शरीर साम्राज्य का महायुद्ध - अध्याय 4 : विश्वास का कुहासा
अध्याय 4 : विश्वास का कुहासा
देह साम्राज्य में इतिहास ने अपनी गति नहीं बदली थी, लेकिन उसकी दिशा अवश्य बदल गई थी। लेडी लिंगुआ का वह एक प्रश्न अब आमाशय के कक्ष से बाहर निकलकर रक्त की लाल नदियों में बहते हुए साम्राज्य के सुदूर कोनों तक फैल चुका था।
यह समय खुली दुश्मनी का नहीं था। यह 'फुसफुसाहटों का मौसम' था, जहाँ सच से ज़्यादा ताकत अफवाहों के पास थी, और जहाँ बिना किसी प्रमाण के ही लोग एक-दूसरे को शंका की दृष्टि से देखने लगे थे।
रक्तेश का मालवाहक जहाज जब उन दिनों महाधमनी के घाटों पर रुकता, तो उसे रसायनों की गंध से पहले संदेह की गंध आती। बस्तियों के कोनों पर, केपिलरी के मोड़ों पर मजदूर और सैनिक अब खुलकर बात नहीं करते थे; वे कानों में फुसफुसाते थे।
"क्या तुमने सुना?" आंतों की मंडी में बोरा लादते हुए एक मजदूर ने रक्तेश के कान के पास झुककर कहा। "मस्तिष्क नगर के न्यूरॉन्स ने ऊपर कपाल घाटी में चोरी-छिपे 'शर्करा मुद्रा' (ग्लूकोज) के अतिरिक्त गोदाम बनाने शुरू कर दिए हैं। वे कह रहे हैं कि भविष्य में कोई संकट आने वाला है। वे सारा अनाज खुद खा जाएंगे!"
"यह तो कुछ भी नहीं," पास खड़े एक प्लेटलेट इंजीनियर ने दबी आवाज़ में जोड़ा। "हृदय दुर्ग की तरफ से खबर आई है कि किंग वेंट्रिकल अब जानबूझकर रक्त का दबाव (Blood Pressure) बढ़ा रहे हैं ताकि उत्तर के महलों को डराया जा सके। राजा अब पहले जैसा परोपकारी नहीं रहा।"
"और सेना?" एक तीसरे नाविक ने डरते हुए कहा। "सुना है इम्यून सेना के जनरल्स ने उन नागरिकों की एक गुप्त सूची बनानी शुरू कर दी है, जो मस्तिष्क या हृदय की विचारधारा के समर्थक हैं। वे किसी भी रात किसी को भी उठा सकते हैं।"
इन अफवाहों का कोई लिखित प्रमाण नहीं था, कोई राजकीय फरमान नहीं था। लेकिन लोग इन पर विश्वास कर रहे थे। और यही वह बिंदु था जहाँ देह साम्राज्य का प्राचीन समाज भीतर से खोखला हो रहा था।
इन अफवाहों को हवा देने में सबसे बड़ा हाथ स्वयं लेडी लिंगुआ (जीभ) का था। वे अब केवल वार्षिक परिषद की वक्ता नहीं रह गई थीं, बल्कि वे इस वैचारिक मंथन की मुख्य केंद्र बन चुकी थीं। उन्होंने संवाद और कूटनीति के नाम पर जगह-जगह 'सार्वजनिक विचार मंचों' की शुरुआत की थी।
आमाशय के बड़े द्वारों के सामने, जहाँ हज़ारों कोशिकाएं एकत्र होती थीं, लेडी लिंगुआ मंच पर खड़ी होकर अपनी रेशमी पोशाक लहरातीं और उनके शब्द जादू की तरह हवा में तैरते:
"मेरे प्यारे देशवासियों! हम एक नाजुक दौर से गुजर रहे हैं। क्या तर्क बड़ा है या भावना? क्या व्यवस्था श्रेष्ठ है या करुणा? हमें सोचना होगा। मस्तिष्क की बुद्धिमत्ता हमारा गौरव है, तो हृदय का स्पंदन हमारा जीवन। लेकिन क्या हम किसी एक के बिना जीने की कल्पना भी कर सकते हैं?"
