शरीर साम्राज्य का महायुद्ध - अध्याय 25 : साझी साँस (श्रृंखला का अंतिम अध्याय)

 


अध्याय 25 : साझी साँस (श्रृंखला का अंतिम अध्याय)

इतिहास जब अपने सबसे बड़े युद्धों को समाप्त करता है, तो वह किसी राजसी दस्तावेज़ पर दस्तखत नहीं करता; वह केवल उन बचे हुए लोगों की साँसों को गिनता है जो मलबे के बीच खड़े होकर एक-दूसरे का चेहरा देख रहे होते हैं। देह साम्राज्य का नक्शा हमेशा के लिए बदल चुका था। महलों के बुर्ज अब उतने ऊंचे नहीं थे, और न ही धमनियों के भीतर वह पुराना तीव्र वेग था। लेकिन उस शांत, ठंडे भूगोल के भीतर अब एक ऐसी लयबद्धता थी, जो किसी कानून की मोहताज नहीं थी।

यह साझी साँस का पहला मुकम्मल पहर था।

रक्तेश ने अपनी नाव को मुख्य जीवन-मार्ग के उस चौराहे पर लाकर रोक दिया जहाँ उत्तर के विद्युत-मार्ग, दक्षिण के रक्त-मार्ग और फेफड़ों की केंद्रीय घाटी आपस में मिलते थे। नदी का पानी अब पूरी तरह शांत, पारदर्शी और मद्धम गति से बह रहा था।

मुख्य प्रशासनिक चौराहे पर एक टूटी हुई चट्टान के चारों ओर चार आकृतियाँ बैठी थीं—चांसलर सेरेब्रम, किंग वेंट्रिकल, चिन्मय और स्पंदन

उनके बीच कोई मेज नहीं थी, कोई बैज या मुकुट नहीं था। चांसलर का दाहिना हाथ राजा के थके हुए कंधे पर टिका था, और चिन्मय की उँगलियाँ स्पंदन के हाथ को थामे हुए थीं। सुदूर मोर्चे से लौटकर वीरा भी वहीं अपनी ढाल को ज़मीन पर टिकाए शांत खड़ी थी।

"उत्तर के कंप्यूटर अब केवल जीवित रहने का हिसाब रख रहे हैं, वेंट्रिकल," चांसलर सेरेब्रम ने बहुत ही मद्धम, सादे स्वर में कहा। उनकी आँखों की वह पुरानी तार्किक चमक अब एक गहरी, बुजुर्गवार शालीनता में बदल चुकी थी। "मस्तिष्क अब कोई नया विचार-नगर नहीं बसाएगा। हमारे पास जो चेतना बची है, वह केवल इस साझी ज़मीन को महसूस करने के लिए है।"

किंग वेंट्रिकल ने धीरे से अपना सिर हिलाया। हृदय दुर्ग की मीनार का वह लाल दीपक अब बिना किसी हिचकी के, एक बेहद शांत और धीमी लय में टिमटिमा रहा था।

"दुर्ग के द्वार भी अब सबके लिए खुले हैं, मेरे भाई," राजा ने उत्तर दिया। "हृदय ने अपनी गति को हमेशा के लिए सीमित कर लिया है। अब इस लहू में कोई अहंकार नहीं बहेगा। हम केवल उतना ही धड़केंगे, जितना इस मिट्टी की जड़ों को थामने के लिए ज़रूरी हो।"

चिन्मय ने ज़मीन पर पड़े उस कैल्शियम के पत्थर को देखा जो अब धूल में मिल चुका था। उसने स्पंदन की ओर देखा, जिसकी लाल पोशाक पर अब फाइब्रोब्लास्ट के सफ़ेद धागों के खुरदरे टाँके साफ़ दिखाई दे रहे थे।

"हमने श्रेष्ठता की बहस में बहुत कुछ खो दिया, स्पंदन," चिन्मय ने बहुत ही शांत स्वर में कहा।

"लेकिन हमने एक-दूसरे को पा लिया, चिन्मय," स्पंदन ने उत्तर दिया। "अब इस घर में न कोई विचार बड़ा है, न कोई श्रम छोटा। यह साँस जितनी तुम्हारी है, उतनी ही मेरी भी है।"

वीरा ने अपनी तलवार को म्यान में डाला। वह अब योद्धा नहीं थी; वह इस नए, शांत साम्राज्य की पहली नागरिक थी। उसने उठकर सुदूर सीमाओं की ओर देखा, जहाँ श्वेत कोशिकाओं की नई, अबोध कतारें बिना किसी सायरन के अपनी रोज़मर्रा की पहरेदारी पर लौट रही थीं। वे कोई युद्ध नहीं लड़ रही थीं; वे केवल उस नई, नाजुक साम्यावस्था की रक्षा कर रही थीं।

रक्तेश ने अपनी नाव के डेक पर घुटने टेक दिए। उसने अपनी खाली जेब पर हाथ रखा। वहाँ अब माँ के पत्र का कोई अवशेष नहीं था। वह पत्र, वह स्मृति, वह प्रार्थना अब पूरी तरह से इस साम्राज्य की मिट्टी, इसके लहू और इसके न्यूरॉन्स के भीतर घुलकर विलीन हो चुकी थी। रक्तेश अब कोई डाकिया नहीं था, क्योंकि उसके पास पहुँचाने के लिए कोई बाहरी संदेश नहीं बचा था; वह स्वयं इस साझी साँस का एक हिस्सा बन चुका था।

उसने सिर उठाकर लेंस मीनार के उस विशाल, पारदर्शी काँच के पार देखा।

बाहर की दुनिया की वह साफ़, नीली और अछूती धूप अब पूरी तरह से साम्राज्य के भीतर फैल चुकी थी। वह धूप उन खुरदरे टाँकों पर, उन झुलसी हुई बस्तियों पर और उस शांत बहती नदी पर एक जैसी चमक रही थी।

हड्डियों के पहाड़ों के नीचे से आ रही वह हथौड़ों की आवाज़ अब पूरी तरह थम चुकी थी। राजमिस्त्रियों का काम पूरा हो चुका था।

साम्राज्य में कोई उत्सव नहीं था, कोई सायरन नहीं था, कोई नारा नहीं था।

वहाँ केवल एक बेहद शांत, मूक और अदृश्य होमियोस्टैसिस था, जो बिना किसी श्रेय के, बिना किसी घोषणा के, इस लहूलुहान और सुंदर घर की हर एक साँस को बहुत धीरे-धीरे बराबर कर रहा था।

घर अभी भी टूटा हुआ था। लेकिन वह साँस ले रहा था।

📖 "शरीर साम्राज्य का महायुद्ध" — पूर्णतः समाप्त।