शरीर साम्राज्य का महायुद्ध - अध्याय 13 : श्वास-द्वार का पतन

 


अध्याय 13 : श्वास-द्वार का पतन

चेतावनी का वह पहला सायरन जब साम्राज्य के बुर्जों से गूँजा, तो उसकी आवाज़ में राजनैतिक कड़वाहट नहीं, बल्कि साक्षात् मृत्यु की आहट थी। उत्तर और दक्षिण के राष्ट्राध्यक्षों ने जब एक ही दिशा में देखा, तो संवेदन परिषद की वह न्यूट्रल मेज कांप रही थी। नासिका मार्ग की जिन चौकियों ने संपर्क खोया था, वहाँ अब कोई चौकी नहीं बची थी।

साम्राज्य जब अपनी ही श्रेष्ठता की बहस में खुद को लहूलुहान कर रहा था, तब बाहर के अंधेरे में बैठा दुश्मन सही मौके का इंतजार कर रहा था। दुश्मन ने साम्राज्य को नहीं हराया; साम्राज्य पहले खुद भीतर से पूरी तरह टूटा, फिर दुश्मन को अंदर आने का रास्ता मिला। इन्फ्लुएंजा का वह वायरस कोई अस्वाभाविक राक्षस नहीं था; वह तो प्रकृति का एक सामान्य, निर्दयी जीव था। लेकिन साम्राज्य आज इतना कमजोर हो चुका था कि उस सामान्य झोंके को भी सहने की ताकत उसमें नहीं बची थी।

रक्तेश ने खिड़की से बाहर देखा। लेंस मीनार के काँच के ऊपर से जो दृश्य दिखाई दे रहा था, उसने उसके हीमोग्लोबिन के प्रवाह को रोक दिया।

श्वास-मार्ग के मुख्य प्रवेश द्वार (The Respiratory Portal) पर तैनात सुरक्षा प्राचीर भरभराकर गिर रही थी। वायरस हवा की एक ठंडी आंधी के साथ सीधे वायुमार्ग पर उतरे थे। उनके आने की गति साधारण थी, लेकिन वहाँ कोई सुरक्षा घेरा ही नहीं था। पिछले दिनों के असहयोग के कारण उपकला कोशिकाओं (Epithelial Cells) के बड़े-बड़े महल पहले ही रसद और ऊर्जा के बिना जर्जर हो चुके थे। वे छूते ही ढह रहे थे।

तभी रक्तेश को उस धूल और धुएं के बीच वीरा (न्यूट्रोफिल सिपाही) दिखाई दी। वह अपनी टूटी हुई टुकड़ी के साथ पीछे हट रही थी। मोर्चे पर तैनात अग्रिम मैक्रोफेज योद्धा पहले ही शहीद हो चुके थे।

"पीछे हटो! मुख्य श्वास-मार्ग की ओर पीछे हटो!" वीरा की आवाज़ में चीख थी। उसकी ढाल पर अब उसकी अपनी ही साथी कोशिकाओं की मौत का साक्ष्य लगा था।

उसने मुड़कर रक्तेश को देखा। उसकी आँखें चौड़ी हो चुकी थीं। कोई शिकायत नहीं, कोई प्रश्न नहीं। उसने केवल इतना कहा:

"यह वह दुश्मन नहीं है जिससे हम लड़ना जानते थे, रक्तेश... यह हमारी ताकत के कारण नहीं जीत रहा, यह हमारी अपनी टूटन के रास्ते अंदर आ रहा है। उत्तर से कहो कि अपनी बिजली भेजे, दक्षिण से कहो कि अपना लहू भेजे, वरना हम आज रात ही मलबे में बदल जाएंगे।"

यह संदेश जब उस न्यूट्रल मेज पर पहुँचा, तो चांसलर सेरेब्रम और किंग वेंट्रिकल ने एक-दूसरे के हाथों को और कसकर भींच लिया। लेकिन विडंबना यह थी कि उनके पास आदेश देने के लिए अब कोई सुदृढ़ संचार तंत्र नहीं बचा था।