उनके भाषण ऊपर से शांति स्थापित करने वाले लगते थे, लेकिन उनके भीतर एक ऐसा कूटनीतिक सम्मोहन था जो जनता को यह सोचने पर मजबूर कर देता था कि 'मस्तिष्क' और 'हृदय' दो अलग-अलग ध्रुव हैं। लेडी लिंगुआ कविताएँ लिख रही थीं, सार्वजनिक बहसें आयोजित कर रही थीं, और उन्हें स्वयं भी यह आभास नहीं था कि वे इस सुलगी हुई आग को बुझा रही हैं या अपनी कूटनीतिक कला के प्रदर्शन में इसे और भड़का रही हैं।
इस वैचारिक कुहासे का सबसे दर्दनाक दृश्य रक्तेश को उसी पुरानी सराय में देखने को मिला, जहाँ उसने एक बार फिर अपने उन तीन पुराने मित्रों को बुलाने का प्रयास किया था।
शाम ढल चुकी थी। सराय के उसी कोने वाली टेबल पर चार प्याले सजे थे। रक्तेश अकेला बैठा दरवाज़े की तरफ देख रहा था।
सबसे पहले चिन्मय आया। लेकिन वह पहले की तरह सादे कपड़ों में नहीं था। मस्तिष्क नगर के युवाओं ने अब एक अनौपचारिक समूह बना लिया था जिसे वे 'कॉर्टेक्स स्टडी काउंसिल' कहते थे। चिन्मय के गले में उस काउंसिल का एक नीला विद्युत-बैज चमक रहा था। उसकी आँखों में अब दोस्तों के लिए सहजता नहीं, बल्कि एक ठंडी तटस्थता थी।
वह अपनी कुर्सी पर बैठा और उसने घड़ी की तरफ देखा। "स्पंदन और वीरा अभी तक नहीं आए? मेरे पास अधिक समय नहीं है, रक्तेश। कॉर्टेक्स काउंसिल की आज रात एक महत्वपूर्ण नीतिगत बैठक है।"
ठीक उसी समय दरवाज़ा खुला। स्पंदन अंदर आया। उसकी चाल में हमेशा की तरह गर्मजोशी थी, लेकिन चिन्मय को देखते ही उसके कदम ठिठक गए। उसने देखा कि चिन्मय ने मस्तिष्क नगर का वह विशेष बैज पहन रखा था। स्पंदन के चेहरे पर एक गहरा दुख और कड़वाहट उभर आई।
उसने टेबल के पास आकर अपनी कुर्सी को छुआ तक नहीं। उसने चिन्मय की आँखों में देखते हुए सीधे रक्तेश से कहा, "मुझे माफ़ करना, रक्तेश। मैं उस टेबल पर नहीं बैठ सकता जहाँ संख्याओं और उपयोगिता के आधार पर जीवन को तोलने वाले बैठते हैं। हृदय दुर्ग के युवाओं ने 'समान वितरण मोर्चा' के तहत बस्तियों में अतिरिक्त रसद भेजने का काम शुरू किया है, मुझे वहां होना चाहिए।"
"स्पंदन, रुको—" रक्तेश ने उठने का प्रयास किया।
लेकिन स्पंदन मुड़ा और बिना पीछे देखे सराय से बाहर चला गया। चिन्मय ने केवल ठंडी सांस ली और अपने विद्युत-बैज को छूते हुए कहा, "देखा तुमने? भावनाएं तर्क को स्वीकार नहीं कर पातीं।"
तीसरी सहेली, वीरा (न्यूट्रोफिल सिपाही) तो आई ही नहीं। उसकी कुर्सी पूरी रात खाली पड़ी रही। रक्तेश को बाद में पता चला कि प्रतिरक्षा सेना के जनरल्स ने अपनी छावनियों के बाहर नागरिकों के आने-जाने पर रोक लगा दी थी। सेना अब अपनी एक स्वायत्त परिषद बनाने की ओर बढ़ रही थी, जिसे वे 'इम्यून जुंटा' की शुरुआती कड़ियाँ कह रहे थे।
उस रात, उस टेबल पर केवल दो ही दोस्त बचे थे, लेकिन उनके बीच की दूरी करोड़ों मील की हो चुकी थी। चिन्मय भी कुछ देर बाद बिना कुछ कहे उठकर चला गया।
रक्तेश सराय से बाहर आया और अपनी नाव के डेक पर बैठ गया। दूर, पाचन घाटी के मुहाने पर, यकृत के पहरेदार चुपचाप अपने अनाज (ग्लाइकोजन) के बोरों की सुरक्षा बढ़ा रहे थे। उन्होंने किसी गुट की घोषणा नहीं की थी, लेकिन उन्होंने भी आंतरिक बाजारों में पोषक तत्वों की कड़े नियमों से निगरानी शुरू कर दी थी—एक मूक आर्थिक नाकेबंदी की शुरुआत।
पूरे साम्राज्य में औपचारिक गुट अभी बने नहीं थे, लेकिन उनके बनने का ताना-बाना, उनकी बुनियाद आम नागरिकों के दिलों में रखी जा चुकी थी। समाज अब संस्थागत रूप से विभाजित होने के मुहाने पर खड़ा था।
रक्तेश ने बहते हुए ठंडे, गहरे लाल पानी में अपने जहाज के रिफ्लेक्शन को देखा और भारी मन से बुदबुदाया:
"नक्शे बदल रहे हैं... और जब नक्शे बदलते हैं, तो पुराना वतन सिर्फ यादों में रह जाता है।"
उसने आसमान की ओर देखा। कपाल के सफेद पहाड़ों से लेकर हृदय के लाल किले तक, विश्वास का वह घना कुहासा अब धीरे-धीरे एक ठंडे, राजनैतिक शीत युद्ध का रूप ले रहा था।
अध्याय 4 समाप्त।