शरीर साम्राज्य का महायुद्ध - अध्याय 11 : विश्वास का मलबा

 

अध्याय 11 : विश्वास का मलबा

यकृत राज्य की आर्थिक नाकेबंदी ने महलों को तो झुका दिया था, लेकिन उसने पाचन घाटी की उस आम जनता के सब्र का बांध भी तोड़ दिया जो चौबीसों घंटे तेजाब और आग के बीच रहकर पूरे देश के लिए ऊर्जा कमाती थी। यह विद्रोह किसी राजनैतिक दफ्तर के बंद कमरे में तैयार नहीं हुआ था, और न ही इसे किसी नेता के ओजस्वी भाषण ने जनम दिया था। यह तो एक सामाजिक विस्फोट था, जिसकी चिंगारी राशन की एक कतार में लगी थी।

रक्तेश अपनी नाव को पाचन घाटी के राशन-कैंप के पास खड़ा किए हुए था। वहाँ ऊर्जा के बचे-कुचे आखिरी पैकेट्स बांटे जा रहे थे। कतार में एक मजदूर माँ खड़ी थी, जिसकी गोद में एक नवजात, नन्ही कोशिका थी। भूख के कारण उस बच्चे का रंग पूरी तरह सफेद पड़ चुका था।

जब उस माँ का नंबर आया, तो उसने कांपते हाथों से अपनी सूखी झोली फैलाई और कर्मचारी से कहा, "भाई, मेरे बच्चे के लिए एक आखिरी ग्लूकोज पैकेट दे दो..."

कर्मचारी ने राशन की किताब देखी, फिर फीकी आँखों से उस माँ की ओर देखकर कड़े स्वर में कहा, "उत्तर और दक्षिण के नए नियमों के अनुसार इस बस्ती का नाम सूची से हटा दिया गया है। तुम्हारे पास सही पहचान-पत्र नहीं है। अगला!"

माँ ने उसे झकझोरने का प्रयास किया। कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। नन्ही कोशिका की उखड़ती सांसें अचानक थम गई थीं। वह अपनी माँ की बाहों में पूरी तरह शांत हो चुका था।

कुछ क्षणों के लिए पूरी कतार में एक ऐसा सन्नाटा छा गया जो जमा देने वाला था। भीड़ पहले चुप रही। कोई कुछ नहीं बोला। लेकिन वह खामोशी भयानक थी। तभी, कतार के पीछे खड़े एक बूढ़े मजदूर की आँखें लाल हो गईं। उसने बिना कोई नारा लगाए, ज़मीन से कैल्शियम का एक नुकीला पत्थर उठाया और पूरी ताकत से 'ग्लाइकोजन' के उस भारी, बंद सरकारी गोदाम के लोहे के दरवाजे पर दे मारा।

टैंक... पत्थर की वह आवाज़ सन्नाटे को चीर गई।

फिर दूसरा पत्थर चला। फिर तीसरा। और देखते ही देखते, हज़ारों सालों की भूख, उपेक्षा और महलों के प्रति जमा हुआ गुस्सा एक हिंसक सैलाब बनकर फूट पड़ा। हज़ारों मजदूर उन तालों को तोड़ने के लिए गोदामों की तरफ दौड़ पड़े।

लॉर्ड पेप्सिन, जो आमाशय के मुख्य रासायनिक इंजीनियर थे, वे इस विद्रोह को शुरू करने वाले नेता नहीं थे; वे तो इस बहते हुए सैलाब का परिणाम थे, जिन्होंने इस भीड़ के गुस्से को देखकर उनके हाथों में कुल्हाड़ियाँ थमा दी थीं। 'भट्ठियों का विद्रोह' शुरू हो चुका था।

ऊंचे, काले पत्थरों से बने रासायनिक दुर्ग की प्राचीर पर बैरन हेपेटिक आकर खड़े हुए। वे नीचे की खिड़की से इस दृश्य को देख रहे थे। उनके अपने ही वफादार मजदूर, जो कभी बिना आदेश के एक कंकड़ तक नहीं छूते थे, आज गोदामों के दरवाजों को कुल्हाड़ियों से काट रहे थे।

