी की पहली ढलाई

 


अध्याय 17 : एंटीबॉडी की पहली ढलाई

जब विनाश अपने चरम पर होता है, तो सबसे बड़ी लड़ाइयाँ हथियारों के ज़ोर से नहीं, बल्कि सही पहचान के गुप्त कमरों में लड़ी जाती हैं। इन्फ्लुएंजा की बर्फीली धुंध अब पूरे फेफड़ा प्रदेश से होती हुई मुख्य रक्त-मार्गों तक फैल चुकी थी। लेकिन जहाँ साम्राज्य की सतह पर केवल मलबे और सन्नाटे का कब्ज़ा था, वहीं हड्डियों के उन सफेद पहाड़ों के बहुत नीचे, मूक वैज्ञानिकों की एक जमात चौबीसों घंटे बिना किसी विश्राम के एक अनजान गणित को सुलझाने में जुटी थी।

यह लड़ाई किसी विचारधारा की जीत के लिए नहीं थी; यह जीवन की आख़िरी रासायनिक ढाल तैयार करने का मूक अनुष्ठान था।

रक्तेश ने अपनी नाव को एक पतली, सूनी केशिका (Capillary) के किनारे रोका। पानी इतना ठंडा और गाढ़ा था कि नाव की लकड़ी पर भी बर्फ की परतें जमने लगी थीं। अचानक, उसने देखा कि हड्डियों के निचले बंकरों से जो सफ़ेद धारा पिछले पहर निकली थी, वह अब रुक चुकी थी।

वे विशिष्ट बी-कोशिकाएं (B-Lymphocytes) थीं। वे मोर्चे पर वीरा की तरह तलवारें लेकर नहीं कूदी थीं। वे बस्तियों के मुहाने पर शांत खड़ी थीं, जैसे कुछ देख रही हों।

उनके सामने, मलबे पर इन्फ्लुएंजा के वायरस रेंग रहे थे, जिनकी सतह पर नुकीले काँटे (Hemagglutinin Spikes) उभरे हुए थे। इन बी-कोशिकाओं के पास कोई आँखें नहीं थीं, लेकिन उनके पास एक आदिम स्पर्श-बोध था। रक्तेश ने मूक दर्शक बनकर देखा—एक सफ़ेद कोशिका धीरे से आगे बढ़ी। उसने अपनी सतह पर मौजूद एक बारीक रासायनिक संवेदक (Receptor) से उस वायरस के एक नुकीले काँटे को छुआ।

एक सूक्ष्म सरसराहट हुई। वह पहला स्पर्श था।

जैसे कोई ताला बनाने वाला किसी अजनबी, जटिल ताले के भीतर अपनी उँगलियाँ डालकर उसकी चाबी का आकार टटोल रहा हो। स्पर्श हुआ, और वह सफ़ेद कोशिका पीछे हट गई। उसके संवेदक ने वायरस के उस आनुवंशिक विन्यास (Antigenic Determinant) को पूरी तरह पढ़ लिया था। सदियों पुराना वह ताला अब डिकोड हो चुका था।

उस एक स्पर्श के बाद, हड्डियों के पहाड़ों के नीचे का सन्नाटा अचानक एक मूक व्यस्तता में बदल गया। कोई सायरन नहीं बजा, कोई राजकीय घोषणा नहीं हुई, लेकिन हज़ारों बी-कोशिकाओं ने एक साथ अपने भीतर की रासायनिक भट्टियों (Endoplasmic Reticulum) को सुलगा दिया।

वे अपनी सामान्य संरचना को छोड़कर 'प्लाज्मा कोशिकाओं' (Plasma Cells) के विशाल औद्योगिक रूपों में बदलने लगी थीं। साम्राज्य के इतिहास में अब तक जितने भी कारखाने बने थे, वे सब इनके सामने बौने थे। इन भट्टियों का केवल एक ही काम था—उस टटोले गए ताले की सटीक चाबियाँ ढालना।