मस्तिष्क नगर ने अपने कपाट खोलने चाहे, लेकिन तंत्रिका मार्ग (Axon Highways) भूखे और शिथिल पड़े थे। विद्युत तरंगें बीच रास्ते में ही दम तोड़ रही थीं। उधर, हृदय दुर्ग ने रक्त का दबाव बढ़ाना चाहा, लेकिन पाचन घाटी के विद्रोह ने रसद के गोदामों को पहले ही अस्त-व्यस्त कर दिया था। किंग वेंट्रिकल की धड़कनें धक्...धक्... की एक कमज़ोर लय में कांप रही थीं। वे अपने समर्थकों के बनाए जाल में इस कदर फँस चुके थे कि उनका अपना ही किला अब उनके आदेशों का पालन नहीं कर पा रहा था।

इसी प्रशासनिक और जैविक लकवे के बीच, Cytokine Storm (रासायनिक युद्ध) का वह आत्मघाती पागलपन शुरू हुआ जिसने साम्राज्य को अपने ही हाथों से जलाना शुरू कर दिया।

रक्तेश ने देखा कि एक संक्रमित बस्ती को बचाने के लिए स्थानीय सुरक्षा सैनिकों की एक टुकड़ी पहुँची। दुश्मन को मारने की घबराहट और बिना किसी केंद्रीय समन्वय के, उन सैनिकों ने अपने ही अंगों पर भारी तेजाबी रसायनों की गोलाबारी शुरू कर दी। रक्तेश की आँखों के सामने, वायरस से पहले उन सैनिकों की अपनी ही रासायनिक आग ने पूरी हंसती-खेलती नागरिक बस्ती को जलाकर राख कर दिया। चीखती हुई कोशिकाएं अपने ही रक्षकों की आग में झुलस रही थीं। साम्राज्य अपने ही बचाव में खुद को मार रहा था।

उधर, संवेदन परिषद की उस मेज पर रखे रक्तेश की माँ के पत्र के ऊपर अब खिड़की से उड़कर आई राख की एक परत जमने लगी थी।

तभी आग की एक छोटी सी, मूक चिंगारी हवा में तैरती हुई आई और उस पत्र के दाहिने किनारे को छू गई। कागज़ का वह कोना धीरे-धीरे सुलगने लगा। वह हिस्सा धीरे-धीरे काला पड़कर राख में बदलने लगा, जहाँ माँ की धुंधली लिखावट में लिखा था—'बेटा, इस बार घर कब आओगे?'

वह वाक्य आधा जलकर हवा में बिखर गया। रक्तेश ने दूर से उसे देखा, और उसका दिल टूट गया। अब केवल साम्राज्य नहीं जल रहा था; उसकी अंतिम स्मृति, उसकी माँ की आखिरी आवाज़ भी खाक हो रही थी।

चांसलर सेरेब्रम उठे। किंग वेंट्रिकल भी खड़े हुए। दोनों ने कोई भाषण नहीं दिया। दोनों ने अपने मुकुट और अपने राजनैतिक बैज वहीं मेज पर, उस जलते हुए पत्र के पास छोड़ दिए। वे अब विचारधाराओं के राष्ट्राध्यक्ष नहीं थे; वे केवल दो बूढ़े मित्र थे जो अपने टूटते हुए घर को बचाने के लिए एक साथ बाहर निकल रहे थे।

बाहर, लाल नदी का पानी अब पूरी तरह से काला और चिपचिपा हो रहा था।

सुदूर मीनार का सायरन अब धीरे-धीरे धीमा पड़ रहा था, क्योंकि सायरन बजाने वाले न्यूरॉन खुद ऑक्सीजन की कमी से मर रहे थे। रक्तेश ने नाव की पतवार को छोड़ दिया। उसने शांत होती नदी के मुहाने पर देखा।

उत्तर की नीली और दक्षिण की लाल धाराएं अंततः एक मटमैले रंग में आपस में मिल रही थीं। वे तब मिलीं, जब मिलने का कोई अर्थ नहीं बचा था।

अध्याय 13 समाप्त।