शरीर साम्राज्य का महायुद्ध - अध्याय 19 : ज्वर की अग्नि

 


अध्याय 19 : ज्वर की अग्नि

जब ज़मीन पर छिड़ा आमने-सामने का युद्ध भी दुश्मन को पूरी तरह नहीं मिटा पाता, तब प्रकृति अपने सबसे भयानक और आख़िरी अस्त्र को बुलाती है। यह अस्त्र किसी एक मोर्चे पर काम नहीं करता; यह पूरे भूगोल को ही एक जलती हुई भट्टी में बदल देता है। मस्तिष्क नगर के गहरे तहखानों में स्थित केंद्रीय तापीय बंकर (The Hypothalamus) ने, जो अब तक चेतना के अवसान के कारण सुप्त पड़ा था, एक अंतिम अनैच्छिक निर्णय लिया।

साम्राज्य का थर्मोस्टेट बदल चुका था। आदेश जारी हो चुका था कि अगर दुश्मन को मारना है, तो इस पूरे घर को ही आग के सुपुर्द करना होगा।

रक्तेश ने अचानक अपनी नाव के पतवार को छोड़ दिया। वह लकड़ी इतनी गर्म हो चुकी थी कि उससे धुआँ निकल रहा था। लाल नदी का पानी, जो पिछले कई पहरों से बर्फ की तरह जमा और स्थिर था, अब अचानक खौलने लगा था। पानी की सतह से भाप के विशाल बादल उठ रहे थे, और पूरा नदी मार्ग एक उबलते हुए रासायनिक लावा में बदल रहा था।

यह 'ज्वर की अग्नि' (The Pyrexial Fire) थी।

साम्राज्य का तापमान सामान्य सीमाओं को लाँघकर एक ऐसे बिंदु की ओर बढ़ रहा था जहाँ प्रोटीन के धागे पिघलने लगते हैं। इस भयंकर गर्मी का असर सबसे पहले इन्फ्लुएंजा के वायरसों पर पड़ा। उनकी बाहरी परतें, जो ठंडक में मजबूत रहती थीं, इस अस्वाभाविक गर्मी के कारण ढीली पड़ने लगीं। उनके आनुवंशिक कोड को थामने वाले कैप्सिड प्रोटीन मलबे के भीतर ही पिघलने लगे थे। उनके बढ़ने की गति पूरी तरह ठप हो चुकी थी।

लेकिन इस आग की कीमत केवल दुश्मन नहीं चुका रहा था। यह उपचार की अपनी एक भयानक और आदिम हिंसा थी।

रक्तेश ने देखा कि पाचन घाटी के मुहाने पर बची-कुची बस्तियाँ इस भीषण गर्मी से झुलस रही थीं। आमाशय के गैस्ट्रिक मजदूर और छोटी आंत के विलाई व्यापारी, जो अभी-अभी विद्रोह के मलबे से संभले थे, वे अब इस असहनीय ताप के कारण अपनी बस्तियों को छोड़कर सुरक्षित कोनों की तलाश में भाग रहे थे। कोशिकाएं गर्मी से सिकुड़ रही थीं।

हृदय दुर्ग की दीवारें इस भयंकर आंच में तपकर लाल हो चुकी थीं। किंग वेंट्रिकल अभी भी उस मुख्य पेसमेकर यंत्र के लीवर को थामे खड़े थे, लेकिन उनकी उंगलियाँ अब ठंड से नहीं, बल्कि इस जलती हुई भट्टी के कारण झुलस रही थीं। दुर्ग के भीतर बची-कुची पेशियाँ इस अत्यधिक तापमान के कारण पागलों की तरह तेजी से धड़कने का प्रयास कर रही थीं। हर धड़कन के साथ किला एक ऐसी विकराल हिचकी लेता था मानो उसकी दीवारें अभी दरक जाएंगी।

बूढ़े सेनापति ने मेज की टूटी हुई बाह को पकड़ते हुए राजा की ओर देखा। कक्ष के भीतर की हवा इतनी गर्म थी कि सांस लेना दूभर था। उसने कुछ नहीं कहा। उसकी आँखों में केवल एक मूक चेतावनी थी।

रक्तेश अपनी नाव के डेक पर पड़ा हाँफ रहा था। पानी की भाप इतनी घनी थी कि अब कुछ भी देखना असंभव था। उसने अपनी जेब की तरफ हाथ बढ़ाया, लेकिन वहाँ अब माँ के पत्र की वह राख भी नहीं बची थी; वह पसीने और पानी के इस खौलते सैलाब में बह चुकी थी। अतीत का अंतिम भौतिक अवशेष भी हमेशा के लिए जा चुका था।

तभी उस धुंध के पार, राशन-कैंप के मुहाने पर उसे दो आकृतियाँ दिखाई दीं।

चिन्मय और स्पंदन अभी भी उसी मलबे के पास बैठे थे। इस भयंकर ताप के कारण चिन्मय के नीले बैज से निकलने वाली वह महीन विद्युत तरंग अब बहुत तेजी से, अनियंत्रित होकर कौंध रही थी। स्पंदन की लाल पोशाक इस गर्मी में सूखकर पूरी तरह सफेद हो चुकी थी। दोनों के शरीर झुलस रहे थे, लेकिन दोनों ने एक-दूसरे का हाथ नहीं छोड़ा था। उनके हाथ अब आपस में इस कदर जुड़ चुके थे कि यह पहचानना मुश्किल था कि कहाँ एक न्यूरॉन की सीमा समाप्त होती है और कहाँ एक रक्त-कोशिका की शुरुआत होती है।

दोनों चुप थे। वे इस आग को रोकने का कोई प्रयास नहीं कर रहे थे। वे जानते थे कि यह आग उनकी अपनी ही मिट्टी का आख़िरी, आत्मघाती सच थी।

नदी का पानी अब खौलते-खौलते धीरे-धीरे स्थिर होने लगा था।

भाप के उस घने परदे के भीतर अब वायरसों की कोई संगठित पंक्ति दिखाई नहीं दे रही थी। जहाँ-तहाँ केवल बिखरे हुए काले धब्बे बचे थे।

दूर, हृदय दुर्ग की मीनार पर जलता हुआ वह अंतिम लाल दीपक अब भी असमान अंतरालों पर टिमटिमा रहा था। उसकी लय बहुत कमज़ोर थी, लेकिन वह अभी बुझा नहीं था।

आग थम चुकी थी। भाप अब धीरे-धीरे ऊपर उठ रही थी। मलबे के नीचे क्या बचा था और क्या जल चुका था, यह अभी कोई नहीं जानता था।

अध्याय 19 समाप्त।