शरीर साम्राज्य का महायुद्ध - अध्याय 14 : फेफड़ों की घेराबंदी
अध्याय 14 : फेफड़ों की घेराबंदी
श्वास-द्वार के मलबे को पार कर इन्फ्लुएंजा की वह मूक सेना अब देह साम्राज्य के सबसे पवित्र और नाजुक हिस्से—फेफड़ा प्रदेश (The Respiratory Alveoli)—के मुहाने पर पहुँच चुकी थी। यह वह केंद्रीय घाटी थी जहाँ सदियों से हवा और लहू मिलकर जीवन का अमृत तैयार करते थे। लेकिन आज, इस घाटी की हवा में केवल धुएँ की कड़वाहट थी।
साम्राज्य के फेफड़े अब किसी बंद किले की तरह नहीं थे; उनकी पतली, पारदर्शी दीवारें इस भीषण बाहरी संकट के सामने पूरी तरह असुरक्षित खड़ी थीं।
रक्तेश अपनी नाव को फेफड़े की एक संकरी, जर्जर केपिलरी (रक्त-वाहिका) के किनारे लगाए हुए था। यहाँ नदी का प्रवाह इतना धीमा था कि पानी गाढ़ा हो रहा था। चारों ओर से वायु-कोषों (Alveoli) के फटने की मूक आवाजें आ रही थीं।
घाटी के केंद्र में वीरा (न्यूट्रोफिल सिपाही) अपनी बची-कुची अंतिम सैन्य टुकड़ी के साथ खड़ी थी। उसके चारों ओर केवल तबाही का मंज़र था। वायु-कोषों की जो पारदर्शी रेशमी दीवारें कभी हवा से ऑक्सीजन छानती थीं, वे अब वायरस के संक्रमण से सूजकर मोटी और सख्त हो चुकी थीं।
तभी एक घायल युवा सिपाही ने वीरा के पास आकर घुटने टेक दिए। उसका बदन रासायनिक मलबे से सना था।
"कमांडर... वायु-कोषों की तीसरी कतार भी टूट चुकी है," उसकी आवाज़ हाँफ रही थी। "बाहर से आने वाली हवा अब हमारे खून से नहीं मिल पा रही है। नदी में ऑक्सीजन तेजी से गिर रही है।"
वीरा ने अपनी भारी, कटी-फटी ढाल को ज़मीन पर पटका। उसकी आँखों में अब मृत्यु का भय नहीं था, केवल एक थके हुए रक्षक का कड़ा संयम था। उसने उठकर दूर देखा, जहाँ चपटी उपकला कोशिकाएं अपनी आखिरी साँसें गिनते हुए भी वायरस के कोड को रोकने की कोशिश कर रही थीं। उसने रक्तेश की ओर देखा और बहुत ही सादे स्वर में कहा:
"हम सीमा पर नहीं हारे, रक्तेश। हम तब हारे जब हमारे महलों ने रसद और विश्वास को एक-दूसरे के लिए बंद कर दिया। आज हमारे पास गोलियाँ हैं, लेकिन उन्हें दुश्मन तक पहुँचाने के लिए न तो हृदय की धड़कन का वेग है और न ही मस्तिष्क का कोई आदेश। हम केवल अपनी लाशों की दीवार बनाकर इस घाटी को कुछ पलों के लिए रोक सकते हैं।"
उसी समय, उस घाटी के ऊपरी ढलान पर दो आकृतियाँ रेंगती हुई दिखाई दीं। मलबे और धुएँ को चीरते हुए दो बूढ़े व्यक्ति हाथ में हाथ डाले नीचे आ रहे थे। वे कोई और नहीं, चांसलर सेरेब्रम और किंग वेंट्रिकल थे।
