शरीर साम्राज्य का महायुद्ध - अध्याय 18 : श्वेत सेना का प्रत्याक्रमण
अध्याय 18 : श्वेत सेना का प्रत्याक्रमण
जब दुश्मन के हथियार कुंद हो जाते हैं, तो युद्ध का मैदान अपनी सबसे आदिम और भयानक शक्ल अख्तियार कर लेता है। बी-कोशिकाओं की भट्टियों से निकली उन करोड़ों चमकीले प्रोटीन के जालों (एंटीबॉडीज) ने इन्फ्लुएंजा के वायरस को चारों तरफ से जकड़ लिया था। वे परजीवी जो अब तक कोशिकाओं की मशीनों को हाईजैक कर रहे थे, अब खुद उस रासायनिक जाल में बंधकर पंगु खड़े थे। उनकी पहचान का वह मुखौटा उतर चुका था।
यह वह क्षण था जब मलबे के नीचे दबी हुई, भूखी और लहूलुहान अग्रिम सेना को अपनी मौत का बदला लेने का अंतिम संकेत मिला।
रक्तेश ने अपनी नाव को वायुमार्ग के मुख्य जंक्शन की ओर मोड़ा, जहाँ मलबे का पहाड़ सबसे ऊँचा था। वहाँ की हवा में अब भी तेजाब और राख की तीखी गंध थी। लेकिन तभी उसने देखा कि उस जमे हुए मलबे के भीतर एक हलचल शुरू हुई।
ज़मीन फाड़कर वीरा (न्यूट्रोफिल सिपाही) बाहर निकली। उसकी ढाल पूरी तरह टूट चुकी थी, उसके बदन पर उसकी अपनी ही साथी कोशिकाओं के फटने से निकला गाढ़ा पीला द्रव लगा था। वह पिछले कई पहरों से मौत के इस मलबे के नीचे दबी सांसें गिन रही थी। उसकी आँखें, जो ऑक्सीजन की कमी से धुंधली हो चुकी थीं, उन्होंने जब सामने का दृश्य देखा, तो उनमें एक ठंडी, आदिम चमक लौट आई।
सामने इन्फ्लुएंजा के हज़ारों वायरस खड़े थे, लेकिन वे अब हमला नहीं कर पा रहे थे। उनके नुकीले काँटे वाई-आकार की एंटीबॉडीज से इस कदर जकड़े हुए थे कि वे हिल भी नहीं पा रहे थे। इस प्रक्रिया ने उन अदृश्य वायरसों को मलबे के बीच पूरी तरह उजागर कर दिया था, जैसे किसी अंधेरे कमरे में बैठे चोर पर अचानक बिजली की तेज रोशनी डाल दी गई हो।
वीरा ने कोई युद्धघोष नहीं किया। उसके पास अब चिल्लाने की ऊर्जा नहीं बची थी। उसने केवल ज़मीन से अपनी टूटी हुई तलवार उठााई और आगे बढ़ गई।
उसके पीछे से, मैक्रोफेज योद्धाओं के विशाल रूप मलबे को चीरते हुए निकले। वे इस साम्राज्य के सबसे पुराने सफाईकर्मी और भक्षक थे। उनके भीतर न तो महलों की कोई राजनीति थी, न सिद्धांतों की कोई कड़वाहट। वे केवल अपनी भूखी, अंतहीन बाहें फैलाकर उन वायरसों की ओर बढ़े जो एंटीबॉडीज के जाल में बंधे तड़प रहे थे।
रक्तेश ने मूक दर्शक बनकर देखा—एक विशाल मैक्रोफेज योद्धा ने आगे बढ़कर एक साथ दर्जनों संक्रमित और जकड़े हुए वायरसों को अपने भीतर खींच लिया। कोशिका के भीतर की तेजाबी थैलियों ने पलक झपकते ही उन वायरसों के आनुवंशिक कोड को गलाकर राख कर दिया।
वीरा के न्यूट्रोफिल सिपाही अपने वजूद की आख़िरी बाज़ी लगा रहे थे। उन्होंने अपने ही शरीरों को फाड़ना शुरू कर दिया। उनके भीतर का डीएनए जाल बाहर फैलता गया और मलबे के बीच बचे हुए वायरस एक-एक करके उसी में उलझते चले गए।
इस चौतरफा संहार की आँच अब उन बस्तियों तक पहुँच रही थी जहाँ राजनीति की दीवारें खड़ी थीं।
राशन-कैंप के मुहाने पर, जहाँ चिन्मय और स्पंदन ज़मीन पर टिके थे, वहाँ से वायरस की अंतिम टुकड़ी पीछे भाग रही थी। वीरा के सैनिकों ने उन्हें ठीक उसी जगह घेरा।
चिन्मय ने अपनी आधी खुली आँखों से देखा कि जो वायरस कभी उसके विद्युत-मार्गों को काट रहे थे, वे आज पानी में मलबे की तरह गल रहे थे। स्पंदन का हाथ अभी भी चिन्मय के कंधे पर जमा था, जो अब थोड़ा गर्म होने लगा था। चिन्मय के बुझे हुए नीले बैज के भीतर से एक बहुत ही बारीक, महीन विद्युत तरंग फिर से कौंधी। वह कोई संदेश नहीं ले जा रही थी, वह केवल जीवन के वापस लौटने का एक मूक साक्ष्य थी।
दोनों दोस्तों ने कोई बात नहीं की। उन्होंने केवल उस मलबे के बीच से उठती हुई श्वेत सेना के उस भयानक और मौन युद्ध को देखा, जिसने बिना किसी महलीय आदेश के इस मरते हुए घर की बुनियाद को अपने खून से सींच दिया था।
नदी अब उतनी काली नहीं दिख रही थी।
मलबे के बीच कहीं-कहीं सफेद चमक के छोटे द्वीप उभर आए थे।
दूर, हृदय दुर्ग का लाल दीपक अब भी असमान अंतरालों पर टिमटिमा रहा था।
और बहुत दिनों बाद, इन्फ्लुएंजा की आंधी में पहली बार कुछ खाली जगहें दिखाई देने लगी थीं।
अध्याय 18 समाप्त।