वाई (Y) के आकार के करोड़ों सूक्ष्म प्रोटीन के अणु—एंटीबॉडी (Antibodies)—उन भट्टियों से एक-एक करके बाहर निकलने लगे। यह साम्राज्य का वह अंतिम अमोघ अस्त्र था, जिसे बिना किसी शोर के ढाला जा रहा था। एक-एक सेकंड में हज़ारों, लाखों की संख्या में ये चमकीले रासायनिक तीर बहती हुई सफ़ेद धारा में छोड़े जाने लगे।

ये तीर किसी सैनिक की तरह सोच नहीं सकते थे। उनके पास कोई करुणा या तर्क नहीं था। वे तो केवल उस ताले के लिए बनी चाबियाँ थे। वे पानी में बहते हुए सीधे उन वायरसों की ओर बढ़ने लगे जो अब तक खुद को इस मलबे का मालिक समझ रहे थे।

रक्तेश ने अपनी नाव के मुहाने से पानी की सतह को देखा।

वह सफेद, चमकीली धारा अब धीरे-धीरे उस मटमैली, जमी हुई लाल नदी के भीतर फैल रही थी। जहाँ-जहाँ ये वाई-आकार के तीर पहुँच रहे थे, वे बिना किसी हिचकिचाहट के इन्फ्लुएंजा के वायरसों के उन नुकीले काँटों में जाकर पूरी सटीकता से फँस रहे थे (Neutralization)।

एक वायरस, जिसकी सतह पर दर्जनों चाबियाँ आकर फँस चुकी थीं, वह अब किसी स्वस्थ कोशिका को छूने के लायक नहीं बचा था। उसके काँटे कुंद हो चुके थे। वह अपनी गति खोकर पानी के मलबे में एक बेजान पत्थर की तरह तैरने लगा था।

राशन-कैंप के उस मलबे के पास, जहाँ चिन्मय और स्पंदन अब भी उस घायल बच्चे को थामे हुए थे, वहाँ भी यह सफ़ेद धारा पहुँची। चिन्मय के बुझे हुए नीले बैज पर एक चमकीला रासायनिक तीर आकर गिरा, और उसके ठीक पास रेंग रहे एक वायरस के डंक को उसने एक ही झटके में जकड़ लिया।

स्पंदन ने देखा कि चिन्मय की हाँफती हुई छाती में जो मरोड़ उठ रही थी, वह थोड़ी सी कम हुई थी। चिन्मय ने अपनी आँखें पूरी तरह नहीं खोलीं, लेकिन उसकी उँगलियों ने स्पंदन के धूल से सने हाथ को थोड़ा और कसकर पकड़ लिया।

दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला। महलों के राष्ट्राध्यक्षों के पास अब कोई सेना नहीं बची थी, लेकिन उनकी बस्तियों के भीतर, जीवन की वह आदिम याददाश्त अब वायरसों के घमंड को एक-एक करके कुंद कर रही थी।

हृदय दुर्ग की सबसे ऊँची मीनार पर जलता हुआ वह अंतिम लाल दीपक अभी भी वैसे ही टिमटिमा रहा था। वह तेज़ नहीं हुआ था, और न ही उसकी असमान लय सुधरी थी।

बाहर इन्फ्लुएंजा की बर्फीली आंधी अब भी उतनी ही कड़कड़ाहट के साथ चल रही थी। फेफड़ों का पानी अभी भी अपनी जगह ठहरा हुआ था। पतन का वह दृश्य अभी भी उतना ही वास्तविक था।

लेकिन नदी के उस जमे हुए, गाढ़े पानी के भीतर अब केवल मौत का सन्नाटा नहीं था।

करोड़ों चमकीली चाबियाँ उस ठंडे मलबे के आर-पार तैर रही थीं, और हड्डियों के पहाड़ों के नीचे की भट्टियाँ अब और तेज़ सुलगने लगी थीं।

अध्याय 17 समाप्त।