बैरन ने उन्हें रोकने के लिए अपनी तलवार नहीं उठाई। उन्होंने प्रहरियों को पीछे हटने का इशारा कर दिया। उनके चेहरे पर एक गहरा, असहाय खौफ था। वे जानते थे कि कानून की नज़र में ये मजदूर बागी थे, लेकिन एक भूखे पेट की अदालत में वे पूरी तरह सही थे। महलों की राजनीति ने उनके बच्चों का निवाला छीना था, और आज वे सिर्फ अपना हक वापस ले रहे थे। बैरन ने दुखी होकर अपना सिर झुका लिया।

रक्तेश इस तबाही के बीच अपनी नाव से उतरा। बस्तियों के भीतर आग लगी थी और मलबे बह रहे थे। तभी उसने एक टूटी हुई केपिलरी के पास एक दृश्य देखा जिसने उसके पैरों की गति रोक दी।

वहां एक मलबे के नीचे कुछ घायल नवजात कोशिकाएं दबी हुई थीं। और उन्हें बाहर निकालने के काम में दो लोग रात-दिन एक किए हुए थे। एक के गले में मस्तिष्क नगर का बुझा हुआ नीला बैज था, और दूसरे की लाल पोशाक धूल से सनी थी। वे चिन्मय और स्पंदन थे।

दोनों साथ खड़े थे, एक ही मलबे को उठा रहे थे, एक ही ज़ख्मी बच्चे को अपने हाथों का सहारा दे रहे थे। दोनों के बीच कोई संवाद नहीं था। वे एक-दूसरे से बात ही नहीं कर रहे थे। न तो चिन्मय अपनी बुद्धि की श्रेष्ठता की कोई बात कह रहा था, और न ही स्पंदन अपनी लोक-कल्याण की भावना का कोई दावा कर रहा था। दोनों चुप थे।

रक्तेश कुछ क्षण वहीं खड़ा रहा। उसे याद नहीं आया कि आखिरी बार उसने उन्हें इस तरह साथ काम करते कब देखा था। वह बिना कुछ बोले, चुपचाप आगे बढ़ गया।

तभी एक बहुत भारी गूंज हुई। 'ग्लाइकोजन' के उस विशाल, केंद्रीय गोदाम का पहला भारी लोहे का ताला टूटकर ज़मीन पर गिर पड़ा। दरवाजा खुल गया।

भूखे मजदूर भीतर दौड़ पड़े। एक बूढ़े मजदूर ने दौड़कर पहली बोरी को कुल्हाड़ी से काटा। उसने अपने कांपते हाथों में मुट्ठी भर सफेद ग्लूकोज निकाला। वह उसे खाने के लिए अपने सूखे मुँह तक ले गया। उसकी आँखें बंद होने ही वाली थीं...

लेकिन तभी वह रुक गया। उसने कतार में रोती हुई उस माँ की तरफ देखा जिसके हाथ में उसका शांत हो चुका बच्चा था। बूढ़े मजदूर का हाथ थम गया। उसने वह मुट्ठी भर अनाज अपने मुँह में डालने के बजाय, धीरे से उस माँ की ख़ाली झोली में डाल दिया।

तभी दूसरे मजदूर ने भी ऐसा ही किया। फिर तीसरे ने। और देखते ही देखते, वह पूरी हिंसक लूटपाट एक शांत, मर्मस्पर्शी और सामूहिक वितरण में बदल गई। भूखे लोग खुद खाने से पहले दूसरों की झोलियाँ भर रहे थे। महलों की राजनीति जिस 'होमियोस्टैसिस' को मार चुकी थी, वह साम्राज्य के सबसे गरीब और भूखे नागरिकों के हाथों में अब भी सांसें ले रहा था।

बैरन हेपेटिक प्राचीर पर खड़े इस रोती हुई भीड़ को देख रहे थे। उन्होंने पहली बार ग्लानि और दुख से अपनी आँखें छिपा लीं।

नीचे लाल नदी बह रही थी। और उस रात, विद्रोह की उस भयानक आवाज़ से भी ज़्यादा डरावनी चीज़ सुनाई दे रही थी—

विश्वास के टूटने की आवाज़।

अध्याय 11 समाप्त।