शरीर साम्राज्य का महायुद्ध - अध्याय 20 : सुबह की पहली किरण

 

अध्याय 20 : सुबह की पहली किरण

आग का थमना हमेशा शांति नहीं लाता; कई बार वह केवल मलबे का मुकम्मल हिसाब मांगता है। ज्वर की वह विकराल भट्टी जब शांत हुई, तो देह साम्राज्य के ऊपर छाए भाप के बादलों में एक भारीपन आ गया। रासायनिक लावा जो धमनियों में उबल रहा था, अब धीरे-धीरे अपनी ऊष्मा खोने लगा था।

यह वह ठहराव था जहाँ जीत और हार के बीच की लकीर बहुत बारीक हो जाती है।

रक्तेश ने महसूस किया कि उसकी नाव के पतवार की जलन अब कम हो रही थी। तभी, सुदूर उत्तरी पहाड़ों और दक्षिणी सीमाओं के बीच की विलायती ग्रंथियों (Sweat Glands) के द्वार धीरे से खुले। कोई बाढ़ नहीं आई, बल्कि पसीने की एक ठंडी, पारदर्शी ओस जैसी लहर फूटी, जिसने जलती हुई त्वचा की दीवारों और तपती हुई बस्तियों को धीरे-धीरे सुखाना शुरू किया। तापमान का ग्राफ़ जो आसमान छू रहा था, वह अब थमकर धीरे-धीरे नीचे सरकने लगा था।

उस ठंडी फुहार के बीच, रक्तेश ने अपनी नाव को उस मुख्य मुहाने की ओर बढ़ाया जहाँ फेफड़ों की घाटी का पानी भरा था। भाप का वह घना परदा अब पूरी तरह हटा नहीं था, वह केवल थोड़ा झीना हुआ था।

घाटी के केंद्र में, कीचड़ और मलबे से लथपथ वीरा (न्यूट्रोफिल सिपाही) अपनी टूटी हुई तलवार को ज़मीन में गाड़े, उसी के सहारे टिकी थी। वह जीवित थी, लेकिन उसकी आँखें पथरा चुकी थीं। उसके पास खड़े होने के लिए अब उसकी आधी टुकड़ी नहीं बची थी। चारों ओर इन्फ्लुएंजा के वायरस बेजान प्रोटीन के टुकड़ों की तरह तैर रहे थे, और उनके बीच वीरा के अपने सैनिकों की लाशों का अंबार था। युद्ध समाप्त हो चुका था, लेकिन वहाँ कोई मुस्कुराने वाला नहीं बचा था।

तभी, कपाल के पहाड़ों की सबसे ऊँची मीनार से एक बहुत ही धीमी, झटकेदार विद्युत तरंग कौंधी।

चांसलर सेरेब्रम की बंद आँखें पूरी तरह नहीं, बस थोड़ी सी खुलीं। उनके न्यूरॉन्स के भीतर ऑक्सीजन का पहला कमज़ोर पैकेट पहुँचा था। वे पूरी तरह होश में नहीं आए थे, उनकी चेतना अभी भी सुसुप्ति के किनारे पर लड़खड़ा रही थी। चांसलर ने अपने कांपते हाथों से उस ठंडी ज़मीन को टटोला और अपने पास बैठे किंग वेंट्रिकल को देखा।

राजा का हाथ अभी भी पेसमेकर के उस लोहे के लीवर पर जमा था। हृदय दुर्ग के भीतर, SA Node का वह प्राचीन यंत्र अब स्वयं अपनी गति में लौटने का प्रयास कर रहा था।

धक्....... धक्....... धक्.......

यह लय पूरी तरह सामान्य नहीं थी। इसमें अब भी एक कमज़ोर, थकी हुई लयबद्धता थी, जैसे कोई बूढ़ा धावक दौड़ पूरी करने के बाद हाँफ रहा हो। लेकिन यह हिचकी नहीं थी। यह इस घर के बने रहने की एक मूक, धीमी ज़िद थी।

किंग वेंट्रिकल ने चांसलर की ओर देखा। दोनों ने कोई लंबी बात नहीं की, कोई राजनैतिक घोषणा नहीं की। राजा ने केवल धीरे से अपना सिर चांसलर के कंधे पर टिका दिया। उस एक स्पर्श में हफ़्तों पुरानी वह कड़वाहट, वह श्रेष्ठता की बहस हमेशा के लिए बह गई। वे दोनों जान चुके थे कि इस घर को उनके आंकड़ों या उनकी करुणा के दावों ने नहीं, बल्कि ज़मीन के नीचे दबी उस आदिम वफ़ादारी ने बचाया था।

रक्तेश अपनी नाव को लेकर राशन-कैंप के उस मलबे के पास पहुँचा।

वहाँ चिन्मय और स्पंदन अभी भी बैठे थे। पसीने की उस ठंडी लहर ने उनकी धूल और राख को साफ़ कर दिया था, लेकिन उनके बदन पर झुलसने के गहरे निशान साफ़ दिख रहे थे।

उनके हाथों की वह पकड़, जो आग के भीतर एक हो चुकी थी, अब धीरे से खुली। वे दोनों खड़े हुए। उन्होंने एक-दूसरे की ओर देखा। कोई माफी नहीं मांगी गई, कोई पुराना तर्क नहीं दोहराया गया।

चिन्मय ने चुपचाप ज़मीन से वह कैल्शियम का पहला पत्थर उठाया जिससे विद्रोह शुरू हुआ था, और उसे उठाकर बहुत दूर एक तरफ रख दिया। जिस हाथ ने तोड़ा था, वही हाथ अब मलबे को साफ़ करना चाहता था। स्पंदन ने आगे बढ़कर उस घायल बच्चे की माँ को सहारा दिया जो अब अपनी बची-कुची कोशिकाओं के साथ उठ रही थी।

रक्तेश ने अपनी जेब में हाथ डाला। वहाँ अब माँ का पत्र नहीं था, उसकी राख भी नहीं थी। लेकिन जब उसने ऊपर देखा, तो लेंस मीनार के विशाल काँच के पार से बाहरी ब्रह्मांड की पहली रोशनी छनकर भीतर आ रही थी। धूप अभी तेज नहीं थी, वह सुदूर कोहरे और धुंध के पीछे से आ रही एक मटमैली, सफ़ेद किरण थी।

सुबह आ चुकी थी, लेकिन वह सुबह किसी विजय का उत्सव नहीं मना रही थी।

साम्राज्य अभी भी पूरी तरह टूटा हुआ था। दीवारें ढही हुई थीं, रास्ते बंद थे और बस्तियाँ सूनी थीं। लेकिन उस असीम सन्नाटे के बीच, वहाँ केवल एक मूक और अदृश्य साम्यावस्था (Homeostasis) थी, जो बिना किसी श्रेय के, बिना किसी झंडे के, चुपचाप फिर से अपने काम पर लौट आई थी और इस टूटे हुए घर की साँसों को फिर से बराबर करने में जुट गई थी।

साम्राज्य अभी भी लहूलुहान था, लेकिन उसने फिर से साँस लेना शुरू कर दिया था।

📖 भाग 3 (महाविनाश) पूर्णतः समाप्त।