उनके सिरों पर मुकुट नहीं थे, और न ही उनके राजसी वस्त्र बचे थे। चांसलर के नीले कपड़ों पर अब दक्षिण की लाल मिट्टी लगी थी, और राजा के लाल कुर्ते पर उत्तर की नीली विद्युत-राख जमी थी। दोनों की साँसें उखड़ रही थीं।
वे सीधे वीरा के मोर्चे पर पहुँचे। वीरा ने अविश्वास से उन्हें देखा। उसने कभी नहीं सोचा था कि जिन शासकों को उसने केवल ऊंचे किलों के बुर्जों पर देखा था, वे आज इस मरती हुई घाटी की कीचड़ में खड़े होंगे।
किंग वेंट्रिकल ने अपनी कमज़ोर, हाँफती हुई आवाज़ में वीरा के कंधे पर हाथ रखा: "अब कोई राजा नहीं है, बेटी। हम केवल दो बेघर भाई हैं, जो अपने बच्चों को मरते हुए देखने के लिए यहाँ आए हैं।"
चांसलर सेरेब्रम ने आगे बढ़कर ज़मीन से एक कटी हुई तंत्रिका-तार को उठाया। उनके कांपते हाथों ने उसे राजा की धमनियों के एक मलबे से जोड़ने का प्रयास किया। वे दोनों मिलकर अपने ही हाथों से व्यवस्था के उन टूटे हुए तारों को जोड़ने में जुट गए, जिन्हें उन्होंने हफ़्तों पहले खुद अपने ही आदेशों से काटा था। वे ज़मीन पर बैठकर उन उलझे हुए प्रशासनिक धागों को सुलझाने की कोशिश कर रहे थे, जबकि हवा में वायरस के स्पाइक तैर रहे थे।
रक्तेश ने अपनी जेब में हाथ डाला। उसकी उँगलियों को माँ के पत्र का वह आखिरी, जला हुआ टुकड़ा मिला जो कल रात की आग से बच गया था। अब उस कागज़ पर कोई शब्द नहीं बचे थे। माँ की लिखी हुई वह अंतिम प्रार्थना पूरी तरह स्वाहा हो चुकी थी, वहाँ केवल उनकी लिखावट का एक आधा, टेढ़ा घुमाव बचा था जो अब पानी की गिरती बूंदों से धुंधला हो रहा था। अब केवल साम्राज्य नहीं जल रहा था, उसकी अपनी बची-कुची स्मृति भी मिट रही थी।
तभी घाटी के पश्चिमी छोर से एक भयानक, बर्फीली आंधी उठी। इन्फ्लुएंजा की दूसरी लहर ने फेफड़ों के सबसे गहरे गर्भगृह (Bronchioles) पर हमला कर दिया था। वायु-कोषों के भीतर अब हवा नहीं, बल्कि तरल मलबा भरना शुरू हो चुका था।
पानी धीरे-धीरे ऊपर चढ़ रहा था। ऑक्सीजन का ग्राफ़ नीचे गिर रहा था। हीमोग्लोबिन के मालवाहक जहाज काले पड़ रहे थे। वीरा के सैनिक अपनी कटी हुई ढालों को लेकर उस बढ़ते पानी के सामने अभी भी खड़े थे। सेरेब्रम और वेंट्रिकल अभी भी उन तारों को जोड़ने में जुटे थे। लोग अभी भी लड़ रहे थे, सांसें अभी भी चल रही थीं, लेकिन वहाँ मौजूद हर नागरिक जानता था कि वे हार रहे हैं।
घाटी की मीनार का आखिरी सायरन अब भी बज रहा था।
लेकिन उसकी आवाज़ हर क्षण थोड़ी और कमज़ोर, थोड़ी और धीमी हो रही थी। फेफड़ों की खूबसूरत घाटी के भीतर पानी लगातार ऊपर चढ़ रहा था।
और पहली बार, वहाँ मौजूद हर व्यक्ति को समझ आ गया था कि सुबह शायद नहीं आएगी।
अध्याय 14 समाप्त।