शरीर साम्राज्य का महायुद्ध - अध्याय 23 : पहली रसद
अध्याय 23 : पहली रसद
संविधान जब कागज़ों से निकलकर खुरदरे टाँकों की शक्ल ले लेता है, तब सबसे पहला सवाल अधिकारों का नहीं, बल्कि रसद का उठता है। हफ़्तों के गृहयुद्ध और उसके बाद इन्फ्लुएंजा के उस तापीय महाविनाश ने देह साम्राज्य के अन्न भंडारों को पूरी तरह रीता कर दिया था। पाचन घाटी (The Gastrointestinal Tract), जो कभी भोजन-रस के विशाल जहाजों से गुलज़ार रहती थी, आज एक उजाड़, सूखी नदी की तरह फैली थी जिसके विलाई (Villi) व्यापारी और गैस्ट्रिक मजदूर भूख से बेहाल अपनी ढही हुई दुकानों के मलबे पर बैठे थे।
साम्राज्य को जीवित रखने के लिए अब केवल साँसों की ज़रूरत नहीं थी; अब उस आग को ईंधन चाहिए था जो बुझने की कगार पर थी।
रक्तेश अपनी नाव को लेकर पाचन घाटी के मुख्य मुहाने की ओर बढ़ रहा था। यहाँ लाल नदी का प्रवाह बेहद धीमा और उथला था, क्योंकि पीछे 'हृदय दुर्ग' अभी भी बहुत कमज़ोर लय में पंप कर रहा था।
तभी, साम्राज्य के सबसे ऊपरी प्रवेश द्वार—ग्रसनी मार्ग (The Pharynx)—से एक भारी, गड़गड़ाहट भरी गूँज सुनाई दी। वह इन्फ्लुएंजा की बर्फीली आंधी नहीं थी। वह भोजन-नलिका के संकुचन (Peristalsis) की एक बहुत ही धीमी, संकोची और थकी हुई हलचल थी।
ऊपर के ब्रह्मांड से, कई दिनों के मुकम्मल उपवास के बाद, जीवन-रस का पहला पैकेट नीचे उतरा। वह कोई भारी, गरिष्ठ राजसी दावत नहीं थी; वह ग्लूकोज और जल का एक नितांत साधारण, तरल और पारदर्शी घोल था।
जैसे ही वह पहला पारदर्शी कतरा आमाशय की सूखी घाटी में गिरा, वहाँ की ज़मीन से भाप का एक हलका सा बादल उठा। घाटी के मुख्य सुरक्षा अधिकारी (Gastric Chief) ने, जो भूख से निढाल एक मलबे पर बैठा था, अपनी आधी खुली आँखों से उस कतरे को देखा। उसके पास विद्रोह करने का कोई विचार नहीं था, और न ही अब वह महलों से किसी स्वायत्तता की माँग कर रहा था।
उसने धीरे से अपनी उँगली उठाई और पास खड़े थके हुए मजदूरों को संकेत दिया। मजदूरों ने बिना किसी कोलाहल के, बहुत ही कम मात्रा में हाइड्रोक्लोरिक एसिड का एक हल्का सा छिड़काव किया। वहाँ कोई तामझाम नहीं था; केवल जीवन को बनाए रखने की एक बेहद प्राथमिक, आदिम क्रिया थी।
रक्तेश ने देखा कि आमाशय के तंग द्वारों से गुज़रकर वह पारदर्शी घोल अब छोटी आंत की व्यापारिक घाटी की ओर बढ़ रहा था।
वहाँ स्पंदन पहले से ही अपनी लाल नाव के साथ मौजूद था। उसने आगे बढ़कर उस घोल के पहले कुछ कतरों को अपनी नाव के छोटे बर्तनों में भरा। उसकी लाल पोशाक पर अब भी झुलसने के निशान थे, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सा धैर्य था।
तभी, मुख्य तंत्रिका-राजमार्ग से एक कमज़ोर विद्युत-पल्स दौड़ती हुई आई। चिन्मय स्वयं वहाँ पहुँचा था। उसके नीले बैज की चमक मद्धम थी और उसके हाथ में कोई बड़ा कूटनीतिक दस्तावेज़ नहीं था। उसने चुपचाप आगे बढ़कर स्पंदन के हाथ से वह ग्लूकोज का पहला कतरा लिया और उसे अपनी जेब में रखे एक छोटे, भूखे न्यूरॉन-तार के मुहाने से छुआ दिया।
न्यूरॉन ने उस कतरे को सोख लिया। स्क्रीन पर रेंगती हुई वह कमज़ोर विद्युत-रेखा अचानक थोड़ी सी सीधी हुई, और उसमें एक स्थिर, शांत कंपन लौट आया।
चिन्मय ने स्पंदन की ओर देखा। उसकी आवाज़ बहुत साफ़ और शांत थी:
"यह उतनी ऊर्जा नहीं है कि हम फिर से महलों के बुर्ज खड़े कर सकें, स्पंदन।"
स्पंदन ने नदी में तैरते भोजन-रस के उन छोटे पैकेटों को किनारे की भूखी बस्तियों की ओर धकेलते हुए उत्तर दिया:
"हमें अब महलों की ज़रूरत भी नहीं है, चिन्मय। ये बस्तियाँ आज रात सो सकें, बस इतना ही बहुत है।"
दोनों ने मिलकर रसद के उस पहले, छोटे से हिस्से को आपस में आधा-आधा बाँट लिया। उत्तर के विचार-नगर ने दक्षिण के श्रम-दुर्ग से कोई अतिरिक्त टैक्स नहीं माँगा, और दक्षिण ने उत्तर की विद्युत-तरंगों पर कोई नाकाबंदी नहीं लगाई। रसद का यह वितरण किसी राजकीय नीति के तहत नहीं हो रहा था; यह केवल दो जीवित बचे हुए पड़ोसियों का आपसी साझा था।
नदी का पानी अब उस पारदर्शी रस के मिलने से धीरे-धीरे गतिशील हो रहा था।
रक्तेश ने नाव के पतवार को थोड़ा सा घुमाया। उसकी नाव के पिछले हिस्से में अब माँ के पत्र की वह कोरी राख भी नहीं थी, लेकिन उसके डेक पर अब ग्लूकोज के छोटे, चमकीले कण चमक रहे थे जो पूरे साम्राज्य की धमनियों में बँटने के लिए तैयार थे।
दूर, हृदय दुर्ग की मीनार पर जलता हुआ वह अंतिम लाल दीपक अभी भी असमान अंतरालों पर टिमटिमा रहा था, लेकिन अब हर टिमटिमाहट के बीच का अंधेरा थोड़ा कम लंबा था। उसकी धड़कन की लय में अब एक बारीक सा भरोसा जुड़ने लगा था।
हड्डियों के पहाड़ों के नीचे से अभी भी वही निरंतर आवाज़ आ रही थी—ठक....... ठक....... ठक.......। राजमिस्त्रियों का काम जारी था, बस्तियाँ अभी भी झुलसी हुई थीं, लेकिन बहुत दिनों बाद... साम्राज्य की जीभ पर मौत के कड़वे स्वाद के स्थान पर जीवन का पहला, सादा और मीठा कतरा उतरा था।
अध्याय 23 समाप्त।